कोरोना और लाल चीटिंयां, दोनो से बचना है

प्रदीप कौर आर्या

कोरोना के साथ-साथ कम्युनिस्ट विचार भी किसी सभ्य राष्ट्र और समाज के लिए खतरनाक है। इस विचार के भारतीय वाहक इसकी गवाही चीख चीख कर देते हैं। आज जब पूरा भारत कोरोना से लड़ने को कमर कसे हुए है, वह भी इन्हें नागवार गुजर रहा है। कुछ तो माओ की कोख से ही निकले इस भयावह दौर में 17 जवानों की हत्या करने से भी नहीं चूकतें। इनसे भी बचाव का तरीका हमें ढ़ूढना होगा। ये लाल चीटियों की तरह है। इनकी करूततों को सही ठहराने के लिए समर्थन में शहरी लाल चीटियां तुरंत सक्रिय होती हैं। इन्ही शहरी लाल चीटियों ने इनका नामकरण किया है। नाम दिया है नक्सल। नक्सलवाद कोई विचार नही, यह जगह के नाम से है। इनका विचार है माओ का विचार, यानि माओवाद। जो आज के चीनी शासन के पितृपुरूष हैं। माओवाद चीन से जुडा हुआ समझा जाता है। असलियत भी यही है। इसीलिए छद्म नाम नक्सलवाद रखा। लेकिन असलियत सामने आ ही जाती है। ये लाल चीटियां चीन के कसीदे पढते हैं। कोरोना की लगाम थाम लेने के लिए के लिए चीन की साम्यवादी अर्थव्यवस्था को कारण बताते हैं। इसे साबित करने के लिए गीत रचते हैं। यह नहीं बता पाते कि चीन से ही क्यों खतरनाक वायरस निकलते हैं। कोरोना से पहले सार्स और बाद में हंता को याद नही करते।

जंगल में झोंझ इन लाल चीटियों के ठिकाने को कहते हैं। यह नही पता की ये खुद बनाती हैं या किसी के बनाए पर कब्जा करती है। या इनके लिए कोई झोंझ तैयार करता है। भारत में ऐसे वैचारिक लाल चीटियों के झोंझ पर थीड़ी नजर डालनी जरूरी है। इसी तरह की एक झोंझ ‘द वायर’ है। उसी झोंझ के एक लेखक हैं अपूर्वानंद। अपूर्वानंद प्रधानमंत्री की अपील पर जब पूरा देश मोदी के पीछे खड़ा हो गया तो अपूर्वानंद ने वाक्यों के खेल और शब्दों की जादूगरी करते हुए पूरा लेख लिख दिया। उस लेख का सार उनके इन वाक्यों से समझा जा सकता है “भारत एक सांस्कृतिक इकाई है। बावजूद भिन्न भाषाओं, पहनावों और खानपान के हम सब मूर्खता के एक सूत्र में बंधे हैं। राष्ट्रीय एकता का यह प्रदर्शन और प्रमाण दिल को तसल्ली देता है….. मूर्खता एक ऐसा कवच है जो आपको हर आपदा की चिंता से सुरक्षित रखती है. मूर्ख पॉज़िटिव होता है. हर मायने में…….” जबकि लाल चीटियां आपको हर समय चिंता में डालती हैं। माओ और मार्क्स ही आपको सुरक्षित रख सकते हैं, यह समझाती हैं। ये लाल चीटिंयां निगेटिव होती हैं। हर मायने में।

लाल चीटियों के भारतीय संस्करण के दूसरे झोंझ पर नजर डालते हैं ये है “सत्य हिन्दी डाट काम” उसके विचार कालम में दिए विचारों पर गौर करते हैं। संजय कुमार सिंह ने लिखा “कोरोना: प्रधानमंत्री जी, आपने बहुत निराश किया”, एक मुकेश कुमार नाम के पत्रकार है वो लिखते हैं “कोरोना: ट्रंप जैसे नेता खतरनाक क्यो होते हैं” इस शीर्षक से मुकेश कुमार ने जो लिखा उसका सार ये है कि ट्रंप ने कोरोना को चीन से क्यों जोड़ा। अपनी बात साबित करने के लिए उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन का कई बार जिक्र किया। लेकिन यह नही बताया कि चीन ने कोरोना के फैलने के कारण जानने के लिए जो समिति बनाई उससे विश्व स्वास्थ्य संगठन को क्यों दूर रखा। आखिर क्या छुपाना चाहता है चीन। हो सकता है मुकेश कुमार जानते हों। यहां विचार कालम में डा.वेदप्रताप वैदिक का भी लेख है। वह भी पाकिस्तान से शिखर वार्ता करके जब से लौटे हैं बदले बदले से नजर आ रहे हैं। उन्होंने लिखा भीड़ भडक्के से दूर रहें, लोगों से दूरी बनाए। ताली थाली बजाना बंद करें कहीं देश को महंगा न पड़ जाए। समझे यहां वैदिक जी का जो मर्ज समझ में आता है वह कोरोना नही मोदी है। बहरहाल लाल चीटियों के भारतीय संस्करण के ये उदाहरण भरे पड़े हैं।

अब जरा चीन की नंगई पर नजर डालते हैं। जिस चीन के लिए भारत की लाल चीटियां गीत गा रही हैं। चीन एक तरह से तानाशाही है। दिखावे के लिए लोकतंत्र है। समाचार एजेंसियों पर भी वहां की हुकूमत का कब्जा है। चीनी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने कहाकि चीन अगर दवा कंपनियों को उसके आश्वयक तत्वों की आपूर्ति बंद कर देता तो अमेरिका में कोरोना के मामले की भयंकर बाढ़ आ जाती। दरअसल चीन दुनियाभर की दवा कंपनियों आवश्यक तत्व आपूर्तिकर्ता है। यही धमकी वह दे रहा है। यह उसकी नंगई है। हांलांकि यह चीन की आदत है। चीन एपीआई का सबसे बड़ा उत्पादक है। इसका इस्तेमाल एंटीबायटिक, बिटामिन, वैक्सीन और अन्य दवाएं बनाने में होता है। चीन में एपीआई के निर्यात को कम करने की बात चल रही थी। उद्देश्य यह था कि विकसित देशों का स्वास्थ्य ढ़ाचा चरमरा जाए। जबकि कोरोना महामारी के कारण चीनी एपीआई उत्पादन में ठहराव आ गया। दवा के मामले में दुनिया की चीन पर निर्भरता की कीमत दुनिया चुका रही है। भारत ही दुनिया में सबसे ज्यादा जेनेरिक दवाएं बनाता है। लेकिन इसके लिए एपीआई की जरूरत पड़ती है। जिसके लिए चीन पर निर्भर रहना पड़ता है। भारत ने इसीलिए जेनेरिक दवाओं के निर्यात को कम कर दिया जिससे भारत में दवाओं की कमी न हो।

चीन जैसा देश ही बीमारी को रोकने की बजाय उसे छिपाने में अपनी ताकत लगाता है। चीन अगर शुरूआत में छुपाने की जगह रोकथाम का इंतजाम करता तो दुनिया का पूरा ताना बाना अस्त व्यस्त होने से बच जाता। चीन के इस निकम्मेपन के कारण आज दुनिया को स्वास्थ्य और वित्तीय मोर्चे पर भारी नुकसान हुआ है।

वैसे सच्चाई छिपाने का चीन का यह रोग पुराना है। माओवादी सोच, जवाबदेही की कमी और गोपनियता के माहौल से वहां हालात खराब हुए। शी जिंनपिंग की माओवादी हूकूमत कोरोना के खिलाफ चेताने वाले आठ डाक्करों को अपनी गिरफ्त मे ले लिया। वैसे ये पहला किस्सा नहीं है। साल 2002-03 में सार्स भी चीन से निकला। शी जिनपिंग करीब महीने भर तक पर्दा डाले रहा। उसके खिलाफ मुहिम छेड़ने वाले डाक्टर को सेना ने डेढ़ महीने तक कैद करके रखा। इतना ही नही करीब डेढ़ साल तक स्वाइन फ्लू का मामला छिपाया। नतीजा दुनिया जानवरों की सबसे बड़ी महामारी की चपेट में आ गया। इसके कारण लाखों सुअरों को मारना पड़ा।

भारत में माओ की बची खुची संतानों ने चीन की चारणगीरी हमेशा से की। लेकिन यह नहीं बताएंगे कि विश्व स्वास्थ्य संगठन को चीन ने कोरोना के मामले में गुमराह किया। चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को बताया कि कोरोना मामले में मनुष्य से मनुष्य में संक्रमण के संकेत नही है। अब शी जिनपिंग की माओवादी हुकूमत की प्रोपेगंडा टीम इस काम में लग  गई है कि कोरोना को काबू में करने के लिए चीन ने कैसी मिसाल कायम की। वैसे भी कम्युनिस्ट या उनके सहोदरों के लिए इंसानी जिंदगी का कोई मोल नही है। सत्ता हासिल होनी चाहिए चाहे वह खून से ही रंगी क्यों न हो।

यहां भारत सहित पूरी दुनिया को सबक लेने की जरूरत है। साथ ही अपने आस-पास की लाल चीटियों से दूरी बनानी होगी। ठीक उसी तरह जैसे कोरोना से बचाव का एकमात्र उपाय सामाजिक दूरी। साथ ही दवाओं और वैक्सीन के मामले में अपने पैरों पर खड़ा होना होगा। या फिर चीन का विकल्प तैयार करना होगा। रूसी क्रांति के तीन दशक बाद चीन में भी वही क्रम दोहराया गया।

                                                                         चीन की पैदाइस ही खूनी है

रूसी क्रांति और उसके बाद जो हिंसा बरती गई वह यूरोप के लिए कोई नई बात नहीं थी। इस तरह की हिंसा न केवल हिटलरशाही में देखी जा सकती है, बल्कि यूरोप के इतिहास में ऐसी हिंसा सामान्य रही है। लेकिन चीन के लिए वह सामान्य बात नहीं थी। चीन के मार्क्सवादी नेता भी स्कूल कॉलेजों से निकले वैचारिक सिपाही थे। वे मजदूरों और किसानों के बीच से पैदा नहीं हुए थे। रूस में शहरी लोगों में किसानों के प्रति सदा तिरस्कार की भावना रही है। लेकिन चीन में तो कंफ्यूशियस की शिक्षाओं के अनुसार किसानों की सदा ऊंची प्रतिष्ठा रही है। लेकिन मार्क्सवाद ने मजदूरों और किसानों के ऊपर सर्वहारा की एक अमूर्त छवि आरोपित कर दी थी। इस छवि ने मजदूरों और किसानों पर किए गए हर अन्याय को औचित्य प्रदान कर दिया क्योंकि सर्वहारा की तानाशाही स्थापित करने के लिए वह आवश्यक था। बेचारा सर्वहारा क्या तानाशाही लाद पाता! सभी मार्क्सवादी व्यवस्थाओं में निर्णय एक या कुछ व्यक्तियों में ही सीमित रहा है। चीनी मार्क्सवादियों का सबसे बड़ा अपराध यह है कि उन्होंने चीन में अनुलंघनीय मानी जाने वाली परिवार संस्था का भी अतिक्रमण कर दिया। चीन की सांस्कृतिक क्रांति के दौरान परिवार के सदस्यों को एक दूसरे पर नजर रखने, बुर्जुआ प्रवृत्ति के परिवार के सदस्य की पहचान करने और उसे सार्वजनिक तिरस्कार के लिए प्रस्तुत करने के लिए कहा गया। आमतौर पर स्थानीय नेतृत्व के आलोचकों को बुर्जुआ घोषित कर दिया जाता था। उन्हें प्रताड़ना और मरणांतक कष्ट झेलने पड़ते थे और इस सबमें परिवार के शेष सदस्यों को पार्टी का साथ देना पड़ता था। इसके लोमहर्षक वृतांत अब सामने आ रहे हैं। इस तरह की बर्बरता की इससे पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। सांस्कृतिक क्रांति का दंश कितने लोगों ने झेला, यह संभवत: कभी पता नहीं चल पाएगा। लेकिन उनकी संख्या लाखों में ही थी। रूस की तरह चीन के गृह युद्ध को एक परिणति तक पहुंचने में कई वर्ष लग गए। रूस की तरह की भुखमरी और महामारी चीन के आम लोगों को भी झेलनी पड़ी, पर उसका परिमाण उतना नहीं था। लेकिन लेनिन की तरह माओ का सपना भी चीन को आधुनिक दुनिया की महाशक्ति बनाने का ही था और उसमें मजदूर और किसान सभी भट्टी के इंधन की तरह थे। माओ ने चीन को महाशक्ति बनाने की जल्दबाजी में जिस लंबी छलांग का नारा दिया था उसमें लगभग साढ़े चार करोड़ लोगों की बलि चढ़ गई। माओ ने पूरे देश को इस्पात उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि के लिए लोहा गलाने में लगा दिया। खेती की उपेक्षा हुई, अकाल पड़ा, अनाज की मांग पूरी न कर पाने वाले किसानों को प्रताड़ना झेलनी पड़ी। इसने पूरे चीनी समाज को विपत्ति में डाल दिया। चीन में भी किसानों ने अपने खेत और पशु छीने जाने और सामूहिक स्वामित्व के बहाने राजकीय नियंत्रण में लाने का विरोध किया था। लेकिन ऐसे सब लोग वर्ग शत्रु करार दे दिए गए और उन्हें अपने प्राण गवाने पड़े। मार्क्सवाद ने रूस को तो फिर से दासता की व्यवस्था में धकेला था। लेकिन चीन में तो पहले कभी वैसी दास व्यवस्था नहीं थी, जैसी मार्क्सवादियों ने पैदा कर दी।रूस और चीन में जो कुछ हुआ है, उसके वृत्तांत अब यह कहकर नकारे नहीं जा सकते कि वे पूंजीवादी देशों का प्रचार हैं। क्योंकि बदली हुई स्थिति में रूस और चीन के भीतर से ही यह सब वृत्तांत पुष्ट हो रहे हैं। लेकिन दुनियाभर के मार्क्सवादी आज भी इन वृत्तांतों से व्यथित होने के बजाए उन्हें क्रांतिकारी परिस्थितियों में होने वाली गलतियां कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं।

 

 

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