कला और संस्कृति की भूमिका – रामबहादुर राय

रामबहादुर राय

यह महासंकट का समय है। ऐसे समय में मनोवृति कैसे बदल जाती है इसे यह घटना बताती है एक सौ चैदह साल पुरानी बात है। महात्मा गांधी आचार्य जे.बी. कृपलानी को अपना एक बाजू मानते थे। उन्हीं के छात्र जीवन की यह घटना है। कृपलानी जी अपने छात्र जीवन में चंचल और अत्यंत भ्रमणशील थे। लेकिन मुंबई में प्लेग फैल गया। वे अपने छात्रावास के कमरे में रहने के लिए विवश थे। उन दिनों वे अखबार केवल यह जानने के लिए पढ़ते थे कि आज कितनी मौतें हुई हैं। इस समय भी पूरा देश, समाज और दुनिया भी कोरोना की महामारी को संभव है कि कृपलानी जी के नजरिए से देख रही हो।

हर संकट एक अवसर भी होता है। जे.बी. कृपलानी विल्सन काॅलेज के छात्र थे। अगर प्लेग की महामारी के कारण वे अपने छात्रावास के कमरे में एकांतवास के लिए विवश न होते तो ‘न्यू इंडिया’ नहीं पढ़ पाते। उसे बिपिन चंद्र पाल वैचारिक क्रांति के लिए निकालते थे। लाल-बाल-पाल त्रिमूर्ति में से एक बिपिन चंद्र पाल से षायद ही वे जुड़ पाते। वे स्वाधीनता आंदोलन में आते या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता। लेकिन इतना तो पूरी तरह सच है कि ‘न्यू इंडिया’ पढ़ने मात्र से कृपलानी का रूपांतरण हो गया। वे क्रांतिकारियों से जुड़े। फिर चंपारण सत्याग्रह में महात्मा गाधी के सहयोगी बने।

आज की चुनौती एक भ्रम को ध्वस्त कर रही है। हमें यह भारी भ्रम हो गया था कि हम सबसे अधिक सुविधा प्राप्त पीढ़ी हैं। यह धारणा हमने बना ली थी। इस कारण जो नहीं करना चाहिए वह भी कर रहे थे। यह संकट हमारे सामने बड़ा प्रश्न उपस्थित करता है। हमें पुनर्विचार का एक अवसर दे रहा है। इस संकट से हम अधिक आत्मिक रूप से समृद्ध होकर निकले, इसके लिए जरूरी है कि अपनी ज्ञान परंपरा को याद करें। ऐसा लोग कर भी रहे हैं। यह जहां अवसर है वहीं एक चुनौती भी हमारे सामने है।

ऐसे समय में कला और संस्कृति की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। शर्त यह है कि इसे ध्यान में रखें। और इस पर सोच विचार शुरू करें। आज एक तरह का मानसिक भय और उससे उत्पन्न दहषत का वातावरण है उसका एक दुश्चक्र सा बनता अनुभव किया जा रहा है। ऐसे समय में कला, कलाकार, संस्कृति और उसको अपने जीवन में उतारने वाले महापुरूषों के उदाहरणों से सहारा मिलता है। भविष्य की राह मिलती है। चुनौती का सामना कैसे करें और जो जीवन है उसे कैसे सार्थक ढंग से जिए। यह समझ भी पैदा होती है।

प्रश्न यह भी है कि कला को कैसे समझें। इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि कला से अपेक्षा क्या है? इस विवाद में न भी पड़े कि यह संकट क्या षड़यंत्र है? क्या प्रकृति प्रदत्त है? इस महामारी का मूल कारण क्या है? ऐसे प्रश्न विवादों के हैं। इनसे परे रहकर भी कला के बारे में बात की जा सकती है। विवाद में यह सामर्थ्य नहीं है कि वह उत्तर दे सके। आज जरूरत है उत्तर की। जिस उत्तर में संवाद, शांति, सदभाव, प्रेम और करूणा होगी वह ही समाधान दे सकेगा। जरूरत समाधान की है। यह क्षमता कला में है।

कला क्या है? इसे या तो तुलना से समझा जा सकता है या इसकी परिभाषा से। एक संत हुए हैं जो कहते थे कि विज्ञान है सत्य की खोज, धर्म है सत्य का अनुभव और कला है सत्य की अभिव्यक्ति। लेकिन हम यह पाते हैं कि ज्यादातर बड़े वैज्ञानिक भी अपने जीवन के अंतिम चरण में धर्म की ओर झुके। उसे समझने का प्रयास किया। आइस्ंटीन के बारे में यह बात ज्यादा सच है। धर्म की अनुभूति जब प्रकट होने के लिए आतुर हो जाती है तब कला का जन्म होता है। हमारे संत-महात्मा, समाज सुधारक और भारत विद्या के विद्वान अध्येताओं ने एक सांस्कृतिक भावभूमि बनाई। उससे समाज ने शक्ति अर्जित की। जहां जरूरी हुआ वहां सुधार किए। जीवन के संग्राम को सहज बनाया और जीता। उन लोगों ने जो कहा वह कला थी। धर्म की कला थी। हजारों साल से उसकी एक परंपरा है। इसी अर्थ में परमात्मा को हमने पहला कलाकार माना है।

हम यह सोचें कि जब यह संकट समाप्त होगा और उम्मीद है कि जल्दी ही उससे देश-दुनिया निकल जाएगी तब क्या किया जाना चाहिए जिससे सांस्कृतिक समृद्धि आए। उससे पुनर्निमाण की चुनौती सरल हो जाएगी। इसलिए यह जरूरी है कि सांस्कृतिक सृजन पर विचार हो। कला सृजन है। नवसृजन का माध्यम है। जब कोई अपने हृदय और आत्मा से जीने लगता है तब वह कलाकार की भूमिका में होता है। मैंने कहीं पढ़ा है कि कला उस दिन पैदा होती है जिस दिन व्यक्ति बांस की पोंगरी हो जाता है। जिस दिन वह कहता है-मैं नहीं हूं, तू ही है। संभवतः ऐसे ही समय के लिए भारतविद वासुदेव शरण अगवाल ने लिखा-‘काल के सतत प्रवाही क्रम में बारंबार कला के लिए प्राणवंत युगों का आवाहन करना होगा। ऐसा करते हुए मानव स्वयं अपने ही केंद्र को किसी अमृत प्रेरणा की पूर्ति करेगा।’

एक लोककथा है कि एक बहुत बड़ा मूर्तिकार हुआ। उसने एक पत्थर हो खोद कर मूर्ति बनाई। राह से जो लोग भी निकलते थे वे उस मूर्तिकार को धन्यवाद देते जाते थे कि अदभुत हो तुम, इतनी सुंदर मूर्ति बनाई। वह उन्हें बताता था मैंने मूर्ति बनाई नहीं। मैं यहां से गुजरता था, इस पत्थर में छिपी मूर्ति ने मुझे पुकारा। मैंने तो सिर्फ बेकार पत्थरों को अलग किया है। मूर्ति तो छिपी थी, वह प्रकट हो गई। अब मैं कह सकता हूं कि जो मूर्ति के भीतर से मुझे बुलाया, उसी ने मेरे भीतर से सुना। नहीं तो मैं सुन कैसे सकता था? इसे मैं बोध कथा कहना चाहूंगा। इस समय भी यह प्रासंगिक है। जो चुनौती को सुन सकता है वही वास्तव में कलाकार है। ऐसे समय में जब विज्ञान ठहर जाता है और उसे राह नहीं दिखती तब अनुभूति कला के रूप में प्रकट होती है। कलाकार का संबंध सत्य के संसार से है। उसका जीवन संसार को सुरूचिपूर्ण बनाने के लिए समर्पित होता है। यहां कला के प्रकारों की चर्चा जरूरी नहीं है। कला का प्रयोजन समझ लें तो उसकी अभिव्यक्ति कैसे होगी यह कलाकार का अपना विशय हो जाता है।

महात्मा गांधी ने एक बार कहा-‘हिन्दुस्तान की कला जैसे-जैसे हमारी समझ में आएगी, वैसे-वैसे वह हमें उपर उठाती जाएगी।’ साहित्यकार प्रेमचंद ने लेखक संघ के लखनऊ अधिवेषन में कहा-‘जो आदमी सच्चा कलाकार है वह स्वार्थमय जीवन का प्रेमी नहीं हो सकता।’ अज्ञेय का यह कथन है-‘पश्चिम का कलाकार रूप (फार्म) की खिड़की से देखकर वस्तु को संवेद्य बनाता है, उसका संप्रेशण करता है। भारत का कलाकर प्रतीक की खिड़की से वस्तु को नहीं, वस्तु के पार वस्तुसत् को संवेद्य बनाता है।’ कवि सुमित्रा नंदन पंत-‘कला-प्राण है मनुज, सृष्टि यह ब्रह्म की कला।’ राजर्षि भतृहरि ने कला के बारे में जो कहा है वह सब जानते हैं।

मैंने कहीं पढ़ा है कि यूरोप में इनी-गिनी सात कलाएं हैं। उसी में वह सिमटी हुई हैं। क्या हम जानते हैं? जरूर जानते होंगे। सिर्फ याद दिला रहा हूं कि भारत में 64 कलाओं और पांच सौ उप कलाओं की छटा बहुत पहले से है। सत्यं-शिवम्-सुंदरम उनसे प्रकट होता है। जो सवर्था सत्य है, वही कला है। कला श्रष्टि मंगल के लिए होती है। कला ही ज्ञान का प्रकाष करती है। वह समाज में, मनुष्य में प्रयोजन पैदा करती है। जीने का अर्थ बताती है। कला का अर्थ ही है जो आनंद का सृजन करें।

संस्कृति

आधुनिक मुहावरे में संस्कृति की एक से अधिक परिभाषाएं प्रचलित हैं। समाज विज्ञानियों में भी संस्कृति की परिभाषा के बारे में मतैक्य नहीं है। लेकिन यह तो सभी मानते हैं कि संस्कृति का अनिवार्य संबंध मूल्य दृष्टि से होता है। हम परंपरा से चले आ रहे मूल्यों को पहचान लें और स्वीकार कर लें। लेकिन सांस्कृतिक मूल्य दृष्टि की चेतना उसकी अर्थवत्ता की अनवरत खोज की प्रक्रिया है। इस बारे में सोचने से पहले हमें उन महापुरूषों के कथन को याद करना चाहिए जिन्होंने संस्कृति की समझ दी। काकाकालेलकर को कौन नहीं जानता! वे इसी नाम से विख्यात थे। लेकिन उनका पूरा नाम है-दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर। उन्होंने लिखा है कि ‘संस्कृति को समाज की आत्मा कहना चाहिए।’ कामायनि के रचयिता जयशंकर प्रसाद की दृष्टि में ‘संस्कृति सौंदर्यबोध के विकसित होने की मौलिक चेष्टा है।’ डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी अपने व्याख्यानों में बताते थे कि ‘संस्कृति मनुष्य की विविध साधनाओं की सर्वोत्तम परिणति है।’ दादा धर्माधिकारी ने कहा है ‘संस्कृति का असली अर्थ है-‘जीवन में साझेदारी’। दूसरे के जीवन में शामिल होना और दूसरे को अपने जीवन में शामिल करना संस्कृति है।’ उमाशंकर जोशी एक बड़े विचारक और साहित्यकार हुए हैं। वे गुजरात से थे। उन्होंने यह परिभाषा दी- ‘किसी भी देश की संस्कृति उस देश में मानव-द्वारा निर्मित साधन-सामग्री तथा उसके द्वारा निर्मित संस्थाओं, रूढ़ियों, धार्मिक परंपराओं, विचारसरणियों, जीवन-मूल्यों आदि का समग्र योग है।’

योगी शिवानंद का कहना था कि ‘सच्ची संस्कृति मस्तिष्क, हृदय और हाथ का अनुशासन है।’ अज्ञेय कहते थे कि ‘सांस्कृतिक अस्मिता अपनी ही सही पहचान से बनती है। सांस्कृतिक जीवन के बारे में ही यह बात सबसे अधिक सत्य है कि ‘हम वही बन सकते हैं जो हम हैं।’ महान विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने इन शब्दों में संस्कृति को समझाया है- ‘संसार में एकता के दर्शन कर उसके विविध रूपों के बीच परस्पर पूरकता को पहचान कर, उनमें परस्परानुकूलता का विकास करना तथा उसका संस्कार करना ही संस्कृति है। प्रकृति को ध्येय की सिद्धि के अनुकूल बनाना संस्कृति है और उसके प्रतिकूल बनाना विकृति है।’ संस्कृति के बारे में बात करें और डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का स्मरण न करें तो बात अधूरी रहेगी। इसलिए यह हम जानें कि उनका संस्कृति के बारे में विचार क्या था? उन्होंने अनेक अवसरों पर कहा कि ‘मानव जाति को अगर कोई चीज गरिमा प्रदान कर सकती है, तो वह है उसका सांस्कृतिक प्रयास। कोई भी संस्कृति तब तक चिरस्थाई नहीं हो सकती, जब तक वह इस प्रयास का समर्थन नहीं करती और मनुष्य में यह विश्वास नहीं जगाती कि वह जिस जागतिक प्रक्रिया में भाग ले रहा है, उसके मूल स्वभाव को समझने की अंतरदृष्टि भी उसमें है। संसार, एक देह के रूप में तो एकीभूत हो गया है, परंतु वह अपनी आत्मा की तलाश में भटक रहा है।’ वह तलाश ही वास्तव में संस्कृति है।

आम तौर पर बोलचाल में हम संस्कृति और सभ्यता का घालमेल कर देते हैं। पर संस्कृति और सभ्यता में बड़ा अंतर है। संस्कृति उन गुणों का समुदाय है जो व्यक्ति, समाज, साहित्य, चिंतन को समृद्ध और साफ सुथरा बनाती है। चिंतन और कलात्मक सृजन की वे सारी क्रियाएं संस्कृति का अंग होती हैं जो मानव जीवन के लिए प्रत्यक्ष रूप में उपयोगी न दिखाई देने पर  भी उसे समृद्ध बनाती हैं। इसमें शास्त्र, दर्शन, उपनिषद का चिंतन, साहित्य और ललित कलाएं आदि को रख सकते हैं। इसके समानंतर सभ्यता में अविष्कार, उत्पादन के साधन, सामाजिक राजनीतिक संस्थाओं की गणना होती है। जिनके द्वारा मनुष्य की जीवन यात्रा चलती है। संस्कृति मनुष्य का व्यवहार है और सभ्यता उसके क्रियाकलाप।  यहां मेट्रो के उदाहरण से सभ्यता और संस्कृति का अंतर समझ सकते हैं। मेट्रो सभ्यता है। जो उसमें आते-जाते हैं उनका दृष्टिकोण, आचरण, और दूसरे यात्री से व्यवहार को संस्कृति कह सकते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि ‘संस्कृति किसी समाज में पाई जाने वाली उच्चतम मूल्यों की वह चेतना है जो सामाजिक प्रथाओं, व्यक्तियों की चित्तवृतियों, भावनाओं, मनोवृतियों, आचरण के साथ-साथ उसके द्वारा भौतिक पदार्थाें को विशिष्ट स्वरूप दिए जाने में अभिव्यक्त होती है।’

रवींद्र नाथ ठाकुर ने बड़े रोचक ढंग से संस्कृति को इस तरह समझाया है, ‘अपने घर के एक कोने के लिए यदि हमें एक दीपक जलाना हो, तो उसके लिए हमें कितना आयोजन करना पड़ता है, उसके लिए कितने लोगों पर निर्भर करना पड़ता है! कहां सरसों बोई जाती है, कहां तेल निकाला जाता  है, कहां उसका क्रय-विक्रय होता है, उसके बाद दीप संजोने के लिए कितना उद्योग करना पड़ता है, और तब, इतनी जटिलता के बाद, जो प्रकाश मिलता है वह कितना अल्प होता है! उससे घर का काम तो चल जाता है, किंतु बाहर का अंधकार दूना घनीभूत हो उठता है। विश्व-प्रकाशक सूर्य का प्रकाश ग्रहण करने के लिए हमें किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता, उसकी हमें रचना नहीं करनी पड़ती, केवल जगना होता है। आंखें खोलकर घर का दरवाजा खोलते ही उस आलोक को फिर कोई रोक कर नहीं रख सकता।’ यह जागना ही सचेत होना है। और यही संस्कृति है। दुनिया में जब-जब अंधेरा होता है तो साथ-साथ जागरण का क्रम भी चलता है। यूरोप में जागरण जो हुआ उससे कभी साम्राज्यवाद निकला। लेकिन वहां के विद्वान उसे यूरोप में उत्पन्न वैचारिक क्रांति का सुखद परिणाम मानते थे। इसका वे डंका जब बजा रहे थे। उस समय भारत अपनी स्वतंत्रता के संघर्श में रत था।  लेकिन पश्चिम के प्रबल वैचारिक तूफान का भी सामना कर रहा था। उस समय एक बड़ा वर्ग भारत में था जो यह समझता था कि पष्चिम की नकल करके, उनके जीवन मूल्यों को स्वीकार कर और अपने जीवन की समस्याओं के प्रति उनके दृश्टिकोण को अपना कर हम भारतीय भी उनकी षक्ति, कुषलता और जैसा पष्चिम में लोग जीवन का आनंद ले रहे हैं वैसा हम भी प्राप्त कर सकते हैं। उससे एक हीन सभ्यता पैदा होने लगी। लेकिन उसी समय भारत में ऐसे लोग भी थे जिन्होंने ठहर कर सोचना शुरू किया। अपने अतीत को याद किया। युगों के अनुभव और संस्कार से उत्पन्न अपने स्वधर्म को पहचाना।

ऐसा करना ही सांस्कृतिक क्रांति है। पुराने शब्दों पर नए अर्थ की कलम लगाने की यह प्रक्रिया है। इस तरह भारतीय स्वभाव के अनुसार अपनी राह बनाने के प्रयास प्रारंभ हुए। उसमें कुछ सफलता भी मिली। उदाहरण के लिए पश्चिम के संपर्क और संसर्ग से जिस नए संप्रदाय का जन्म हुआ वह ब्रह्म समाज था। बंगाल में ब्रह्म समाज ने महान व्यक्तियों को जन्म दिया। लेकिन वह जन-जन तक नहीं पहुंच सका। पूरी दुनिया तो छोड़िए समस्त भारत का ध्यान भी वह अपनी तरफ आकर्शित नहीं कर सका। यह असंभव कार्य कर दिखाया एक देशज भारतीय आंदोलन ने। वह सांस्कृतिक जागरण की गंगोत्री बना। वे रामकृश्ण परमहंस थे। जिनसे प्रेरणा पाई-स्वामी विवेकानंद ने। उस आंदोलन ने जन-जन को जगाया। दुनिया में धूम मचाई। एक सिलसिला चल पड़ा। बंकिम, शरदचंद्र और रवींद्र नाथ ठाकुर का आगमन हुआ।

संस्कृति को समाज जीवन की लोकयात्रा समझना चाहिए। भारत के इतिहास में अगर झांके तो सोलहवीं सदी का भक्ति आंदोलन एक अंगड़ाई थी। ब्रिटिश शासन में चेतना का एक पुनर्जागरण हुआ। शिकागो के विश्व धर्म संसद का साल 1893 है। उस साल चार युगांतरकारी घटनाएं हुई। महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका पहुंचे। श्रीअरविंद भारत आए उनकी पुस्तक न्यू लेंप्स फार ओल्ड छपी। उसी तरह एनीबेसेंट भारत आईं। बालगंगाधर तिलक ने उसी साल गणपति पूजा प्रारंभ कराई। जो घटना विस्मरण में है वह पांचवीं है। माता जी तपस्विनी ने महाकाली पाठशाला स्थापित की। इसलिए कि हिन्दू धर्म अपनी आंतरिक सांस्कृतिक शक्ति से उठेगा। उस समय भारतीय संस्कृति के मूल स्वर पुनः उभरे और उसकी अनुगूंज पूरी दुनिया में फैली। उसी समय के आस-पास जब यूरोपीय विद्वान वहां के रिनेशा (नवजागरण) से मुग्ध थे। साम्राज्यवादी यूरोप अपने विजय अभियान का डंका बजा रहा था और भारत की संस्कृति में दोष और दुर्गणों को ही दुष्प्रचारित किया जा रहा था तब एक और मनीषी सामने आए। वे थे-आनंद कुमार स्वामी।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की पहली बैठक में अपने सहयोगियों से मैंने पूछा कि क्या आनंद कुमार स्वामी की धरोहर और उनका साहित्य यहां है? यह सुनकर एक सुखद अनुभव हुआ कि कला केंद्र में उनकी धरोहर सुरक्षित है। उनके बारे में प्रसिद्ध दार्शनिक एरिकगिल ने माना और बताया कि ‘मैं ऐसे किसी दार्शनिक को नहीं जानता जिसमें सभी योग्यताएं एंव शक्तियां विद्यमान हो। मेरा विश्वास है कि किसी अन्य लेखक ने कला एवं जीवन, धर्म और नीति पर इतने विवेक और अंतरदृष्टि से नहीं लिखा है जितना आनंद कुमार स्वामी ने सत्थ, चित और आनंद के अंतर संबंध को समझा है।’

हालांकि आनांद कुमार स्वामी की धरोहर कला केंद्र में अमेरिका के बोस्टन से मंगा ली गई थी। पर वह बक्सों में बंद थी। उसे विधिवत खुलवाया गया। इस तरह चार साल पहले इस राष्ट्रीय कला केंद्र ने पुनः आनंद कुमार स्वामी को समझने और समझाने का एक सिलसिला प्रारंभ किया। एक साल बाद यानी 2017 में प्रो. बी.बी. कुमार ने चिंतन सृजन का एक अंक उन पर निकाला। उसमें एक लेख विचारक और जनसत्ता के पूर्व संपादक बनवारी जी का है। उस लेख से यह अंश मैं उदृत करना चाहता हूं। ‘आज हमें भारतीय कलादृष्टि के बारे में आनंद कुमार स्वामी ने जो कहा है, उसे विशेष रूप से समझने की आवश्यकता है। अपने अंतिम दिनों में उन्होंने यह आशंका प्रकट की थी कि पश्चिमी शिक्षा के माध्यम से भारतीय यूरोपीय विचारों का अंधानुकरण करने लगे हैं। जब 1946 में उन्होंने जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ के बारे में सुना तो दुःख के साथ कहा कि ऐसे सभी लोग आधे भारतीय हैं और आधे यूरोपीय। उन्होंने व्यंग्य करते हुए पूछा कि नेहरू ने भारत को कब डिस्कवर किया।’

उसी लेख में बनवारी ने लिखा है- ‘आनंद कुमार स्वामी के समय यूरोप के कला-जगत की मान्यता थी कि कला की सार्थकता उसके कला होने में ही है। कला के लिए कला की इस अवधारणा को असंगत बताते हुए कुमारस्वामी ने कला और कलाकृति में अंतर किया। उन्होंने कहा कि कला उसके निर्माण करने वाले व्यक्ति की दृष्टि में होती है। उसकी दृष्टि में उसके समाज की मान्यताएं, मूल्य और सौंदर्यपूर्ण अंर्तभूत होते हैं हम या तो कुछ कर रहे होते हैं, या कुछ बना रहे होते हैं। जब हम विचारपूर्वक जीते होते हैं तो वह भगवद्गीता के अर्थ में कर्म होता है-शुभकर्म। जब हम विचारपूर्वक बना रहे होते तो वह कलात्मक वस्तु होती है। भारतीय दृष्टि से अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप हम विचारपूर्वक जो कुछ भी बनाते हैं, वह कलात्मक ही होता है। जब हम केवल अनुकरण करते हुए बनाते हैं तो वह बनाना कला नहीं है। अपने जीवन की सभी तरह की आवश्यकताओं के लिए जो भी विचारपूर्वक बनाया जाए, कला उसमें निहित है, उससे अलग नहीं है। विचार को परे रखकर बनाना कला नहीं है। इसलिए हम पाते हैं कि एक साधारण से करीगर की बनाई चीज में अधिक सुंदरता होती है, बजाय बड़े-बड़े नामी कलाविदों की बनाई कलाकृतियों के। भारत में मिट्टी के साधारण बर्तनों से लेकर देवमूर्तियों तक सभी चीजों में कला है। जब आप कला को सामान्य जीवन से अलग करके देखने लगते हैं, जैसा कि आधुनिक यूरोप में हुआ है, तब आप भटक जाते हैं।’ अगर हम भारतीय संस्कृति के सुपर कंमप्यूटर का की बोर्ड खोजना चाहते हैं और जानना चाहते हैं कि वह कहा है और कैसे उसे चलाया जा सकता है तो हमें आज भी आनंद कुमार स्वामी और श्रीअरविंद के लिखे को आत्मसात करना होगा।

वासुदेव शरण अग्रवाल का आनंद कुमार स्वामी से मिलना-जुलना था। उन्हें इस बात का अफसोस था कि कुमार स्वामी के निधन पर भारत में ज्यादा कुछ नहीं छपा। आशय यह है कि भारत ने आनंद कुमार स्वामी के प्रति जिज्ञासा भाव को न बनाया न बढ़ाया। उनके बारे में वासुदेव शरण अग्रवाल ने अपने लेख के अंत में जो सार दिया है वह आज भी प्रेरक है और हमेशा रहेगा। ‘कुमार स्वामी इस अर्द्ध शताब्दी (1947 तक) के महान् आचार्यों में से थे। उन्होंने जो ज्ञान धारा बहाई, उसका सलिल हमारे विकसित जीवन के लिए भविश्य में और भी आवश्यक होगा। वे कला को जीवन का अभिन्न अंग मानते थे। कला मन का कुतूहल नहीं और न बुद्धि का व्यसन है। कला का सच्चा आसन इससे बहुत ऊंचा है और उतना ही अनिवार्य है जितना साहित्य, धर्म, आध्यात्म और दर्षन का। जीवन-यापन की गहरी सच्चाई कला है। जीवन को सींचने वाले रस के रूप में कला पूर्वकाल में जीवित थी और भविश्य के लिए भी यही उसका पद है। मानवों के लिए कुमार स्वामी के जीवन का यही अनुभव-वाक्य था।’

अकबर इलाहावादी ने लिखा है-‘इशरती घर की मुहब्बत का मजा भूल गए, खा के लंदन की हवा अहदे-वफा भूल गए। पहुंचे होटल में तो फिर ईद की परवाह न रही, केक को चखके सेवाइयों का मजा भूल गए।’ उसी लंदन में आनंद कुमार स्वामी ने भारतीय जीवन, धर्म और दर्शन के बारे में फैले व्यापक अभियान को दूर करने के लिए खूब लिखा। उन्होंने भारतीय कला, कलादृश्टि, आख्यान, मूर्तिकला, चित्रकला और धार्मिक प्रतीकों को पूरी दुनिया के गले उतारा। साथ ही साथ इस विचार को लोगों के मानस में गहरे रूप से बैठाया कि ‘आधुनिक पाश्चात्य संस्कृति जीवन जीने योग्य नहीं है।’

आज परिस्थितियां दिखती संकटपूर्ण हैं। परंतु अनुकूलताएं भी कम नहीं हैं। उन्हें चिंहित करने के लिए हमें श्रीअरविंद को याद करना चाहिए। उन्होंने किसी संस्कृति के जीवन मूल्य की जांच के कुछ मापदंड बताएं थे। वह यह कि उस संस्कृति के जीवन विषयक मौलिक विचार, आदर्श और उसके गतिछंदों की शक्ति किसी भी परिस्थिति में कितनी बनी रहती है। इस आधार पर उन्होंने भारतीय संस्कृति को अक्षुण माना था। उनका कहा हुआ आज सच साबित हो रहा है। भारतीय संस्कृति और कला के लिए इतना अनुकूल वातावरण पहले कभी नहीं था। ज्यादा पहले की बात नहीं है। एक घटना के वर्णन से यह स्पष्ट हो जाएगा कि संस्कृति और कला पर संकट के बादल किस तरह छाए हुए थे। बात 1993 की है। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के निवास पर स्वामी राम को लेकर दैनिक जागरण के मालिक नरेंद्र मोहन आए। उनके आते ही वहां जो लोग चंद्रशेखर जी के पास बैठे हुए थे वे उठकर एक-एक कर जाने लगे। जब मैं उठा और कमरे से निकलने ही जा रहा था कि चंद्रशेखर जी ने रूकने के लिए कहा। वे चाहते थे कि मैं पूरी बात सुनूं। स्वामी राम ने बहुत पहले अमेरिका में योग केंद्र बनाया। वे दुनियाभर में घूमते थे। उस दिन उन्होंने बड़ी देर तक विस्तार से यह बताया कि जहां भारत के मठ-मंदिर और संग्रहालय मूर्ति और कलाकृतियों से खाली हो रहे हैं वहीं वे यूरोप में पहुंचकर वहां के संग्रहालयों को समृद्ध बना रहे हैं। चंद्रषेखर जी ने उनसे इसका कारण पूछा और उन्होंने उस पर पूरी रोषनी डाली। जब उन्होंने पूछा कि क्या यह बात प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिन्हाराव जानते हैं तो स्वामी राम ने कहा कि उन्होंने ही मुझे आपके पास भेजा है।

शासन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कुशल नेतृत्व है। दुनिया में उनकी धाक बढ़ रही है। भारत की जीवन दृष्टि को इससे पहले ऐसी मान्यता नहीं मिली जो आज प्राप्त हुई है। एक उदाहरण से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए। कोरोना के संकट से निपटने के लिए प्रधानमंत्री ने लाकडाउन की घोषणा जब की तो इसे एक अवसर मानने वालों में हारवर्ड के मसहूर प्रोफेसर डा. आर्थर सी. ब्रुक्स भी थे। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि इसे अल्पकालीन वानप्रस्थ समझें। यह जो वानप्रस्थ की अवधारणा है वह शुद्ध भारतीय है। उनके इंटरव्यू को पढ़ने के बाद मुझे अचानक एंथोनी परेल याद आए। जिन्होंने गांधीजी के हिन्द स्वराज में मनुष्य के पुरूषार्थ की भारतीय अवधारणा को पाया। वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की है। प्रो. ब्रुक्स ने घरवास के इस समय को जो लोग संकट समझ रहे थे उन्हें ‘अल्पकालीन वानप्रस्थ’ शब्द से आत्म ज्ञान कराया।

आत्म ज्ञान कहें या आत्म बोध। जो भी शब्द चुने, यह भारतीय संस्कृति का केंद्रीय तत्व है। इसे इस संकट में भारत और दुनिया के लोग अपने-अपने ढंग से अपना रहे हैं। समर जीतने के लिए इस विधि से साहस का संचय कर रहे हैं।

इसके विपरीत कुछ दूसरी और नकारात्मक प्रवृतियां भी इस दौर में कभी कभार सिर उठा रही हैं। इस अर्थ में यह समय पुराने मुहावरे की भाशा में कहें तो समुद्र मंथन का है। सांस्कृतिक दृश्टि से हम उसे अमृत मंथन भी कह सकते हैं।  इस समय जो-जो नाकारात्मक प्रवृतियां दिख रही हैं वे समुद्र मंथन की याद दिलाती हैं। हम जानते हैं कि उससे चैदह रत्न निकले थे। उनमें एक हालाहल विश भी था। जिसे महादेव ने अपने कंठ में धारण कर कलहः और विवाद को बढ़ने से रोक दिया।  इस पर देवता उनकी स्तुति करना चाहते थे पर वे तो अपनी गुफा में चले गए। आज जो नकारात्मक बातें कर रहे हैं वे वास्तव में तब के असुर रूप हैं। यह मैं आप पर छोड़ता हूं और आप की तय करें कि आज का महादेव कौन है! हम बात करें उन तेरह रत्नों की और उनसे बनी नई व्यवस्थाओं की। क्या कला और संस्कृति के बिना यह संभव था? हम जानते हैं कि उस नई व्यवस्था का हर बारह साल पर एक महाकुंभ की परंपरा तब से ही चली आ रही है। वह संवाद और समीक्षण की है। संवाद समझने का जरिया होता है। समझ लें तो सृजन सरल हो जाता है। एक दूसरे का हाथ थाम कर सहयोग और लयबद्ध प्रयास ही है जो सार्थक भूमिका के निर्वाह का आधार बनेगा।

इसी 24 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इ-ग्राम स्वराज की नई पहल कर एक संदेश दिया है। वह कला और संस्कृति के लिए भी एक मार्ग दर्शक है। कला में चाहे फिलम हो, नृत्य, संगीत, नाटक या गायन हो, इनके बड़े आयोजन निकट भविश्य में संभव नहीं होंगे। लेकिन डिजिटल के इस युग में वे घर-घर अवष्य पहुंच सकेंगे। बड़ी फिल्में फिलहाल नहीं बन सकेगी। सिनेमा घरों की जो संस्कृति रही है उसके रूपांतरण का यह समय है। कोरोना ने एक काम कर दिया है। अभिवादन की संस्कृति जो भारत में थी उसे पुनः स्थापित कर दिया है। इसी तरह रहन-सहन भी बदल रहा है।

सद्गुरू जग्गी वासुदेव ने आनंदमय जीवन के सूत्र अपनी पुस्तक में बताए हैं। वह चैदह से ज्यादा भाशाओं में प्रकाशित हुई हैं। उसमें उनका एक सूत्र है-‘मेरी जिम्मेदारी असीमित है। अगर मैं इच्छुक हूं तो मैं हर चीज के लिए रिस्पांड कर सकता हूं।’ वे कहते हैं कि इस बात के प्रति नींद आ जाने तक जागरूक रहे। उनका एक सूत्र यह भी है- ‘जिस चीज की कमी है, वह है मानव चेतना। बाकी सब कुछ अपनी जगह पर है, लेकिन इंसान अपनी जगह पर नहीं है। अगर इंसान अपनी खुसी के रास्ते में खुद रूकावट बनना बंद कर दे, तो हर दूसरा समाधान मौजूद है। मनुश्य को रूपांतरित किए बिना आप दुनिया को रूपांतरित नहीं कर सकते।’ ऐसे सूत्रों से बनी पुस्तक का नाम है-इनर इंजीनीयरिंग। कला और संस्कृति के संदर्भ में हम कह सकते हैं कि ऐसे सूत्रों से ‘कल्चरल इंजीनीयरिंग’ हो सकती है। इसकी ही आवष्यकता है। इसके लिए व्यक्तिगत स्तर पर लोग प्रयास कर रहे हैं। भारत सरकार, राज्य सरकारें,  संस्थाएं और संगठनों को भी इस बारे में सचेत हो जाना चाहिए। ऐसा हो जाने पर जिम्मेदारी अपने आप आ जाती है। महान साहित्यकार रामधारी सिंह दिनकर ने बहुत पहले ‘संस्कृति के चार अध्याय’ लिखा। उस समय उन्हें जो साक्ष्य मिले उस आधार पर उन्होंने अपनी पुस्तक में संस्कृति की यात्रा का वर्णन किया। इतिहास की प्रचलित अवधाराणओं के परे वे नहीं जा सके। आज पुरानी अवधारणा टूटी हैं। यह पक्का हुआ है कि भारत में संस्कृति तो एक है। उसके रूप जरूर अनेक हैं। यह उचित समय है जब भारतीय संस्कृति का नया अध्याय लिखा जाए। इस नए अध्याय का सूत्र वाक्य होगा-सीखने के लिए पूरा संसार है, पर हमें अनुसरण तो अपना ही करना है।

 

 

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