विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था में जी-7 देशों का विशेष महत्व रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा और जापान जैसे विकसित देशों का यह समूह वैश्विक आर्थिक नीतियों और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर प्रभाव डालता है। हालांकि, बदलती वैश्विक परिस्थितियों में यह महसूस किया जाने लगा है कि केवल विकसित देशों के दृष्टिकोण से दुनिया की चुनौतियों का समाधान संभव नहीं है। इसी कारण जी-7 के मंच पर विकासशील देशों की आवाज़ को अधिक महत्व मिलने लगा है। यह परिवर्तन वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक समावेशी और संतुलित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
विकासशील देशों की आबादी विश्व की कुल जनसंख्या का बड़ा हिस्सा है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक देश आज तेजी से आर्थिक प्रगति कर रहे हैं और वैश्विक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उनकी भागीदारी अपेक्षाकृत कम रही है। जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा संकट, गरीबी और स्वास्थ्य जैसी समस्याओं का सबसे अधिक प्रभाव इन्हीं देशों पर पड़ता है। इसलिए इनके विचारों और आवश्यकताओं को वैश्विक मंचों पर स्थान देना समय की मांग बन गया है।
हाल के वर्षों में जी-7 सम्मेलनों में भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया और अन्य विकासशील देशों को विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। इसका उद्देश्य वैश्विक दक्षिण की चिंताओं को समझना और उन्हें नीति निर्माण
में शामिल करना है। विशेष रूप से भारत ने विकासशील देशों की आवाज़ को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत लगातार यह आग्रह करता रहा है कि वैश्विक विकास तभी संभव है जब सभी देशों को समान अवसर और सम्मान मिले।
जलवायु परिवर्तन का मुद्दा इसका एक प्रमुख उदाहरण है। विकसित देशों ने औद्योगिकीकरण के लंबे दौर में बड़े पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन किया है, जबकि विकासशील देश अभी भी अपनी विकास आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में विकासशील देशों का तर्क है कि जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए विकसित देशों को वित्तीय सहायता और आधुनिक तकनीक उपलब्ध करानी चाहिए। जी-7 मंच पर इस विषय पर चर्चा से यह स्पष्ट हुआ है कि वैश्विक समस्याओं का समाधान साझेदारी और सहयोग से ही संभव है।
कोविड-19 महामारी के दौरान भी विकासशील देशों की समस्याएं सामने आईं। वैक्सीन, दवाओं और स्वास्थ्य संसाधनों की असमान उपलब्धता ने वैश्विक व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया। इसके बाद जी-7 देशों ने स्वास्थ्य सहयोग और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने पर ध्यान दिया। विकासशील देशों ने यह मांग उठाई कि स्वास्थ्य सुरक्षा को वैश्विक सार्वजनिक संपत्ति माना जाए और संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित किया जाए।
खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा भी ऐसे मुद्दे हैं जिन पर विकासशील देशों की चिंताएं महत्वपूर्ण हैं। अंतरराष्ट्रीय संघर्षों और आर्थिक अस्थिरता का सबसे अधिक प्रभाव गरीब और विकासशील देशों पर पड़ता है। बढ़ती महंगाई, खाद्यान्न संकट और ऊर्जा की ऊंची कीमतें उनके विकास को प्रभावित करती हैं। जी-7 में इन विषयों पर विकासशील देशों के सुझावों को शामिल करने से अधिक व्यावहारिक और प्रभावी नीतियां तैयार की जा सकती हैं।
भारत की पहल पर “वैश्विक दक्षिण की आवाज़” को मजबूत करने की दिशा में कई प्रयास हुए हैं। भारत ने बार-बार यह कहा है कि 21वीं सदी की वैश्विक संस्थाओं को वर्तमान वास्तविकताओं के अनुरूप बनाया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं में सुधार की मांग भी इसी सोच का हिस्सा है। जी-7 जैसे मंचों पर विकासशील देशों की भागीदारी इस दिशा में सकारात्मक संकेत देती है।
