भारत और म्यांमार के संबंध दक्षिण एशिया तथा दक्षिण-पूर्व एशिया की राजनीति में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। दोनों देश केवल भौगोलिक पड़ोसी ही नहीं हैं, बल्कि उनके बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक और सामरिक संबंध भी गहरे हैं। म्यांमार भारत का एकमात्र ऐसा पड़ोसी देश है जो दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच सेतु का कार्य करता है। यही कारण है कि भारत की “एक्ट ईस्ट नीति” में म्यांमार को विशेष महत्व प्राप्त है।
प्राचीन काल से ही भारत और म्यांमार के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक संपर्क रहे हैं। बौद्ध धर्म भारत से म्यांमार पहुँचा और वहाँ की संस्कृति तथा समाज का महत्वपूर्ण अंग बन गया। ब्रिटिश शासन के दौरान म्यांमार लंबे समय तक ब्रिटिश भारत का हिस्सा रहा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद दोनों देशों ने मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखे। वर्ष 1951 में दोनों देशों ने मित्रता संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसने द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा प्रदान की।
भारत और म्यांमार लगभग 1,600 किलोमीटर लंबी स्थलीय सीमा साझा करते हैं। यह सीमा भारत के चार पूर्वोत्तर राज्यों—अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम—से जुड़ी हुई है। इसके अतिरिक्त दोनों देशों की समुद्री सीमा भी बंगाल की खाड़ी में मिलती है। म्यांमार भारत के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार माना जाता है। इसलिए भारत की “एक्ट ईस्ट नीति” और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं में इसकी केंद्रीय भूमिका है।
भारत और म्यांमार के बीच व्यापारिक संबंध लगातार विकसित हो रहे हैं। भारत म्यांमार के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में से एक है। भारत म्यांमार से दालें, लकड़ी, खनिज पदार्थ और कृषि उत्पाद आयात करता है, जबकि भारत से
दवाइयाँ, मशीनरी, इस्पात, वाहन और अन्य औद्योगिक वस्तुएँ निर्यात की जाती हैं। दोनों देश व्यापार बढ़ाने और सीमा व्यापार को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक समझौते कर चुके हैं।
भारत म्यांमार में आधारभूत संरचना विकास की कई परियोजनाओं में भी सहयोग कर रहा है। इनमें कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट परिवहन परियोजना और भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। इन परियोजनाओं का उद्देश्य भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों से जोड़ना है।
भारत और म्यांमार के संबंधों का एक महत्वपूर्ण पक्ष सुरक्षा सहयोग है। दोनों देशों की सीमा कई विद्रोही समूहों और उग्रवादी गतिविधियों से प्रभावित रही है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय कुछ उग्रवादी संगठन सीमा पार म्यांमार के क्षेत्रों का उपयोग करते रहे हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए दोनों देशों ने संयुक्त सैन्य अभियानों और खुफिया सहयोग को बढ़ावा दिया है।इसके अलावा मादक पदार्थों की तस्करी, हथियारों की अवैध आवाजाही और सीमा पार अपराध भी दोनों देशों के लिए चिंता का विषय हैं। हाल के वर्षों में भारत-म्यांमार सीमा पर ड्रग्स तस्करी की घटनाओं ने सुरक्षा सहयोग के महत्व को और बढ़ा दिया है।
भारत और म्यांमार के बीच सांस्कृतिक संबंध अत्यंत मजबूत हैं। बौद्ध धर्म दोनों देशों को जोड़ने वाली प्रमुख कड़ी है। म्यांमार के लाखों लोग भारत को भगवान बुद्ध की भूमि मानते हैं और बोधगया, सारनाथ तथा कुशीनगर जैसे बौद्ध तीर्थस्थलों की यात्रा करते हैं। इसके अतिरिक्त म्यांमार में भारतीय मूल के लोगों की बड़ी संख्या निवास करती है, जो दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक पुल का कार्य करती है।
भारत की “एक्ट ईस्ट नीति” का उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ आर्थिक, सामरिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करना है। इस नीति की सफलता काफी हद तक म्यांमार पर निर्भर करती है क्योंकि यह भारत और आसियान देशों के बीच भूमि संपर्क प्रदान करता है। भारत-म्यांमार-थाईलैंड राजमार्ग जैसी परियोजनाएँ क्षेत्रीय संपर्क को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
भारत-म्यांमार संबंधों के समक्ष कई चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। वर्ष 2021 में म्यांमार में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी है। इससे लोकतंत्र, मानवाधिकार और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रश्न उत्पन्न हुए हैं। भारत को एक ओर लोकतांत्रिक मूल्यों का समर्थन करना है, वहीं दूसरी ओर अपनी सुरक्षा और सामरिक हितों की रक्षा भी करनी है।म्यांमार में जारी संघर्ष के कारण बड़ी संख्या में लोग भारत के मिजोरम और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में शरण लेने पहुँचे हैं। इससे मानवीय और सुरक्षा दोनों प्रकार की चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं।
इसके अतिरिक्त चीन का बढ़ता प्रभाव भी भारत के लिए चिंता का विषय है। चीन म्यांमार में बड़े पैमाने पर निवेश और आधारभूत संरचना परियोजनाओं के माध्यम से अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहा है। भारत के लिए आवश्यक है कि वह म्यांमार के साथ अपने संबंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाए रखे ताकि क्षेत्रीय संतुलन कायम रह सके।
