भारत और ओमान के बीच बढ़ते रणनीतिक तथा आर्थिक संबंधों ने हाल के वर्षों में नई ऊंचाइयों को छुआ है। विशेष रूप से समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक संपर्क के क्षेत्र में दोनों देशों के सहयोग ने भारत की पश्चिम एशिया नीति को मजबूत किया है। ऐसे समय में जब होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के कारण अक्सर चर्चा में रहता है, भारत और ओमान के बीच हुए समझौते इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के संभावित विकल्प के रूप में देखे जाने लगे हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और दुनिया के लगभग एक-तिहाई समुद्री तेल व्यापार का मार्ग है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है, इसलिए होर्मुज में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव, क्षेत्रीय संघर्ष और समुद्री सुरक्षा संबंधी चुनौतियों ने समय-समय पर इस मार्ग की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं।
इसी संदर्भ में ओमान का महत्व बढ़ जाता है। ओमान अरब प्रायद्वीप के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित है और उसका दुक़्म बंदरगाह अरब सागर के किनारे स्थित है। यह बंदरगाह होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर स्थित होने के कारण रणनीतिक
दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत और ओमान के बीच हुए समझौतों के तहत भारतीय नौसेना को दुक़्म बंदरगाह के उपयोग की सुविधा मिली है। इससे भारतीय जहाजों को रसद, मरम्मत और अन्य आवश्यक सेवाएं प्राप्त हो सकती हैं।
दुक़्म बंदरगाह का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यहां पहुंचने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की आवश्यकता नहीं होती। यदि किसी कारणवश होर्मुज मार्ग बाधित होता है, तो दुक़्म भारत के लिए एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक केंद्र के रूप में कार्य कर सकता है। इसके अलावा यह बंदरगाह हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री उपस्थिति को भी मजबूत करता है।
भारत की समुद्री रणनीति में हिंद महासागर का विशेष महत्व है। चीन की बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों और “बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव” के तहत विकसित बंदरगाहों के बीच भारत अपने रणनीतिक साझेदारों के साथ सहयोग बढ़ा रहा है। ओमान के साथ रक्षा और समुद्री सहयोग इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है। दुक़्म बंदरगाह भारत को पश्चिमी हिंद महासागर में अपनी पहुंच बढ़ाने और समुद्री मार्गों की निगरानी में सहायता प्रदान करता है।
हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि ओमान या दुक़्म बंदरगाह पूरी तरह से होर्मुज जलडमरूमध्य का विकल्प बन सकते हैं। होर्मुज केवल एक बंदरगाह या व्यापारिक केंद्र नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की मुख्य धुरी है। खाड़ी के अधिकांश तेल उत्पादक देशों का निर्यात अभी भी इसी मार्ग से होता है। इसलिए इसकी रणनीतिक भूमिका को पूरी तरह प्रतिस्थापित करना संभव नहीं है।
फिर भी, भारत-ओमान सहयोग जोखिमों को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह भारत को वैकल्पिक लॉजिस्टिक सुविधाएं प्रदान करता है, समुद्री सुरक्षा को मजबूत बनाता है और आपात परिस्थितियों में ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने में मदद कर सकता है। इसके अतिरिक्त, दोनों देशों के बीच बढ़ता व्यापार, निवेश और रक्षा सहयोग क्षेत्रीय स्थिरता को भी बढ़ावा देता है।
भारत और ओमान के संबंध केवल सामरिक हितों तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध रहे हैं। आज ओमान में बड़ी संख्या में भारतीय समुदाय निवास करता है, जो दोनों देशों के बीच एक मजबूत सेतु का कार्य करता है। यही कारण है कि दोनों देशों की साझेदारी लगातार गहरी होती जा रही है।
भारत-ओमान समझौते और दुक़्म बंदरगाह का विकास भारत की समुद्री एवं ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यद्यपि यह होर्मुज जलडमरूमध्य का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकता, लेकिन यह भारत को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक विकल्प अवश्य प्रदान करता है। बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय परिदृश्य में यह सहयोग भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा, व्यापारिक हितों और हिंद महासागर क्षेत्र में प्रभाव को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
