भारत आध्यात्मिक साधना का देश है – डा.कृष्णगोपाल

 

डा.कृष्णगोपाल

रामजन्म भूमि की एक लड़ाई सारा देश अभी जीता है। मंदिर हिन्दू समाज के श्रृद्धा के केन्द्र हैं। यह जानते हुए भी रामजन्म भूमि की लड़ाई इतनी लंबी चली। जिन्होनें तोड़ा उन्हें भी पता था कि मंदिर हिन्दुओं की आस्था के केन्द्र हैं। जबकि स्वतंत्रता मिलते ही हिन्दू समाज से पूछा जाता कि एक हजार साल की लंबी लड़ाई के बाद अब देश स्वतंत्र हो रहा है। कौन कौन से ऐसे स्थान है जो हजार वर्षों में खंडित हो गए, अपमानित हो गए, तिरस्कृत हो गए। उन स्थानों की पुर्नप्रतिष्ठा होनी चाहिए। वो नही हुआ। जाने माने इतिहासकार अर्नाल्ड टायनबी दिल्ली आए थे। यह बात 1960 की है। टायनबी आजाद मेमोरियल व्याख्यान देने आए थे। अपने व्याख्यान में उन्होंने जो कहा उस पर गौर करने लायक है।  उन्होने कहा कि 1914-15 में प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था। पोलैंड पर रूस की सेनाओं का कब्जा कर लिया। वार्सा शहर के रोमन कैथोलिक क्रिस्चियन चर्च को रूस के सेनाओं ने गिराकर वहां इस्टर्न आर्थोडरल क्रिस्चिय कैथेडरल नामका चर्च बना दिया। बाद में जब रूस हट गया और पोलैंड स्वतंत्र हुआ तो पोलैंड के लोगों ने उस चर्च को तुरंत गिरा दिया। अपना चर्च स्थापित किया।

अर्नाल्ड टायनबी आगे कहते है ‘औरंगजेब ने जो मस्जिदें बनवाई थी उन मस्जिदों का एक उद्देश्य था। औरंगजेब दुष्ट आदमी था। वह अपमान करने के लिए भवनों को गिराता था और वहां मस्जिदे बनाता था। लेकिन मुझे आश्चर्य होता है कि हिन्दू समाज शांति के साथ ऐसी इमारतों को क्यों देखते रहते हैं, जो मंदिरों को तोड़कर बनाई गए?’

हिन्दू समाज उदार है, हिन्दू समाज आध्यात्मिक है, हिन्दू समाज विनम्र है, हिन्दू समाज किसी भी प्रकार के झगड़े से स्वयं को दूर रखने की कोशिश करता है। अयोध्या का नाम है जहां युद्ध न हो। ये युद्ध से विरत है। जो संघर्षों से दूर है उसका नाम अयोध्या है। हमारे देश के दो प्रमुख गुण है। एक गुण है हमारे देश की आध्यात्मिकता। दुनिया का दूसरा कोई देश वहां कि परंपरा के अनुसार आध्यात्मिक नही है। अध्यात्म का अर्थ होता है जब दूसरे व्यक्ति, वस्तु और जीव के अंदर उसी परमात्मा को स्वीकार करना जो स्वयं अंदर है। धीरे धीरे यह अनुभूति कि हम और वे, ये दो नही, एक ही है। इसी को अपने यहां कहा गया आध्यात्मिक साधना। इस आध्यात्मिक साधना से मन के अंदर की जो भेद दृष्टि है, समाप्त हो जाती है। इसके कारण से मन के अंदर जो घृणा, द्वेस, असत्य वचन और क्रूरता है, वह धीरे धीरे निकलता जाता है। जितना आध्यात्मिक व्यक्ति होगा, उतना वह दयावान होगा। उतना ही वह कृपालु, सत्यनिष्ठ, शीलवान होगा। आध्यात्मिक भाव धीरे धीरे सभी सदगुणो की वृद्धि करते हैं।

अयोध्या ऐसी आध्यात्मिक भाव की पुरातन नगरी है। लोगों को यह भ्रम है कि यह केवल राम का जन्मस्थान है। अयोध्या उस समय के चलने वाले सभी मत संप्रदायों के एक समन्वय का केन्द्र था। भगवान राम के वंशजो की यह भूमि तो है ही। हमे इसके साथ ध्यान रखना होगा कि जैन धर्म के पांच प्रमुख तीर्थंकर की जन्मस्थली अयोध्या है। श्रृषभदेव जी जन्मस्थान अयोध्या है। जो रामजी का वंश है वही श्रृषभदेव जी का भी वंश है। अयोध्या में आज भी इन पांच तीर्थंकरों के चरणचिन्ह है। उनके मंदिर हैं। श्रृषभदेव जी, अजितनाथ जी, अभिनंदननाथ जी, सुमंतनाथ जी और अनंतनाथ जी का मंदिर आज भी है।

भगवान बुद्ध 16 बार चातुर्मास करने अयोध्या आए। ह्वेनसांग और फाह्यान दोनो अयोध्या गए थे। दोनो लंबे समय तक अयोध्या में रहे। उन्होंने वहां पर 200 फीट ऊंचा स्तूप देखा। दोनों ने अपने यात्रा विवरण में अयोध्या के स्तंभ की चर्चा की। प्रसेनजीत वह पहला राजा था जिसे बुद्ध ने दीक्षा दी। वह प्रसेनजीत कौसल का ही राजा था। बाद में कई राजाओ ने दीक्षा ली। गुरूनानक देव यात्रा करते हुए अयोध्या पहुंचे। कई दिनों तक वह अयोध्या में रहे। गुरू तेगबहादुर आसाम से लौटते हुए अयोध्या में कई तक रूके। गुरू गोविंद सिंह भी अयोध्या आए। उसके बाद निहंगों की सेना रामजन्म भूमि के युद्ध के लिए अयोध्या आयी। इस युद्ध में शहीद हुए इन सभी की स्मृतियां सूर्यकुंड में मौजूद है।

इस तरह हम कह सकते हैं कि हिन्दू, जैन, बौद्ध और सिक्ख धर्म का बड़ा स्थान अयोध्या है। नाथ योगियों का भी बड़ा स्थान अयोध्या रहा। इस परंपरा की 17 पीढी ने अयोध्या पर शासन किया। यही नहीं रामानंद जी का बड़ा केन्द्र अयोध्या था। जब मुसलमानों ने बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कराए तो धर्मांतरित व्यक्ति वापस हिन्दू धर्म में नहीं आ सकता था। जो व्यक्ति हिन्दू धर्म में वापस आया और जो ले गया दोनो की सजा मौत थी। रामानंद जी का प्रमुख केन्द्र काशी था। स्वामी रामानंद जी अयोध्या आए। अयोध्या आकर वह बड़ी संख्या में अपने शिष्य परंपरा को एकत्रित किया। उन्होंने का कहा गले में तुलसी की माला पहनों और रामनाम उच्चारण करो आप शुद्ध हो गए। ये बारहवीं तेरहवीं शताब्दी की बात है। कबीर, रयदास, धन्ना रामानंद की शिष्य परंपरा के थे। ऐसे हजारों शिष्यों को लेकर रामानंद आगे बढे।

अयोध्या डीएम एडवर्ड ने 1901 एक समिति का गठन किया। समिति का नाम था एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा था। एडवर्ड की पहल पर अयोध्या के आसपास 148 स्थानों की सूची बनाई। उन्हें चिन्हित किया। इन सभी स्थानों पर पत्थर लगवाए। उसमें रामजन्म भूमि भी है। सभी सथान श्रषियों मुनियों की तपस्थली है। इसमें नाथ योगियों, जैन मुनियों, रामजी की जलसमाधि के स्थान भी हैं। तीर्थ विवेचनी सभा का मतलब है कि आज से हजारों साल पहले, इस्लाम के आगमन तक अयोध्या एक ऐसा तीर्थ था जहां जैन भी थे बौद्ध भी थे। सिक्ख भी थे योगी भी थे। सनातनी परंपरा के वैदिक भी थे। रामजी जिस शिव मंदिर में पूजा करते थे वह स्थान भी है।

भारत की सनातन आध्यात्मिक परंपरा सहिष्णुता का संदेश देती है। हम कभी एक दूसरे के साथ गला काट लड़ाई नहीं लड़ते। सनातन परंपरा में हमेशा त्याग को महत्व दिया गया। समाज में जितनी भी परंपराएं हैं, जितने भी विश्वास और आध्यात्मिक धाराएं हैं, पूजा पद्धतियां हैं, वह सब मिलकर रह सकती हैं। पश्चिम की धारा असहिष्णुता की धारा हैं। यह हम इतिहास को देख कर कह सकते हैं। पश्चिम के लोग घृणा का भाव लेकर चले। उन्होंने सैकड़ों हजारों परंपराओं और संस्कृतियों को नष्ट कर दिया। वे संस्कृतियां दुबारा जीवित नहीं हो सकी। जैसे मिस्र के लोग बड़े उन्नत लोग थे। उन्होने बड़े-बड़े पिरामिड बनाए। मरे हुए लोगों को संभालकर रखने की तकनीक बनाई। आज जो ममी निकलती है वह 5000-6000 साल पुराने है। वे बड़े विद्वान लोग थे। कर्मठ भी थे। पिरामिड को देखकर बताया जा सकता है। उन्हें नष्ट करने वाले बर्बर थे। बुद्धिमान नहीं। वह जंगली थे जिन्होने फलती फूलती एक सभ्यता को नष्ट कर दिया।

ग्रीक यूरोप का मस्तिष्क कहा जाता था। बडे विद्वान लोग ग्रीक में रहते थे। यूनानी लोग थे। अरस्तू उन्हीं में से एक था। वहां चर्चा की परंपरा थी। विचार और संवाद की परंपरा थी। जिन्होनें ग्रीक को बर्बाद किया वह निहसंदेह बर्बर थे। जंगली थे। जिन्होने रोम और पर्सिया जैसी सभ्यताओं को समाप्त कर दिया। वे क्रूर लोग थे। विद्वता में उतने आगे नहीं थी। गांव के गांव जला डालते थे। ऐसे ही कई सभ्यताओं का नाश हो गया। वह दुबारा खड़े नहीं हो पाए। ईरान के लोग 2000 साल पूर्व भागे  और उसके बाद स्थापित नहीं हो सके। लेकिन हम खत्म नहीं हुए। हम लोग लड़े। जब लगा कि हार गए तो चुपचाप किसी गांव में भजन किर्तन करने लगे। और जब बड़े मंदिर टूट गए तो छोटे छोटे मंदिर लेकर अपने घरों को निकल गए। किसी ने रामनाम जपा किसी ने मानस पढ़ा। चुपचाप शांति से मौका देखा और मौका देखकर फिर खड़े हुए। इस्लाम हिन्दुत्व को नष्ट करने की मंशा से भारत आया था। वह ऐसा अनेक देशों में ऐसा कर चुके थे। यहां तो मंदिर टूटे, कई बार टूटे लेकिन यहां के लोगों के अंदर मंदिर बनाने की वृत्ति नहीं तोड़ पाए। मंदिर बनाने के पुर्नसंकल्प को वो खंडित नहीं कर सके। सब हार मान गए पर हिन्दू हार नहीं माने।

अयोध्या का संकल्प सामान्य नही है। ये पूर्नजीवन का संकल्प है, जो इस देश की विशेष बात है वो आध्यात्मिकता है। उस आध्यात्मिकता को पुर्नजागरण का संकल्प है। हमारी आध्यात्मिक भावना सारे देश को जोडकर रखती है। ड़ा. राममनोहर लोहिया जी बड़े समाजवादी नेता थे। बडे विद्वान थे, प्रमाणिक व्यक्ति थे। वो सच को सच कहने की हिम्मत रखते थे। वो कहते थे कि मै भगवान को नही मानता हूं, मूर्ति पूजा करने के लिए भी नहीं जाता हूं। लेकिन वे लिखते हैं किसी  भी  एक मंदिर में जाकर आप एक कोने में खड़े हो जाइए तो एक घंटे में सारा भारत आपकी आंखों के सामने से निकट जाएगा। यही भारत भारत है।

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