भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही है कि यहां कुछ भी स्थायी नहीं होता। न दोस्ती, न दुश्मनी, न विचारधाराएं और न ही वे बयान, जिन्हें कभी अंतिम सत्य बताकर जनता के सामने प्रस्तुत किया गया था। जो नेता कल तक एक-दूसरे को लोकतंत्र का सबसे बड़ा खतरा बता रहे थे, वे आज लोकतंत्र बचाने के लिए साथ आने की अपील करते दिखाई दे सकते हैं। राजनीति में समय के साथ बहुत कुछ बदलता है—सिर्फ पुराने भाषणों के वीडियो नहीं बदलते।
इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इन दिनों कुछ क्षेत्रीय दलों के कांग्रेस में संभावित विलय की चर्चाएं फिर से सुर्खियों में हैं। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई दलों का जन्म ही कांग्रेस के विरोध से हुआ था। उनके संस्थापकों ने कांग्रेस की नीतियों, नेतृत्व और कार्यशैली की आलोचना करते हुए अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई थी। जनता को वर्षों तक समझाया गया कि कांग्रेस समस्या है और क्षेत्रीय दल समाधान।
लेकिन राजनीति में समय सबसे बड़ा मरहम भी है और सबसे बड़ा रणनीतिकार भी। वह पुराने घाव भर देता है, पुराने बयान भुला देता है और पुराने विरोधियों को नए सहयोगियों में बदल देता है। लगता है कि कई दलों को अब यह एहसास होने लगा है कि जिस घर को कभी छोड़कर वे निकले थे, वह घर इतना भी बुरा नहीं था। मानो वर्षों तक स्वतंत्र जीवन जीने के बाद किसी को यह याद आ गया हो कि पैतृक संपत्ति में उसका हिस्सा अभी भी बाकी है।
दिल्ली में बैठकों का दौर चल रहा है। विपक्षी एकता, लोकतंत्र की रक्षा, संविधान की सुरक्षा और राष्ट्रीय हित जैसे गंभीर विषयों पर चर्चा हो रही है। तस्वीरें खिंच रही हैं, मुस्कानें बांटी जा रही हैं और राजनीतिक विश्लेषक नए समीकरणों का
गणित समझाने में लगे हैं। लेकिन असली चुनौती दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में नहीं, बल्कि उन जिला और ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच है जिन्होंने पिछले दो-तीन दशकों तक एक-दूसरे के खिलाफ राजनीति की है।
कल्पना कीजिए उस कार्यकर्ता की स्थिति, जिसने अपने राजनीतिक जीवन का बड़ा हिस्सा किसी क्षेत्रीय दल या कांग्रेस के विरोध में बिताया हो। जिसने चुनावों में पर्चे बांटे हों, नारे लगाए हों, बहसें की हों और जनता को यह विश्वास दिलाया हो कि सामने वाला दल प्रदेश के विकास की सबसे बड़ी बाधा है। अब अचानक उसे बताया जा रहा है कि जिनके खिलाफ वह कल तक संघर्ष कर रहा था, वे आज उसके राजनीतिक सहयोगी हैं।कार्यकर्ताओं के लिए यह राजनीतिक रणनीति कम और भावनात्मक झटका ज्यादा है।
हालांकि सत्ता की राजनीति का अपना अलग ही दर्शन है। जब तक सत्ता की मलाई मिलती रहती है, तब तक वैचारिक मतभेद लोकतांत्रिक विविधता कहलाते हैं। लेकिन जैसे ही सत्ता हाथ से फिसलती है, पुराने विरोधी अचानक लोकतंत्र के साथी, संविधान के रक्षक और राष्ट्रहित के सहयोगी बन जाते हैं। कल तक जो एक-दूसरे की कमियां गिना रहे थे, आज एक-दूसरे की खूबियां खोजने में व्यस्त दिखाई देते हैं।फिर आती है सबसे बड़ी चुनौती—सत्ता और नियंत्रण की।
भारत के अधिकांश क्षेत्रीय दल किसी संगठन से अधिक एक राजनीतिक व्यक्तित्व के विस्तार की तरह दिखाई देते हैं। वहां नेता ही पार्टी होता है और पार्टी ही नेता। संगठनात्मक लोकतंत्र की चर्चा उतनी ही दुर्लभ होती है जितनी चुनावी मौसम में आत्मालोचना। ऐसे दलों में अंतिम निर्णय का अधिकार प्रायः एक व्यक्ति या एक परिवार के इर्द-गिर्द केंद्रित रहता है।
ऐसे में कांग्रेस में विलय का अर्थ केवल झंडा बदलना नहीं है। इसका अर्थ है कि वर्षों से अपने राज्य के निर्विवाद शासक रहे नेता को अब दिल्ली की ओर भी देखना पड़ेगा। जिनके एक संकेत पर पूरी पार्टी चलती थी, उन्हें अब किसी बड़े ढांचे का हिस्सा बनना होगा।यह स्थिति कुछ वैसी है जैसे कोई राजा स्वेच्छा से किसी विशाल साम्राज्य का सूबेदार बनने के लिए तैयार हो जाए। सम्मान तो मिलेगा, लेकिन पूर्ण स्वतंत्रता नहीं। पद तो मिलेगा, लेकिन अंतिम निर्णय का अधिकार नहीं।यहीं से असली बेचैनी शुरू होती है।
विलय की चर्चा होते ही पार्टी के भीतर हलचल तेज हो जाती है। कुछ विधायक अचानक क्षेत्रीय अस्मिता के सबसे बड़े रक्षक बन जाते हैं। कुछ नेताओं को संगठन की स्वतंत्र पहचान की चिंता सताने लगती है। कुछ कार्यकर्ता विचारधारा की दुहाई देने लगते हैं। और कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें अचानक दूसरे राजनीतिक दलों के दरवाजे अत्यंत आकर्षक लगने लगते हैं।
राजनीतिक भाषा में इसे “आंतरिक असंतोष” कहा जाता है।आम जनता इसे “जहाज डूबने से पहले लाइफबोट की तलाश” के नाम से जानती है।यही कारण है कि क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के बीच संभावित विलय केवल राजनीतिक गणित का विषय नहीं है, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न भी है। राजनीति में सिद्धांत महत्वपूर्ण हो सकते हैं, विचारधारा भी महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन कई बार इन सबसे बड़ा शब्द होता है—अस्तित्व।
जब राजनीतिक जमीन खिसकने लगती है, जनाधार सिकुड़ने लगता है और भविष्य अनिश्चित दिखाई देने लगता है, तब पुराने विरोध भी नए अवसरों में बदलने लगते हैं। क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय संरक्षण चाहिए, जबकि कांग्रेस को राज्यों में संगठनात्मक और जनाधार संबंधी मजबूती की आवश्यकता है। रणनीतिकारों को चुनावी गणित चाहिए और समाचार चैनलों को बहस के लिए नया विषय।
सभी को कुछ न कुछ मिलता हुआ दिखाई देता है।लेकिन इस पूरे समीकरण में सबसे कठिन भूमिका उस कार्यकर्ता की है, जिसे कल तक विरोध करना सिखाया गया था और आज गले मिलना सिखाया जा रहा है। उसे यह भी समझना है कि पुराने भाषणों को भूलना क्यों आवश्यक है और नए भाषणों पर विश्वास करना क्यों जरूरी है।
शायद यही भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा चमत्कार है। यहां विचारधाराएं बदल सकती हैं, बयान बदल सकते हैं, गठबंधन बदल सकते हैं और इतिहास की नई व्याख्याएं भी लिखी जा सकती हैं। राजनीतिक स्मृतियों को नए संदर्भों में परिभाषित किया जा सकता है और पुराने विरोध को नई दोस्ती का आधार बताया जा सकता है।
लेकिन जनता के मन में कुछ प्रश्न हमेशा जीवित रहते हैं।यदि वे इतने ही अच्छे थे, तो अलग क्यों हुए थे?और यदि इतने ही बुरे थे, तो अब साथ क्यों हो रहे हैं?इन प्रश्नों के उत्तर शायद अगले चुनाव से ठीक पहले मिल जाएंगे। तब इसे राजनीतिक मजबूरी नहीं, बल्कि “ऐतिहासिक वैचारिक एकता”, “लोकतंत्र की रक्षा” और “राष्ट्रीय हित में लिया गया दूरदर्शी निर्णय” जैसे आकर्षक नाम दिए जाएंगे।
आखिर भारतीय राजनीति में स्थायी केवल एक ही विचारधारा है—सत्ता के समीकरण। बाकी घर छोड़ना भी आंदोलन होता है और घर लौटना भी उपलब्धि।
( द्वारा -कमलाकांत पाठक)
