जिन्ना को चर्चिल की शह – रामबहादुर राय

रामबहादुर राय

प्रो. एम.एन. दास को जिन्ना और विंसटन चर्चिल के पत्रों में एक रहस्यमय पत्र मिला। चर्चिल ने जिन्ना को लिखा था कि वह उन्हें मिस इ.ए.गिलिपिट के नाम से पत्र भेजा करें। उन्होंने इसके लिए एक पता भी दिया था। वह ऐसे स्थान का था, जिस पर किसी को संदेह न हो। इसी पत्र में उन्होंने जिन्ना को सलाह दी थी कि वह भी अपना एक उपनाम रख लें।

 

कांग्रेस नेतृत्व ने यह मान लिया था कि आखिरकार मुस्लिम लीग संविधान सभा में आ ही जाएगी। वह सहयोग करेगी। जो मतभेद हैं, वे परस्पर संवाद से दूर कर लिए जाएंगे। तभी तो 25 जनवरी, 1947 को सी. राजगोपालाचारी ने अगले कदम का प्रस्ताव रखा। उसे संविधान सभा ने पारित किया। वे उन चंद नेताओं में थे, जिन्हें महात्मा गांधी, सरदार पटेल और पंडित नेहरू का समान आदर प्राप्त था, हालांकि वे थे स्वतंत्र चेता राजनेता। उन्हें नेतृत्व में प्रज्ञा पुरुष का स्थान प्राप्त था। ऐसा लगता है कि कांग्रेस नेतृत्व ने अगले कदम की घोषणा का प्रस्ताव उनसे इसलिए रखवाया कि जिन्ना पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़े। वह अगला कदम क्या था? केबिनेट मिशन की योजना में संयुक्त भारत का संघीय संविधान बनना था। उद्देश्य प्रस्ताव स्वीकृत होने के बाद संघीय संविधान बनाने के लिए जो कमेटी बननी थी, उसका ही प्रस्ताव सी. राजगोपालाचारी ने रखा। पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में 12 सदस्यीय कमेटी बनी। उसमें मुस्लिम लीग के लिए स्थान रिक्त रखा गया था। रिक्त स्थानों पर मनोनयन का अधिकार अध्यक्ष को था। संविधान सभा के उस सत्र का वह अंतिम दिन था।  

सी. राजगोपालाचारी ने इसे अपने भाषण में रेखांकित किया कि ‘हमें संयुक्त भारत के लिए संविधान बनाना है।’ इसके बाद उन्होंने जो कहा, वह वास्तव में वही था जो उस समय साफ-साफ दिख रहा था- ‘यदि सम्राट की सरकार की घोषणा में कोई चीज साफ शब्दों में कही गई है तो वह यह है कि भारत में केवल एक सर्वसत्ता-संपन्न राज्य होगा। यह बात असंदिग्ध रूप से साफ कर दी गई है कि भारत को दो सर्वसत्ता-संपन्न राज्यों में बांटने की बात सोची नहीं जा सकती। इससे जो कुछ हम कर रहे हैं, उनमें से बहुत सी बातों का अपने आप स्पष्टीकरण हो जाता है और हमारे बीच जिन गलतफहमियों की संभावना हैं, उनमें से बहुत सी दूर हो जाती हैं। मैं इस प्रकार भी कह सकता हूं कि लीग ने अपना उद्देश्य प्राप्त करने के लिए गलत रास्ता अख्तियार किया है। यदि उन्होंने अपनी मांगों को वहां तक ही सीमित रखा होता जहां तक अपनी नीति के अनुसार न्यायतः वे मांग सकते थे, तो शायद लीग अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेती और वह वर्तमान कठिनाइयों में न पड़ती। लीजिए अब मैं बिलकुल साफ-साफ कहता हूं। मुस्लिम लीग के लिए सब से बड़ी कठिनाई यह है कि अब उसे संविधान सभा में शामिल होना पड़ेगा और इस तरह उसे खुले तौर पर भारत में केवल एक सर्वसत्ता-संपन्न राज्य स्वीकार करना पड़ेगा। यही कारण है कि उसे संविधान सभा में शामिल होना भारी पड़ रहा है और इसके लिए बारंबार टालमटोल की जा रही है। यही कारण है कि बड़े-बड़े दल अपने विचार-विनिमय के लिए जो तारीखें नियत करते हैं, लीग हमेशा अपनी बैठकों की तारीखें उनके बाद ही मुकर्रर करती है। यही कारण है कि आज हम देखते हैं कि संविधान सभा की पिछली बैठक के स्थगित होने के बाद भी लीग अभी तक अपना फैसला करने तथा हमारे साथ शामिल होने में असमर्थ है।’ वाइसराय वेवल भी इसका प्रयास जोर-शोर से कर रहे थे कि मुस्लिम लीग को संविधान सभा में सम्मिलित होना चाहिए।

सी. राजगोपालाचारी के संविधान सभा में भाषण का महत्व समझने के लिए जरूरी है यह जानना कि वे पहले नेता थे, जिन्होंने भांप लिया था कि मुस्लिम लीग को बंटवारे से रोकने के लिए कोई सर्वसम्मत फार्मूला निकलना चाहिए। उन्होंने पहले गांधीजी से अपनी योजना पर चर्चा की। जिन्ना से भी बात की। साथ ही साथ वाइसराय से भी बात की। अपने फार्मूले पर सब को सहमत करा लिया। उसे उन्होंने जुलाई 1944 में जारी किया। ऐसे थे सी. राजगोपालाचारी। जिन्हें आदरपूर्वक लोग राजा जी कहते थे। केबिनेट मिशन योजना राजा जी के फार्मूले से थोड़ा अलग थी। जब वे संविधान सभा में बोल रहे थे, तब यह भावना थी कि उनके भाषण का महत्व जिन्ना भी समझेंगे। जिन्ना को ही संबोधित कर उन्होंने ये बातें कहीं- ‘हमें दूसरे पक्ष की भी कठिनाइयां समझनी चाहिए। यदि मुस्लिम लीग अब संविधान सभा में आती है तो वह अपनी ‘अलग रहने की नीति’ छोड़कर तथा यह अच्छी तरह समझ-बूझकर आएगी कि भारत केवल एक सर्वसत्ता-संपन्न राज्य होगा। यह काम यकायक करना उसके लिए कठिन है। हमें इन कठिनाइयों को महसूस करना चाहिए और उनकी इस देर का गलत मतलब नहीं लगाना चाहिए। हम चाहते हैं कि मुस्लिम लीगी सदस्यों को इस समय इस संविधान सभा में आने तथा हमारे साथ मिलकर काम करने में जो अड़चनें हैं, उन्हें हम भलीभांति समझकर यथासंभव शीघ्रता से अपना काम प्रारंभ कर दें।’ 

 क्या जिन्ना ने उनके भाषण का महत्व समझा? क्या करांची का प्रस्ताव सी. राजगोपालाचारी के भाषण का ही जवाब था? पहले प्रश्न का उत्तर स्पष्ट है। जिन्ना अपनी मर्जी चलाने पर तुले हुए थे। दूसरे प्रश्न का उत्तर खोजी इतिहासकारों ने ढूंढ़ लिया है। जब तक नए तथ्य नहीं मिले थे, तब तक यही समझा जा रहा था कि जिन्ना ने यह देखकर कि संविधान सभा अपने कदम बहुत सधे हुए ढंग से रख रही है, इसलिए उसे रोकने के इरादे से करांची प्रस्ताव पारित करवाया। मुस्लिम लीग में जिन्ना की जुबान ही कानून होती थी। कांग्रेस की भांति बहस और विचार विमर्श की वहां गुंजाइश नहीं थी। वी.पी. मेनन ने अपनी पुस्तक ‘ट्रांफर ऑफ पॉवर’ में बताया है कि जिन्ना ने अपना पूरा जोर लगाया कि संविधान सभा न बुलाई जाए। लेकिन वाइसराय वैवल ने यह मानने से इंकार कर दिया। जिन्ना को पहला झटका लगा, जब नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। दूसरा झटका था, जब संविधान सभा ने संघीय संविधान के लिए कमेटी बना ली।

कांग्रेस और मुस्लिम लीग में मुख्य विवाद तब केबिनेट मिशन योजना के उस हिस्से पर था जिसका संबंध संघीय सरकार के प्रस्तावित स्वरूप से था। केबिनेट मिशन की योजना में देश को तीन खंडों का संघ बनाना था। एक खंड वह जिसमें हिन्दुओं का स्पष्ट बहुमत था। दूसरा जहां मुस्लिम बहुलता में थे। तीसरा वह जहां दोनों समुदायों की संख्या लगभग बराबर थी। विवाद इसी पर था कि वे हिस्से अपना निर्णय कैसे करेंगे। इसी को सुलझाने के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने दिसंबर 1946 में एक बैठक बुलाई। बैठक में वाइसराय के साथ पंडित नेहरू, बलदेव सिंह, जिन्ना और लियाकत अली खां 2 दिसंबर को लंदन पहुंचे।  वह बातचीत विफल रही। उसके बाद पंडित नेहरू और बलदेव सिंह तुरंत वापस आ गए। लेकिन जिन्ना और लियाकत अली खां वहां लंबे समय तक रुके रहे। 

इतिहासकारों के लिए यह बड़ा रहस्य रहा है कि वहां मुस्लिम लीग के इन नेताओं ने क्या गुल खिलाए! जो ज्ञात था वह सिर्फ इतना ही था कि जिन्ना ने घूम-घूमकर लंदन में सभाएं की थीं। उनमें वे पाकिस्तान की मांग को दोहराते रहे और चेतावनी भी साथ-साथ देते जाते थे कि अगर यह मांग नहीं मानी गई, तो भारत में गृहयुद्ध को रोका नहीं जा सकता। जो बहुत दिनों तक नहीं जाना जा सका था, उस रहस्य से भी पर्दा उठा लिया गया है। यह काम उत्कल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. एम.एन. दास ने किया है। उनकी खोज से दुनिया 1983 में परिचित हुई, यानी घटना के करीब चार दशक बाद। गोपनीय दस्तावेजों से नए तथ्य सामने आए। उससे जाना जा सका कि आखिर जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग पर अड़ियल रूख क्यों अपनाया। लंदन जब जिन्ना गए तो वे भारी असमंजस में थे। ‘वे बहुत खिन्न थे, कारण यह कि उसी वर्ष 16 अगस्त को उनके सीधी कारवाई के आह्वान पर सांप्रदायिक दंगे छिड़ गए थे। व्यापक हिंसा के बाद जिन्ना यह सोचकर परेशान हो रहे थे कि बंटवारे के बाद हिन्दुस्तान में रहने वाले करोड़ों मुसलमानों पर क्या बीतेगी। यह सोचकर वे अब इस बात पर दुबारा विचार करने लगे थे कि केबिनेट मिशन का पहले दिया गया प्रस्ताव क्या पाकिस्तान मांगने से बेहतर होगा।’ केबिनेट मिशन योजना में मुसलमानों के बहुमत वाले इलाकों में उन्हें पूरी स्वायत्तता देने का प्रावधान था। 

फिर भी जिन्ना ने लंदन पहुंचते ही अपना सुर बदल दिया। वह इस बात पर अड़ गए और खुले आम एलान करने लगे कि उन्हें मुसलमानों के लिए एक स्वतंत्र गृहराज्य से कम कुछ भी नहीं चाहिए। उन्हें पाकिस्तान ही चाहिए। उनके इस बदलाव को सरदार पटेल ने सर स्टैफर्ड क्रिप्स की चाल समझा। उन्होंने क्रिप्स को लंबा पत्र लिखा, जिसमें उन्हें डांट लगाई। उनके पत्र का यह अंश यहां प्रासंगिक है-‘जैसे ही समझौते का समय आया, जिन्ना को यह निमंत्रण मिल गया और एक बार फिर वे मुसलमानों को यह समझाने में सफल रहे कि गड़बड़ियां और हिंसा करने पर उन्हें ज्यादा रियायतें मिल सकती हैं।’ लेकिन सरदार पटेल को पता नहीं था कि इस मामले में असली खलनायक तो चर्चिल थे। जिन्ना का हौसला बढ़ाने में प्रमुख भूमिका उन्हीं की थी। ‘जिन्ना ने 12 दिसंबर, 1946 को चर्चिल को लंच के लिए आमंत्रित किया। लेकिन चर्चिल ने सावधानी भरा जवाब दिया कि इस समय सार्वजनिक रूप से एक दूसरे के साथ बैठना बुद्धिमानी नहीं होगी। लेकिन पर्दे के पीछे से उन्होंने एक बार फिर जिन्ना को और जोर-शोर से पाकिस्तान की मांग उठाने के लिए उकसाया।’ 

प्रो. एम.एन. दास को जिन्ना और विंसटन चर्चिल के पत्रों में एक रहस्यमय पत्र मिला। चर्चिल ने जिन्ना को लिखा था कि वह उन्हें मिस इ.ए.गिलिपिट के नाम से पत्र भेजा करें। उन्होंने इसके लिए एक पता भी दिया था। वह ऐसे स्थान का था, जिस पर किसी को संदेह न हो। इसी पत्र में उन्होंने जिन्ना को सलाह दी थी कि वह भी अपना एक उपनाम रख लें, जिससे भारत में किसी को भी इस गोपनीय पत्राचार की भनक न लगे। प्रो. दास की खोज से यह स्पष् हुआ कि मुस्लिम लीग ने करांची प्रस्ताव लंदन के अपने आकाओं से आश्वासन पाकर पारित कराया। वाइसराय वेवल ने भी अपनी डायरी में यह दर्ज किया है कि ‘चर्चिल ने आखिरी टिप्पणी में कहा- थोड़ा सा भारत का टुकड़ा रख लेना।’ वेवल की डायरी में यह भी दर्ज है कि ‘वे (चर्चिल) भारत का पाकिस्तान, हिन्दुस्तान और प्रिंसिस्तान (रियासतें) में विभाजन किए जाने के पक्षधर जान पड़ते हैं।’    

 नए तथ्यों की रोशनी में यह स्पष्ट है कि मुस्लिम लीग का करांची प्रस्ताव सिर्फ सी. राजगोपालाचारी के भाषण की प्रतिक्रिया में नहीं था। मुस्लिम लीग ने उसे एक बहाना बनाया। वास्तविक कारण दूसरे थे।