पश्चिम एशिया की राजनीति पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली है। लंबे समय तक अरब देशों और इज़राइल के बीच दुश्मनी का माहौल रहा, लेकिन वर्ष 2020 में हुए “अब्राहम अकॉर्ड” ने इस क्षेत्र की कूटनीति को नई दिशा दी। यह समझौता केवल अरब देशों और इज़राइल के रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे एशिया, खासकर पाकिस्तान जैसे देशों पर भी पड़ रहा है। आज पाकिस्तान के सामने यह बड़ा प्रश्न खड़ा है कि क्या वह पारंपरिक नीति पर कायम रहे या बदलते वैश्विक समीकरणों के अनुसार अपनी रणनीति बदले।
अब्राहम अकॉर्ड अमेरिका की मध्यस्थता में हुआ एक ऐतिहासिक समझौता है। इसके तहत संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और सूडान जैसे देशों ने इज़राइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए। इस समझौते का उद्देश्य पश्चिम एशिया में शांति, व्यापार, तकनीक और सुरक्षा सहयोग को बढ़ाना था।अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया था। इस समझौते के बाद अरब देशों और इज़राइल के बीच व्यापार, रक्षा, पर्यटन और तकनीकी सहयोग तेजी से बढ़ा।
पाकिस्तान शुरू से ही फिलिस्तीन के समर्थन में खड़ा रहा है। पाकिस्तान ने कभी भी इज़राइल को औपचारिक मान्यता नहीं दी। उसका कहना है कि जब तक फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा नहीं मिलता, तब तक वह इज़राइल के साथ
संबंध स्थापित नहीं करेगा।पाकिस्तान की यह नीति उसकी घरेलू राजनीति और धार्मिक भावनाओं से भी जुड़ी हुई है। वहां के कई धार्मिक संगठन और राजनीतिक दल इज़राइल के खिलाफ सख्त रुख रखते हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान की सरकारें खुलकर इज़राइल के साथ संबंध बनाने से बचती रही हैं।
पाकिस्तान आर्थिक संकट से जूझ रहा है। उसे अंतरराष्ट्रीय निवेश, व्यापार और वित्तीय सहायता की जरूरत है। ऐसे में खाड़ी देशों की बदलती नीतियों का असर पाकिस्तान पर पड़ना स्वाभाविक है। यूएई और सऊदी अरब पाकिस्तान के महत्वपूर्ण आर्थिक सहयोगी हैं। यदि ये देश इज़राइल के साथ खुलकर काम कर रहे हैं, तो पाकिस्तान के लिए पुरानी नीति पर पूरी तरह टिके रहना कठिन होता जा रहा है।पाकिस्तान में इस मुद्दे पर दो तरह की सोच दिखाई देती है। एक वर्ग मानता है कि पाकिस्तान को व्यावहारिक राजनीति अपनाते हुए इज़राइल के साथ सीमित संबंध बनाने चाहिए। उनका तर्क है कि इससे व्यापार, तकनीक और कृषि क्षेत्र में पाकिस्तान को लाभ मिल सकता है।
दूसरी ओर कट्टरपंथी और धार्मिक समूह इसका विरोध करते हैं। उनका कहना है कि इज़राइल के साथ संबंध बनाना फिलिस्तीन के साथ विश्वासघात होगा। यही कारण है कि पाकिस्तान की सरकारें इस विषय पर खुलकर कोई निर्णय नहीं ले पा रही हैं।कुछ वर्षों पहले पाकिस्तान के कुछ पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के इज़राइल दौरे की खबरें भी सामने आई थीं, जिससे यह चर्चा और तेज हो गई थी कि पाकिस्तान भविष्य में अपनी नीति बदल सकता है।
भारत पहले ही इज़राइल और अरब देशों दोनों के साथ मजबूत संबंध बना चुका है। अब्राहम अकॉर्ड के बाद भारत को पश्चिम एशिया में नई आर्थिक और रणनीतिक संभावनाएँ मिली हैं। भारत, यूएई, इज़राइल और अमेरिका के बीच बने नए सहयोग समूह ने व्यापार और तकनीकी साझेदारी को नई गति दी है।
यदि भविष्य में पाकिस्तान भी इस दिशा में कदम बढ़ाता है, तो दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। हालांकि फिलहाल पाकिस्तान के लिए यह फैसला आसान नहीं है।पाकिस्तान आज एक दुविधा में खड़ा है। एक तरफ उसकी पारंपरिक फिलिस्तीन समर्थक नीति है, तो दूसरी ओर बदलती वैश्विक राजनीति और आर्थिक जरूरतें हैं।आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पाकिस्तान अपनी पुरानी नीति पर कायम रहता है या व्यावहारिक कूटनीति अपनाते हुए नई दिशा में कदम बढ़ाता है। इतना तय है कि अब्राहम अकॉर्ड ने पाकिस्तान सहित पूरे मुस्लिम जगत की राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला है।
