जनसत्ता जो दुबारा जन्मा……

रामबहादुर राय

उन्ही दिनों इंदौर में 15-16 साल के प्रभाष जोशी गुजराती कॉलेज में फर्स्ट इयर विज्ञान के छात्र थे। वे याद करते हैं – नौकरी-करियर जैसी चीजों में कभी मन नहीं लगा। क्रिश्चियन कॉलेज के समाजशास्त्र के प्रो. पाटिल लड़कों को गांव ले जाते थे। उनसे संबंध निकाल मैं भी साथ जाने लगा। तब देश आज़ाद हुआ था और देश को नए सिरे से बनाने का सपना था। सन 1955 में इंटर की परीक्षा छोड़ दी और सुनवानी महाकाल गांव में लोगों के बीच काम करने चला गया।’

इन्ही गांवों में एक गांव माचला था। वहां देवेंद्र भाई सपरिवार ही नहीं मित्र मंडली के साथ आकर रहने लगे थे। वे वहां मगन संग्रहालय वर्धा से आए थे। जहां इलाहबाद में विज्ञान की अपनी पढ़ाई पूरी करके कुमारप्पा के साथ ग्रामोद्योग की टेक्नोलॉजी विकसित करने में लगे थे। देवेंद्र भाई तब तीस बरस के होते-लगते थे।  वे काफी लंबे और दुबले थे और उनके चेहरे पर कोई उत्तेजना नहीं दिखती थी। सफ़ेद खादी के कुर्ते -पाजामे में वे बड़े सक्रिय, स्नेही और पराक्रमी लगते थे। उनके निधन पर लिखे कागद कारें में प्रभाष जोशी ने याद किया कि ‘देवेंद्र भाई की तरह किसी गांव में जाकर काम करने और उन्ही की तरह रहने की प्रेरणा माचला की हर यात्रा से मिलती। इंदौर से माचला दूर नहीं था।’

वहीं, 55-56 में कुमार गंधर्व से मुलाकात हुई। दुनिया भर के क्लासिकल किताबों को यहीं पढ़ा। जिस लेखक को शुरू करता उसकी आखिरी किताब तक पढ़ जाता। चाहे वो टॉलस्टॉय हों, शेक्सपीयर या चेखव। गांव वाले भी खूब मानते थे। जब वे अनाज बेचने इंदौर जाते तो मेरे घर पूरे साल का अनाज दे आते थे। 1960 तक मैं यहीं रहा। 60 में मुझे लगा कि या तो मुझे राजनीति में जाना पड़ेगा या मैं भ्रष्ट हो जाऊंगा, क्योंकि सारा गांव लीजेंड मानता था। उधर कांग्रेस वालों को लगता था कि मैं कंस्टीट्यूएंसी बना रहा हूं, जबकि मैं तो देश के नव-निर्माण में लगा था। प्रभाष जोशी को राजनीति के दलीय रंग में देखने की वह पहली परन्तु आखिरी घटना नहीं है।

उन्हें समय -समय पर इस नजरिये से लोग देखते रहे हैं। दलीय रंग की छाया उनके कभी आगे और कभी पीछे चलती रहती है। ऐसा अज्ञानवश ही  होता है। उस समय विनोबा के  ग्राम दान  और नेहरू के सामुदायिक विकास के  नारे की गूंज थी।  लग रहा था कि गांधी के सपने पर देश चल पड़ा है। उस सुनवानी महाकाल में प्रभाष जोशी जिस तरह  जी रहे रहे थे। वह जानने लायक है। इसे पढ़िए- गांव में सबेरे जल्दी उठना। अपने खाने का आटा घटटी पर पीसना।  बच्चों को लेकर गांव की गलियों की सफाई करना। फिर उन्हें ले जाकर शिप्रा में नहलाना। आ कर तकली पर सूत कातना। पढ़ाना।  खेत में काम करना। शाम को कथा-वार्ता और लोक गीतों का गाना। पूरी तरह सार्वजनिक जीवन। सेवा का जीवन ।

….गांव वालों ने जो घर दे दिया था उसे गांधीय करीने और  साफ सुथरेपन से जरूर रखा और गांव वालों की मदद से पूरे गांव को ही ग्राम सेवा परिसर बनाने की कोशिश की। अपने बुलावे पर देवेंद्र भाई कार्यकर्ताओं के साथ आए। उनके संबंध वहीं बने। प्रेरणा, गांधी के सपनों का देश बनाना था।   और यह विश्वास कि सन सत्तावन आते आते सर्वोदय क्रांति हो जाएगी। गांव के कुछ बड़े-बूढ़ों को लेकर अजमेर और पंढरपुर के सर्वोदय सम्मेलनों में गया लेकिन सर्वोदय का काम करने वाले के नाते सिर्फ एक देवेन्द्र भाई को जानता था।

‘अपना किसी साथी से कोई संबंध नहीं, न अपन ने कभी गांव में किसी को भूदान करने के लिए प्रेरित किया. लेकिन अपना गांव आदर्श हो सके और जब सर्वोदय की अहिंसक क्रांति हो तो अपन और अपना गांव उसमें लगा हो।‘

‘बचपन में गांधी को जितना पढ़ा उससे कहीं ज्यादा उनके बारे में सुना । उनकी हत्या हुई तो खूब रोना आया जब कि वे घर में निराकार व्यक्तित्व ही थे । विनोबा ने भूदान शुरू किया तो अपन मैट्रिक भी पास नहीं हुए थे । घर में ग्राम सेवा का कोई वातावरण नहीं था। सब निम्न मध्यम वर्ग के नौकरीपेशा लोग । पिताजी की इच्छा थी कि गणित और विज्ञान पढ़कर इंजीनियर हो जाऊ। खुद की इच्छा कि क्रिकेट खेलूं और बीस का होने के पहले इंडिया की टीम में आ जाऊ और टैस्ट खेलूं । लेकिन मैट्रिक कर के साइंस मेथेमेटिक्स पढ़ने और क्रिकेट खेलने में लगा था कि साईकिल पर गांव गांव घूमने का शौक लग गया। खादी पहनने लगा । कुरता और धोती । गांव के जीवन की ओर एक रूमानी खिंचाव बढ़ने लगा । ऐसा कि कॉलेज की पढ़ाई और क्रिकेट की खेलाई ऐसे ही छुट ही गए और गांव सुनवानी महाकाल में डेरा हो गया ।

विनोबा भूदान से कई तरह के दान निकाल कर ग्रामदान तक पहुंच गए।‘‘विनोबा ने इस बुरी तरह अपने को बिगाड़ दिया था कि नाते-रिश्तेदार मां को उलाहना देते कि लीला बई तमारो छोरो तो बाबजी हुइग्यो और पिताजी को उनके दोस्त सहानुभूति से देखते कि क्या करें, बिचारे का बड़ा लड़का घर-बार-पढ़ाई छोड़कर विनोबा के पीछे लगेया। न पढ़ना न कमाना। गांव के दो चार लोग ही अपने सपने को समझते । लेकिन चूँकि हर घर में कोई न कोई सेवा की और किसी से कोई उम्मीद नहीं रखी, न कभी कुछ लिया इसलिए अपनी नीयत और चरित्र पर किसी को कोई शंका नहीं रही । सबेरे बहुत जल्दी गांव से क्षिप्रा जाते हुए या रात को को लौटते हुए बड़ी भावना से गाता था – वह सुबह कभी तो आएगी । बहुत विश्वास था कि भू क्रांति होगी। नया समाज बनेगा। नई और अपनी राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्था होगी। ग्राम केन्द्रित अहिंसक समाज में भारत आत्म साक्षात्कार करेगा।‘

 अहिंसक तरीके से मनुष्य को बदला जा सकता है। इसका प्रयोग डाकुओं पर कर चम्बल में उनका समर्पण कराकर जब विनोबा पहली बार नगर स्वराज का प्रयोग करने इंदौर आए । ’वो क्या कह रहे हैं, तब उन्हें समझने वाला कोई नहीं था। नई दुनिया, इंदौर के संपादक राहुल बारपुते ने कहा कि तुम करो । तब मैंने इसे एक महीने तक कवर किया। मैं सिर्फ हथेली पर नोट लेता था और उसी से पूरा पेज भर देता था । विनोबा जी सुबह 3 बजे से काम शुरू कर देते थे । मैं 2.45 में ही उनके पास पहुंच जाता। सारा दिन कवर कर वहां से नई दुनिया जाता। इसने पत्रकारिता के दरवाजे खोल दिए। मैं वहां काम करने लगा। इस तरह प्रभाष जोशी पत्रकारिता के रास्ते पर चल निकले ।

 ‘एक दिन कोई भी ऑफिस नहीं आया । तब मैंने अकेले चार पन्नों का अख़बार निकाला । दूसरे दिन मैं नाराज हुआ तो सभी ने कहा कि हम तो टेस्ट ले रहे थे। राहुल बारपुते, राजेन्द्र माथुर और शरद जोशी के साथ वो जो ट्रेनिंग हुई, वो हमेशा काम आई । यहाँ 60 से 66 तक छह साल तक काम करते हुए मजे में बीता। इसी बीच एक बार प्रेस इंस्टिट्यूट में माइकल हाइट्स, जो लीड्स के किसी अख़बार के संपादक थे, से मुलाकात हुई। वह हर क्षेत्र में मेरी रूचि से बेहद खुश थे। उन्होंने मेरे बारे में इंग्लैंड के प्रतिष्ठित ‘वीकली स्टेटसमैन’ के संपादक जॉन फ्रीमन से कहा। इस तरह मैं 1965 में इंग्लैंड गया। वहां इंग्लैंड से निकलने वाले ‘मैनचेस्टर गार्डियन’ और लीड्स के ‘टेलीग्राफ आर्गस’ में कुछ महीनों तक काम किया । फिर लौट आया।‘

‘वापस आने के बाद मैं कुछ नया करना चाहता था । नई दुनिया ट्रेडिशनल अख़बार था और वहां प्रयोग की गुंजाइश नहीं थी। तभी शरद जोशी के पास भोपाल से ‘मध्यप्रदेश’ नाम से अख़बार निकालने का प्रस्ताव आया। मुझसे भी बात की गई तो मैंने हामी भर दी। हम दोनों ने मिलकर इसे निकाला। बाद में अख़बार आर्थिक संकट का शिकार हो गया । पत्नी का जेवर गिरवी रखकर अख़बार चलाना पड़ा। रद्दी बेच कर मोटर साईकिल में पेट्रोल डलवाया। सन 66-68 तक चलने के बाद इसे बंद करना पड़ा ।‘

उसी दौरान गाँधी जन्मशताब्दी के लिए राष्ट्रीय समिति बनी लेकिन जब राष्ट्रीय स्तर पर गांधी शताब्दी मानाने की बात चली और भारत सरकार ने एक राष्ट्रीय समिति बनाई तो देवेन्द्र भाई को उसका संगठन मंत्री बना कर बुलाया गया । माचला के उसी देवेन्द्र भाई ने नई जिम्मेदारी के लिए प्रभाष जोशी को दिल्ली

बुलाया। ‘दिल्ली भी मैं देवेन्द्र भाई के कहने पर आया।‘ तब उनकी परिस्थिति क्या थी और क्या सोचकर आए यह जानने के पढ़िए, उन्ही का लिखा यह अंश – ‘नई दुनिया’ के बाद ‘मध्यप्रदेश’ का प्रयोग भी जब फेल हो गया और अपने को लगने लगा कि क्षेत्रीय पत्रों में वापिस लौटकर कोई विचार और लिखने पढ़ने का कम नहीं किया जा सकता तो गांधी कार्य में फिर लगना ठीक लगा। लेकिन तब अपना भी विवाह हो गया था और एक बेटा था । पहले जैसी आकाशवृति नहीं की जा सकती थी। दिल्ली में हिंदुस्तान के तब के संपादक रतनलाल जोशी के नाम अपने एक काका ने पत्र दिया था। हिंदुस्तान जाकर जोशी जी को वह देने के बजाय मैं राजघाट कालोनी में देवेन्द्र भाई के पास आया । उनने कहा पत्रिकाओं और पुस्तकों के प्रकाशन में हमारी मदद करो। इंदौर जाकर वापस आया और प्रकाशन समिति का काम करने लगा। यह 1968 की बात है। वैसे उन्होंने कुछ और ही सोचा था। भोपाल से लौटकर उन्होंने इंदौर में ययाति नाटक लिखा था। उनका इरादा था कि जो नाटक लिखा था उसे खेलवाऊंगा और फिर छपवाऊंगा। गांधी साहित्य के प्रकाशन का काम करते हुए नाटक, कहानी, उपन्यास और कविता लिखूंगा। उस नाटक का एक अंक रद्दी के साथ बिक गया।‘

‘गाँधी शताब्दी में साहित्य प्रकाशन का काम किया। उसके बाद 70 से 74 तक सर्वोदय निकाला। यह वीकली था और मैं उसका संपादक था। सर्वोदय में श्रवण गर्ग और अनुपम मिश्र मेरे साथ थे। याद रखें, गांधी शताब्दी समिति के अध्यक्ष राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन थे और कार्यकारिणी की कर्ता धर्ता इंदिरा गांधी थी। डॉ. जाकिर हुसैन के बाद वी.वी. गिरी राष्ट्रपति हुए और पदेन अध्यक्ष भी। लेकिन शताब्दी समारोहों के ऐन बीच में होते हुए और उनका खोखलापन जानते हुए भी जाने क्यों मुझे ऐसा लगता था कि 2 अक्टूबर, 1969 को कोई चमत्कार होगा और इस देश में गांधी फिर जीवित हो जाएंगे। माहौल एकदम बदलेगा और देश वहीँ से फिर नई शुरुआत करेगा। जहाँ से सन अड़तालीस में गांधी उसे नए सिरे से ले जाना चाहते थे । दिल्ली में सबकुछ देखते और पोल पट्टी समझते हुए भी मैं उसी अक्टूबर महीने में राजगीर, बिहार के सर्वोदय सम्मेलन में गया जहां जे.पी., विनोबा को बिहार दान करने वाले थे । वह सम्मेलन और बिहार दान भी हो गया। विनोबा क्षेत्र सन्यास लेकर परमधाम पवनार आ गए। सक्रिय रहने वाले लोग पूछने लगे तो बाबा ने कहा बी से बाबा, बी से भूदान और बी से बोगस ! यानि बाबा और भूदान सब बोगस है।‘

उस समय अपनी मनोदशा का वर्णन प्रभाष जोशी इन शब्दों में करते हैं –‘जिस साल मुझे लगता था कि गांधीय विचार और कर्म का पुनर्स्फुरण होगा उसी साल ऐसा कर सकने वाले अकेले व्यक्ति विनोबा क्षेत्र सन्यास में से सूक्ष्मतर में प्रवेश कर गए। पूरे बिहार में ग्राम स्वराज स्थापित करने के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले जे.पी. सन सत्तर में बांगला देश के संकट में लग गए और अपन ने पाया कि अपन गांधी संस्था की नौकरशाही की निपट दिशाहीन और गतिहीन पुरजे होकर रह जाएंगे। रोज सबेरे फाइलों का बस्ता लेकर दफ्तर जाना और उसे वैसा ही लेकर शाम को वापस लौट आना। रात को पेट में गैस से दिल का दौरा पड़ने के डर से सो नहीं पाना। लगभग बिना सोएं सबेरे फिर उठना और खादी पहनने वाले रोबोट की तरह काम करते हुए दिन बिता देना। लिखते हैं कि ‘ऐसा फिजूल का जीवन पहले कभी और कहीं नहीं जिया था।‘

इस तरह उधेड़बुन में पड़े प्रभाष जोशी की भेंट रामनाथ गोयनका से होती है। ’रामनाथ गोयनका ने मुझे ‘सर्वोदय’ में पढ़ा था। उन्हें मेरी भाषा बहुत अच्छी लगी थी। इसी बीच सन 72 में जय प्रकाश नारायण को चम्बल के डाकुओं का समर्पण कराने के लिए कुछ युवाओं की मदद चाहिए थी, जो उनके बीच जाकर उनसे बात कर सके। अनुपम, श्रवण और मैं फ़रवरी से उनके साथ काम करने लगे .डाकुओं ने अप्रैल में आत्मसमर्पण कर दिया था। इस पर हमने पंद्रह दिनों में एक किताब तैयार कर दी थी। इससे जे.पी. को मुझसे प्रेम था। तभी ‘एवरीमेंस’ नाम से वीकली पत्रिका शुरू हुई। इसके संपादक अज्ञेय जी थे। हम उसमें मदद करते थे। फिर हिंदी में अख़बार निकालने की बात हुई। रामनाथ गोयनका ने पहले से ही ‘प्रजानीति’ नाम ले रखा था। तब पहली बार मैं गोयनका जी से मिला। मुलाकात काफी डिजास्टर थी। वह जिस तरह से लोगों के बारे में खुलकर गालियों से बात कर रहे थे, मैंने सोचा कैसे काम करूंगा। मैंने लौटकर जे.पी. को पांच पन्नों की चिट्ठी लिखी। जे.पी. ने वह गोयनका को दे दी।

प्राम्भिक और मानसिक बाधा जब दूर हुई तो वे जिस काम में लगे वह उनके मन का था, इसलिए सार्थकता की जो तलाश उन्हें थी वह मिली। इसके साथ ही यह भी हुआ कि उन्होंने जो सोचा वो धरा रह गया। इससे यह हुआ कि देर सबेर ‘जनसत्ता’ के दुबारा निकालने का रास्ता खुला। जिसका सपना मैं सन छियासठ से पाले हुए था। जब ‘नई दुनिया’ और इंदौर छोड़कर अपने लौटने का पुल तोड़कर निकला था। प्रभाष जोशी का एक्सप्रेस से जुड़ना 1973 में हुआ। जे.पी., रामनाथ गोयनका और राधाकृष्ण का एक त्रिकोण था। जो जे.पी. चाहते थे वही राधाकृष्ण की इच्छा थी और रामनाथ गोयनका चाहते थे कि प्रभाष जोशी प्रजानीति निकाले। उन्हें इस चिट्ठी की जानकारी रही होगी इसीलिए वे टोह लेते रहते थे। इस बारे में प्रसंगवश प्रभाष जोशी ने लिखा है कि तभी ‘एक दिन राधाकृष्ण जी (तब गांधी शांति प्रतिष्ठान के मंत्री और जेपी के निकट सहयोगी) और रामनाथ गोयनका मेरे घर आ गए। गांधी निधि के उस छोटे से घर में बैठक ही अपनी स्टडी और अपना बैड रूम था । एक खाट थी, एक कुर्सी और एक छोटी सी टेबल। दोनों को कहां बैठाता? एक को खाट पर और दूसरे को कुर्सी पर। खाट पर राधाकृष्ण जी को क्योंकि कुछ दिन पहले अब्बू जी (यानि अभय छजलानी-नई दुनिया इंदौर के मालिक और अपने मित्र) आए थे और कुर्सी पर बैठे थे तो वह टूट कर गिर गई थी। राधाकृष्ण जी का वजन सह नहीं सकती थी ।

बहरहाल ज्यादातर वही बोले। आन्दोलन के लिए अच्छा साप्ताहिक जरुरी है। तुम्हारे रिजर्वेशन होंगे, हम जानते ही हैं, लेकिन उन्हें छोडो और काम करो। कॉफ़ी लेकर भेन  जी आईं तो रामनाथ गोयनका ने उन से बात की। बात-बात में पता कर लिया कि वे उन्ही के गांव के पास के गांव की हैं। वैसे ही ‘बाई’ कर के बोलने लगे- जैसे मारवाड़ी बड़े-बूढ़े अपने गांव ढाणी की बहन-बेटी से बोलते हैं। तय कुछ नहीं हुआ। वे जाने लगे तो बाहर आकर उन्हें कार में बैठाते हुए मैंने कहा-माफ़ कीजिये ! आप लोगों को बैठाने के लिए मेरे पास दो कुर्सी भी नहीं थी। रामनाथ जी के चेहरे पर शरारती मुस्कान खिल गई। उन्होंने एक मारवाड़ी कहावत कही- महावतों से तो दोस्ती है और दरवाजा संकड़ा है। इस पर मेरी पत्नी हंस पड़ी थी। मैं इसका मतलब समझता तब तक तो रामनाथ जी अपनी छोटी फिएट में राधाकृष्ण जी को ले निकले थे।‘

‘जाते जाते रामनाथ गोयनका ने कहा कि भले ही काम करना या न करना कल शाम को आना। मैं दूसरे दिन गया। वह रोज शाम कनाट प्लेस के हनुमान मंदिर और गोल मार्किट के काली मंदिर जाते थे। गाड़ी से मुझे लेकर निकले। दर्शन करने के बाद पूछा-क्या दिक्कत है? क्यों नहीं आते? मैंने कहा मेरी आत्मा में एक टोमस पैकेट है। गोयनका ने कहा वह कौन होता है? फिर मैंने उन्हें वह कहानी सुनाई कि “राजा का एक दोस्त था. राजा ने उसे चर्च का मुखिया बना दिया। दोस्त ने जिस दिन चर्च संभाला, विद्रोह कर दिया ।” उन्होंने कहा, कोई बात नहीं, लड़ लूंगा तेरे से। तुम यही कहना चाहते हो ना कि वीकली निकालने में तुम्हारा मेरा मामला मुक़दमा हो सकता है। डोंट वरी, एम गेम। देखो… जो जानता न हो कि उसे क्या करना है और जो तनकर खड़ा न हो सके वो क्या संपादकी करेगा… फिर मैंने मंजूर कर लिया। कुछ दिन बाद मैं एक्सप्रेस दफ्तर गया। रामनाथ जी ने तब के जनरल मैनेजर आर के मिश्र को बुलाकर कहा कि ये जो कहे वो करना है। फिर उनके जाने के बाद मुझे कहा काम न हो तो बताना… सबकी खाल खींच लूंगा।

उसका मौका नहीं आया। प्रजानीति निकला। वे जेपी आन्दोलन के शुरुआती दिन थे। आंदोलन का असर हिंदी क्षेत्र में सघन था और हिंदी क्षेत्र से ही निकला था। प्रजानीति उसी जरुरत को पूरा करने के लिए निकाला गया था। उसके संपादक प्रफुल्लचंद ओझा ‘मुक्त’ थे उनके नाम का सुझाव रामधारी सिंह दिनकर ने रामनाथ गोयनका को दिया था। प्रभाष जोशी उसके कार्यकारी संपादक बने । प्रजानीति कुछ ही दिन निकल सका। जैसे ही इंदिरा गांधी अपना मुकदमा हार गई उन्होंने जेपी आंदोलन का बहाना बनाया। सच तो यह है कि प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के लिए उन्होंने लोकतंत्र का गला घोंटा और देश पर इमरजेंसी थोप दी। ’तब कहा जाता था कि इंदिरा जी और संजय दो लोगों से नाराज हैं। इंडियन एक्सप्रेस के संपादक मुलगांवकर से और प्रजानीति के संपादक प्रभाष जोशी से। और इमरजेंसी लगने के बाद अख़बार सेंसर के पास गया तो सिर्फ सिनेमा और खेल का पेज बनकर आया। प्रजानीति बंद कर दिया गया । ‘ वे इमरजेंसी के दिन थे। फिल्म और स्पोर्ट्स का वीकली ‘आस-पास’ निकाला। छिहत्तर के दो महीने बीते होंगे कि साफ़ हो गया कि ‘आस-पास’ भी बंद करना पड़ेगा। दिल के दौरे से संभले रामनाथ गोयनका दिल्ली आए। वे एक्सप्रेस को बचाने की लड़ाई सरकार से लड़ ही रहे थे।  ‘इसी वातावरण में एक दिन रामनाथ गोयनका ने बोर्ड रूम में कहा कि बताओ अब मैं क्या करूं ? तब के बिज़नेस मैनेजर वेदप्रकाश वहीँ बैठे थे। मैंने कहा कि नाव को बचाने के लिए कुछ सामान फेंकना पड़ता है। जरुरी न हो तो “आस-पास’ बंद कर दीजिए। उसे बंद करना पड़ा। काफी मुश्किल दिन थे, हम घर से बाहर निकलते तो पुलिसवाला बैठा मिलता। इंडियन एक्सप्रेस का घर छोड़ कर गांधी पीस फाउंडेशन के उसी घर में आ गए थे, जहां से बाद में जेपी को पकड़ा गया।….जारी

 

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