राजनीति का जातिवादी संकट
प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यासकार फणीश्वरनाथ रेणु लिखते हैं, ‘जात क्या है ! जात दो ही हैं, एक गरीब और दूसरी अमीर.’»
प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यासकार फणीश्वरनाथ रेणु लिखते हैं, ‘जात क्या है ! जात दो ही हैं, एक गरीब और दूसरी अमीर.’»
अंततः अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के साथ ही भाजपा का राजयोग सुनिश्चित हो गया उधर राहुल गाँधी अपनी चुनावी यात्र»
2024 के आम चुनाव की तैयारियों ने राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है. इस रणभूमि की मौजूदा स्थिति यह है कि सत्तापक्ष अपने कील-कां»
साहित्य अपने श्रेष्ठतम स्वरुप में यथार्थ से उपजता है. परन्तु इस यथार्थ का परिष्करण कृतिकार की कल्पनाशीलता से ही संभव है.»
जुलाई,1896 में तत्कालीन बंबई के ‘वाटसन होटल’ में ज़ब लुमियर बन्धुओं ने अपने ‘सिनेमेटोग्राफ’ प्रदर»
न्यायपालिका राजनीतिक प्रक्रिया का एक ऐसा अंग है जो सरकार या सत्ता के हाथों में राजनीतिक शक्ति के अत्याधिक संकेन्द्रण की»
हरिशंकर परसाई लिखते हैं, ‘दिवस कमजोर का मनाया जाता है, जैसे महिला दिवस, अध्यापक दिवस, मजदूर दिवस. कभी थानेदार दिवस»
वर्तमान विश्व विभिन्न प्रकार के सामाजिक चुनौतियों एवं असमानताओं, आर्थिक विषमताओं, राजनीतिक संघर्षों, धार्मिक-सांस्कृतिक»
द्वितीय विश्वयुद्ध की घोषणा होने पर यूनाइटेड किंगडम के मंत्रिमंडल की बैठक हुई. प्रधानमंत्री चर्चिल ने सभी मंत्रियों से अ»
वर्तमान लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था के अंतर्गत लोक प्रशासनिक सेवाएं सरकार एवं शासन सत्ता की और राजनीतिक तथा और निर्वाचित»
चंद्रयान, G-20 के चमक-दमक से लेकर नारी शक्ति वंदन बिल के शोर में घोसी उपचुनाव की हार की समीक्षा दब गईं या सत्ताधारी दल द»
किसी भी राष्ट्र के जीवन में कठिन दौर तब आता है ज़ब उसकी राजनीति दिशाहीन और राष्ट्रीय हितों के ऊपर सत्ता स्वार्थ को तरजीह»
1947 में अखंड भारत के वक्षस्थल को मजहबी उन्माद की तलवार से चीर कर इस्लामिक अधिकृत क्षेत्र का निर्माण किया गया. रातों-रात»
अपने अज्ञातवास क़े समय एक बार लेनिन पेरिस (फ्रांस) की सड़कों पर टहल रहे थे. वे बहुत भूखे थे और उनके पास पैसे भी नहीं थे. ए»
वरिष्ठ समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा महात्मा गाँधी की नैतिक-आध्यात्मिक विचारधारा पर आधारित अपनी चर्चित किताब ‘न»
पिछले दिनों एक चर्चित हिंदी समाचार चैनल की महिला उद्घोषिका का वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें वे स्टूडियो में छाता लेकर एं»
संविधान, जिसे भारत में धर्म ग्रन्थ सरिखा सम्मान प्राप्त है, के इतिहास में कई महत्वपूर्ण तिथियां अंकित हैं. ऐसी ही एक तिथ»
कार्ल आर. पापर ने अपने लेख ‘द पावर्टी ऑफ हिस्टारिसीज्म’ में लिखा है, इतिहास का कोई अर्थ नहीं होता, क्योंकि इ»
भारत में जनसमर्थित आंदोलनों की पृष्ठभूमि बमुश्किल एक सदी पुरानी है. 20वीं सदी के पूर्वांर्ध में देश ने आधुनिक प्रकार के»