वैचारिक उपनिवेश का नया नाम है आधुनिकता
हर समय की अपनी समस्याएं होती हैं, जिनकी जड़ें नजदीक या दूर के इतिहास में पाई जाती हैं। इसलिए उस समय पर ध्यान दिया»
हर समय की अपनी समस्याएं होती हैं, जिनकी जड़ें नजदीक या दूर के इतिहास में पाई जाती हैं। इसलिए उस समय पर ध्यान दिया»
भारत के बारे में कार्ल मार्क्स की जानकारी बहुत सतही थी। अपने जीविकोपार्जन के लिए कार्ल मार्क्स ने अमेरिकी अखबारों के लिए»
भीमा कोरेगांव की हिंसा के सिलसिले में महाराष्ट्र पुलिस ने अनेक स्थानों पर छापे मारकर पांच लोगों को गिरफ्तार किया»
मालदीव छोटे-छोटे द्वीपों वाला चार लाख आबादी का छोटा-सा देश है। इस छोटे से देश ने अपने यहां बड़ा परिवर्तन कर दिया ह»
शांत सरोवर में ‘कमल’ खिलता है। जो परिवार, समाज और देश अशांत है, वहां विकास की बदरंग तस्वीरे है। अल्पसंख्यकों के बीच बोहर»
आम चुनाव आते ही भारतीय राजनीति दलीय समर में बदल जाती है। अगले वर्ष आम चुनाव होने हैं और उसके लिए अभी से राजनैतिक»
अभी तो सिर्फ शुरुआत ही हुई है। बहुत पहले ही यह हो जाना चाहिए था। आश्चर्य तो इस बात पर है कि किसी प्रधानमंत्री को»
हमारे वेदों और पुराणों में जल, पृथ्वी, वायु, आकाश इत्यादि को देवों के रूप में वंदनीय माना गया है। इसी कारण हमने प»
सचमुच बहस इसे कहते हैं जो अब छिड़ी है। ‘बहस’ अरबी शब्द है। हिन्दी में खप गया है।लेकिन इसका मतलब अपने–अपने माफिक ल»
रामनाथ गोयनका के निधन से इंडियन एक्सप्रेस समूह पर ग्रहण लग गया। ऐसा हो ही नहीं सकता था कि जनसत्ता उससे अछूता रहे।»
सद्गुरु जग्गी वासुदेव का नदी अभियान विनोबा के भूदान आंदोलन सरीखा है। विनोबा ने तब के सबसे बड़े सवाल पर जनमत जगाया»
महात्मा गांधी से जब यूरोपीय सभ्यता के बारे में पूछा गया था तो उन्होंने इसकी खिल्ली उड़ाई थी। भारतीय दृष्टि से सभ्यता का आ»
उस समय भी रिलायंस ने सरकार में कितनी गहरी सुरंग बिछा ली थी यह जानने के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह की पुस्तक ‘मंजिल से ज्या»
पानी गिर रहा था। बहुत पानी गिर रहा था। बारिश की ये बूंदे उनके आंनद को चरम की ओर ले जा रही थी। ये ‘नई उम्र की नई फसल’ थी»
हिंदी को हिंद के माथे की बिंदी होनी चाहिए थी। क्या माथे की बिंदी बन पाई? सवाल का जवाब नैराश्य भरा है। बिंदी नहीं बन पाई।»
लगभग सौ वर्ष पूर्व 1917 में रूस में साम्यवादियों को सत्ता प्राप्त हुई थी। उससे पहले यूरोप में भी कार्ल मार्क्स और उनकी स»
अभी यूरोपीय जाति की शक्ति का आधार उसकी आर्थिक समृद्धि नहीं, उसकी प्रतिनिधि शक्ति अमेरिका की सामरिक अजेयता है। दूस»
खेती किसानी को लेकर बातें बहुत सारी हो रही। किसानों की समस्याओं के नाम पर आंदोलन हो रहे। या यूं कहें कि इन आंदोलनों के ज»
पिछली लगभग आधी शताब्दी तक पश्चिम के अर्थशास्त्री गैर-यूरोपीय देशों को यह समझाते रहे हैं कि उनकी गरीबी का कारण उनक»