भारत के प्रख्यात संविधान विशेषज्ञ, संसदीय मामलों के विद्वान और पूर्व लोकसभा महासचिव सुभाष कश्यप का 97 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनका निधन 4 जून 2026 को नई दिल्ली स्थित उनके आवास पर कार्डियो-पल्मोनरी अरेस्ट के कारण हुआ। उनके निधन से भारतीय लोकतंत्र, संसदीय परंपराओं और संवैधानिक अध्ययन के क्षेत्र में एक अपूरणीय क्षति हुई है।
डॉ. सुभाष कश्यप का जन्म 10 मई 1929 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के चांदपुर में हुआ था। उन्होंने अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में संविधान, संसद और लोकतांत्रिक संस्थाओं के अध्ययन तथा विकास में
महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे 1953 में संसद सचिवालय से जुड़े और लगभग 37 वर्षों तक भारतीय संसद की विभिन्न जिम्मेदारियों का निर्वहन करते रहे। 1983 से 1990 तक उन्होंने लोकसभा के महासचिव के रूप में कार्य किया और संसदीय प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बनाने में अहम भूमिका निभाई।
डॉ. सुभाष कश्यप को भारत में संविधान संबंधी विषयों का सबसे बड़ा विशेषज्ञ माना जाता था। उन्होंने भारतीय संविधान, संसदीय व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर 100 से अधिक पुस्तकें तथा सैकड़ों शोध लेख लिखे। उनकी पुस्तकें आज भी विधि, राजनीति विज्ञान और लोक प्रशासन के विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ सामग्री मानी जाती हैं।
उन्होंने केवल अकादमिक क्षेत्र तक ही अपने योगदान को सीमित नहीं रखा, बल्कि विभिन्न संवैधानिक सुधार समितियों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में वे संविधान की कार्यप्रणाली की समीक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग की प्रारूपण एवं संपादकीय समिति के अध्यक्ष रहे। हाल के वर्षों में वे पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ संबंधी उच्चस्तरीय समिति के सदस्य भी थे।
उनकी असाधारण सेवाओं को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2015 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके संवैधानिक अध्ययन, संसदीय परंपराओं के संरक्षण और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने के लिए दिया गया था।
डॉ. कश्यप के निधन पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित अनेक नेताओं ने शोक व्यक्त किया। प्रधानमंत्री ने उन्हें भारत के अग्रणी संवैधानिक विद्वानों में से एक बताते हुए कहा कि उनके लेखन और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने की प्रतिबद्धता सदैव याद रखी जाएगी।
डॉ. सुभाष कश्यप का जीवन ज्ञान, सेवा और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पण का प्रतीक था। उनका निधन केवल एक विद्वान की मृत्यु नहीं, बल्कि भारतीय संसदीय और संवैधानिक परंपरा के एक स्वर्णिम अध्याय का समापन है। आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें संविधान के मर्मज्ञ, लोकतंत्र के प्रहरी और संसदीय संस्कृति के महान संरक्षक के रूप में याद रखेंगी।
