भारतीय राज्य व्यवस्था की पुनर्रचना
भारतीय राज्य व्यवस्था की पुनर्रचना का प्रश्न है बहुत पुराना। राज्य व्यवस्था चाहे भारत की हो या विश्व के किसी देश की हो,»
भारतीय राज्य व्यवस्था की पुनर्रचना का प्रश्न है बहुत पुराना। राज्य व्यवस्था चाहे भारत की हो या विश्व के किसी देश की हो,»
स्वतंत्र भारत में पहली बार खेती किसानी को केन्द्र में रखकर बजट बनने की शुरूआत हुई। अभी तक होता आया था कि बजट भाषण का 25»
नितिन गडकरी को ऐसे ही रोडकरी नहीं कहते। उन्हें विकास की पटरी पर योजनाओं का खाका खींचना बखूबी आता है। वह अपने कामकाज से इ»
चौथी पंचवर्षीय योजना ने सहकारी समितियों के पुनर्गठन को प्राथमिकता दी। इसका उद्देश्य था अल्पकालीन और मध्यकालीन सहकारी संर»
एक पुरानी कहावत है- ‘मैं सड़क पर हूं।’ इसका सीधा अर्थ तो यह है- ‘इस समय कोई काम नहीं है और मैं बेकार बैठा हू»
खेती किसानी तो भारतीय जीवनशैली का एक महत्वपूर्ण अंग था। पग पग पर इसकी निशानियां आपको मिलेगी। पुरखों के किस्से भी उसी अती»
इंद्रियाँ है तो उसे रस तो चाहिए ही। रसहीन तो बेरस होता है। सोमपाई तो हमारे पुरखे थे। सोमरस से मिले अद्भुत आनंद का गान अथ»
तबलीगी जमात और इस्लामी इतिहास के सारे विवरण यही दिखाते हैं कि आज स्थितियां बदल गई हैं, मगर इरादा वही है। काफिरी और काफिर»
गांधी जी ग्राम स्वराज्य की बात करते थे। लेकिन नीति नियंताओंं ने गांधी के गांव को भुला दिया था। योगी सरकार की एक जनपद एक»
अब समय है परंपरागत खेती के तरीको की तरफ लौटने का, लेकिन इसमें भी संतुलन की जरूरत है। क्योंकि जितने अन्न की जरूरत हमे होग»
ब्रिटिश हूकूमत से पहले भारत में खेती भारतीय जीवन शैली का परंपरागत अंग था।पशुपालन भी खेती किसानी का हिस्सा था। खेती स्वतं»
दूसरी पंचवर्षीय योजना में भी सहकारिता क्षेत्र पर बल दिया गया। अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण समिति की सिफारिशों के आधा»
मनुष्य ने जब खेती करना सीखा होगा तभी वह स्थाई जीवन जीना भी सीखा होगा। हल की लकीरों से ही सभ्याताओं ने भी आकार लिया होगा।»
विश्व में कोरोना वायरस का संक्रमण चीन से हुआ है। लेकिन उसका सबसे घातक प्रभाव अमेरिका और यूरोप के सबसे समृद्ध देशों पर पड़»
प्रो. एम.एन. दास को जिन्ना और विंसटन चर्चिल के पत्रों में एक रहस्यमय पत्र मिला। चर्चिल ने जिन्ना को लिखा था कि वह उन्हें»
‘कोरोना के बाद राज्य व्यवस्था की पुनर्रचना’ विषय पर मनीषी राम बहादुर राय का व्याख्यान दिनाँक 04/02/2020»
आबोहवा में उदासी घुली है। बेदर्द वक्त की ध्वनियों में असहायता के स्वर है। ह्दय में अकेलेपन के दर्द की उठती लहरियां है। स»
आफत के काल में सांसत के रेले है। फिर भी दम-ब-दम बेदम होने के बाद भी दम शरीर में बना हुआ है। कोरोना के पूर्व प्राण पखेरू»
मज़दूरों के व्यथा की गवाह बनी सड़कें। उनके दुख – दर्द से भरे दारुण कथा को बयाँ कर रही थी। हाड़ तोड़ खटने के बाद भी»