कई महीनों से दुनिया की अर्थव्यवस्था एक संकरे समुद्री रास्ते को ऐसे देख रही थी, मानो वहीं से सूरज निकलता हो। ईरान और ओमान के बीच स्थित होर्मुज स्ट्रेट में तनाव बढ़ा तो तेल महंगा हो गया, जहाज़ों का बीमा महंगा हो गया, माल ढुलाई महंगी हो गई और आखिरकार आम आदमी की हर परेशानी का कारण भी वही बन गया।भारत में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि इसका असर महंगाई पर पड़ सकता है। अर्थशास्त्रियों ने ग्राफ बनाए। टीवी एंकरों ने लाल रंग के नक्शे दिखाए। सोशल मीडिया के विशेषज्ञों ने लंबे-लंबे थ्रेड लिखे। और राजनीतिक दलों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं।
हर दिन ऐसा लगने लगा जैसे भारत की अर्थव्यवस्था का रिमोट कंट्रोल दिल्ली या मुंबई में नहीं, बल्कि होर्मुज स्ट्रेट के पानी में तैर रहा हो।अब खबर आई है कि होर्मुज स्ट्रेट पर संकट कम होता दिख रहा है। वैश्विक ऊर्जा बाजारों ने राहत की सांस ली है। तेल और गैस की आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद बढ़ी है। और इसी के साथ भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय का भी समापन होता दिखाई दे रहा है।सबसे बड़ी राहत आम जनता को मिली है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती शायद राजनीतिक रणनीतिकारों के सामने खड़ी हो गई है। महीनों से टीवी डिबेट, प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया पोस्ट्स में जिस मुद्दे ने प्रमुख स्थान बना रखा था, उसके कमजोर पड़ने से अब नई बहस की तलाश शुरू हो सकती है।
अब तक तो हर आर्थिक चर्चा में होर्मुज स्ट्रेट का नाम ऐसे लिया जा रहा था जैसे मोहल्ले के हर झगड़े का जिम्मेदार वही हो। पेट्रोल महंगा? होर्मुज स्ट्रेट। डीजल महंगा? होर्मुज स्ट्रेट। गैस महंगी? होर्मुज स्ट्रेट। माल ढुलाई महंगी? होर्मुज स्ट्रेट। अर्थव्यवस्था पर दबाव? होर्मुज स्ट्रेट।ऐसा प्रतीत होने लगा था कि देश में होने वाली हर आर्थिक समस्या की जड़ कहीं न कहीं उसी समुद्री रास्ते में जाकर मिलती है।कुछ दिनों तक तो ऐसा माहौल बन गया था कि अगर पड़ोस की
किराने की दुकान पर बिस्कुट भी महंगा मिल जाए, तो कोई न कोई विशेषज्ञ होर्मुज स्ट्रेट का नक्शा निकालकर समझाने बैठ जाता।
लेकिन अब यह सुविधाजनक तर्क धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकता है।राजनीति की दुनिया में हर पक्ष को मुद्दों की जरूरत होती है। कोई सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाने के लिए मुद्दे खोजती है, तो कोई विपक्ष सवाल उठाने के लिए। ऐसे में जब कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय संकट कम होने लगता है, तो दोनों पक्ष अपने-अपने नए तर्क तलाशने लगते हैं।
विपक्ष के सामने चुनौती यह है कि इतने दिनों से विदेश नीति, तेल संकट और संभावित महंगाई को लेकर जो हमले किए जा रहे थे, अब उनका असर पहले जैसा नहीं रह सकता। टीवी डिबेट्स में आवाज़ ऊंची करना आसान है, लेकिन जब मुद्दा कमजोर पड़ जाए तो विपक्ष के रिसर्च विभाग को ओवरटाइम करना पड़ता है।
हालांकि सरकार को भी बहुत अधिक उत्साहित होने की जरूरत नहीं है।आखिर पिछले कुछ वर्षों में हर अच्छी खबर का श्रेय लेने और हर बुरी खबर का कारण वैश्विक परिस्थितियों को बताने की कला भी खूब विकसित हुई है। जब तेल महंगा होता है, तो बताया जाता है कि इसके लिए वैश्विक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। लेकिन जब तेल सस्ता होता है, तो प्रेस विज्ञप्तियों में अचानक आत्मनिर्भरता, दूरदर्शी नेतृत्व और ऐतिहासिक निर्णयों की संख्या बढ़ जाती है।
ऐसे में यदि होर्मुज स्ट्रेट पर तनाव कम होने के बाद कीमतों में राहत आती है, तो जनता खुश होगी। लेकिन यदि राहत नहीं आती, तो जनता यह भी पूछ सकती है कि वैश्विक परिस्थितियों का असर ऊपर जाते समय तो तुरंत दिखता है, नीचे आते समय थोड़ा समय क्यों लेता है?और यदि राहत नहीं आती, तो विपक्ष यह पूछेगा कि जब संकट कम हो गया है तो कीमतें अभी भी ऊंची क्यों हैं?यानी राजनीति का चक्र चलता रहेगा।
आम नागरिक की समस्या यह है कि उसे न विपक्ष के प्रेस कॉन्फ्रेंस से राहत मिलती है और न सरकार की उपलब्धियों की सूची से। उसे तो बस महीने के अंत में अपना बजट संतुलित करना होता है। उसके लिए होर्मुज स्ट्रेट, ब्रेंट क्रूड, समुद्री बीमा प्रीमियम और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला जैसे शब्द उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितना कि पेट्रोल पंप पर दिखाई देने वाला अंतिम आंकड़ा।
फिलहाल वैश्विक बाजारों ने राहत की सांस ली है। सरकार इसे सकारात्मक संकेत बता रही है। विपक्ष नए सवाल तलाश रहा है। और टीवी स्टूडियो में नई बहसों की तैयारी शुरू हो चुकी है। आखिर “देश जानना चाहता है” कि अब अगला संकट कौन सा होगा।और बीच में खड़ी जनता सोच रही है कि अगर सब कुछ इतना अच्छा हो रहा है, तो उसकी जेब हल्की क्यों लग रही है?
क्योंकि जनता को इस बात से बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ता कि तेल का टैंकर किस समुद्री रास्ते से आया। जनता का सीधा प्रश्न हमेशा एक ही रहता है—पेट्रोल कितने का है, गैस सिलेंडर कितने का है और घर का बजट कितना बिगड़ रहा है?
बाकी राजनीति की चिंता छोड़िए।भारत में मुद्दे कभी खत्म नहीं होते। अगर महंगाई का मुद्दा कमजोर पड़ गया, तो कोई नया मुद्दा मजबूत हो जाएगा। अगर अंतरराष्ट्रीय संकट समाप्त हो गया, तो घरेलू बहस शुरू हो जाएगी। अगर बहस भी समाप्त हो गई, तो बहस पर बहस शुरू हो जाएगी।
आखिर भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही तो है—यहां समस्याओं से ज्यादा उनकी राजनीतिक संभावनाएं पैदा होती रहती हैं।क्योंकि लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं, विपक्ष बदलता है, मुद्दे बदलते हैं, बहसें बदलती हैं।लेकिन एक चीज़ नहीं बदलती—महीने के अंत में जनता अपनी जेब टटोलकर वही पुराना सवाल पूछती है:”अच्छा, इस बार राहत कब आने वाली है?”
(द्वारा -कमलाकांत पाठक)
