ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने 22 जून 2026 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। अपनी लेबर पार्टी में बढ़ते आंतरिक दबाव, खराब चुनाव परिणामों और मंत्रियों द्वारा बगावत के कारण उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले ही पद छोड़ने का फैसला किया। ब्रिटेन को दुनिया के सबसे पुराने और स्थिर लोकतंत्रों में गिना जाता है, लेकिन पिछले एक दशक में वहां राजनीतिक अस्थिरता का एक अलग ही दौर देखने को मिला। वर्ष 2016 से 2026 के बीच ब्रिटेन में छह प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। यह स्थिति कई लोगों के लिए आश्चर्यजनक रही है, क्योंकि आमतौर पर ब्रिटेन में प्रधानमंत्री लंबे समय तक अपने पद पर बने रहते हैं। सवाल यह है कि आखिर 10 वर्षों में इतनी तेजी से प्रधानमंत्री बदलने के पीछे कौन-कौन से कारण रहे? इसके पीछे कई राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक कारण जिम्मेदार हैं।
ब्रिटेन की राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव वर्ष 2016 में हुए ब्रेक्जिट जनमत संग्रह के बाद आया। जनमत संग्रह में ब्रिटेन की जनता ने यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के पक्ष में मतदान किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने इस जनमत संग्रह का समर्थन किया था, लेकिन परिणाम उनके अनुमान के विपरीत आया। इसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
ब्रेक्जिट के बाद देश में यह बहस शुरू हो गई कि यूरोपीय संघ से अलग होने की प्रक्रिया कैसे पूरी की जाए। इस मुद्दे ने सत्तारूढ़ दल और विपक्ष दोनों को विभाजित कर दिया। परिणामस्वरूप राजनीतिक नेतृत्व लगातार दबाव में रहा और प्रधानमंत्री बदलते गए।ब्रेक्जिट के बाद प्रधानमंत्री बनीं थेरेसा मे संसद से अपना समझौता पारित कराने में असफल रहीं। उनकी पार्टी के भीतर ही उनके खिलाफ विरोध बढ़ गया। अंततः उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
उनके बाद बोरिस जॉनसन सत्ता में आए। उन्होंने ब्रेक्जिट को लागू कराया, लेकिन बाद में कई विवादों और पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष के कारण उन्हें भी इस्तीफा देना पड़ा। इससे स्पष्ट हुआ कि केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ दल के अंदरूनी संघर्ष भी नेतृत्व परिवर्तन का बड़ा कारण बने।पिछले दशक में ब्रिटेन को कई आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ा। ब्रेक्जिट के प्रभाव से व्यापार और निवेश प्रभावित हुए। इसके बाद कोविड-19 महामारी ने अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया।
महंगाई, ऊर्जा संकट और बढ़ती जीवन-यापन लागत ने जनता में असंतोष पैदा किया। आर्थिक चुनौतियों से निपटने में सरकारों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जब जनता और सांसदों का विश्वास कम हुआ तो प्रधानमंत्री बदलने की मांग तेज होती गई।कोविड-19 महामारी ने ब्रिटेन की राजनीति को भी प्रभावित किया। महामारी के दौरान सरकार के फैसलों, लॉकडाउन नीतियों और स्वास्थ्य प्रबंधन को लेकर कई सवाल उठे। विशेष रूप से लॉकडाउन के दौरान सरकारी अधिकारियों और नेताओं से जुड़े विवादों ने जनता का भरोसा कमजोर किया।
इन घटनाओं ने राजनीतिक नेतृत्व की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया और सरकार के भीतर असंतोष को बढ़ाया। परिणामस्वरूप नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया तेज हुई।ब्रिटेन की संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री का पद संसद में बहुमत प्राप्त दल के समर्थन पर निर्भर करता है। यदि पार्टी के सांसद अपने नेता पर विश्वास खो देते हैं, तो उसे पद छोड़ना पड़ सकता है।हाल के वर्षों में सत्तारूढ़ दल के भीतर बार-बार नेतृत्व चुनाव हुए। इससे प्रधानमंत्री का कार्यकाल छोटा होता गया। कई बार जनता ने सीधे चुनाव में सरकार नहीं बदली, बल्कि पार्टी के अंदर नेतृत्व परिवर्तन के कारण नया प्रधानमंत्री सामने आया।
सोशल मीडिया और 24 घंटे चलने वाले समाचार चैनलों के युग में राजनीतिक नेताओं पर लगातार निगरानी रहती है। किसी भी गलती या विवाद का प्रभाव पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से पड़ता है।ब्रिटेन में जनता अब आर्थिक प्रदर्शन, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर अधिक सजग है। इसलिए नेताओं पर दबाव बढ़ा है और राजनीतिक गलतियों की कीमत उन्हें जल्द चुकानी पड़ती है। यह भी प्रधानमंत्री परिवर्तन की बढ़ती दर का एक महत्वपूर्ण कारण है।
यह स्थिति दर्शाती है कि मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं वाले देशों में भी राजनीतिक स्थिरता हमेशा सुनिश्चित नहीं होती। हालांकि प्रधानमंत्री बार-बार बदले, लेकिन ब्रिटेन की लोकतांत्रिक व्यवस्था ने शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से सत्ता हस्तांतरण सुनिश्चित किया। यही उसकी लोकतांत्रिक मजबूती की सबसे बड़ी पहचान है।
