जहं जहं चरण पड़े रघुवर के

राजेन्द्र पांडे

भारत के भूगोल की देह ऐसी है, जिस पर कदम दर कदम ऋषियों ने महनीय हस्ताक्षर किए हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जैसा जननायक अयोध्या से श्रीलंका के बीच जहां भी चले, ठहरे वहीं राम की अवरा शक्ति ने सशक्त हस्ताक्षर कर दिए। तत्समय की समय की शिलाओं पर उनके जो हस्ताक्षर है, वे इतने गाढ़े है कि मिट नहीं सकते। अब ऐसे हस्ताक्षरित स्थलों की ओर आगे बढ़ते हैं, जो जनश्रुति में मान्यता प्राप्त है, धर्म साहित्य में वर्णन है। इन स्थलों के प्रति लोगों की अगाध श्रद्धा आज भी प्रवाहित हो रही है।

                                                                             उत्तर प्रदेश

समय चक्र और माया के प्रभाव में कैकेयी ने दशरथ से दो वर मांगे थे। एक से उनके पुत्र भरत को अयोध्या की राजगद्दी और दूसरे वर से श्रीराम को १४ वर्ष का वनवास। वह भी बाबा तुलसी के शब्दों में तापस बेस विशेस उदासी, चौदह बरस राम वनवासी। वनवास के लिए निकले श्रीराम उत्तर प्रदेश के कई स्थानों से होते हुए दंडकारण्य की ओर गए थे। इस दौरान उन्होंने कई नदियों को पार किया था। अयोध्या से निकलने के बाद वह तमसा तक पहुंचे। तमसा पार करने के बाद उन्होंने वेदश्रुति (बिसुही) नदी को पार किया था। डिस्ट्रिक्ट गजेटियर फैजाबाद के अनुसार इस नदी का उद्गम सुल्तानपुर में एंजुर गांव का एक बड़ा ताल है। माना जाता है कि श्रीराम ने वेदश्रुति नदी को अशोक नगर में पार किया था। बिसुही नदी अंबेडकरनगर के श्रवण क्षेत्र में तमसा से संगम करती है। इसके बाद श्रीराम ने सुल्तानपुर शहर में गोमती को पार किया। यह स्थल सीताकुंड के नाम से जाना जाता है। गोमती पार करने के बाद श्रीराम ने सकरनी नदी को मोहनगंज व स्यांदिका नदी के देवघाट और बकुलाही को प्रतापगढ,़ के रामकलेवा तारा नामक स्थान से पार किया था। इसके बाद वह श्रंगवेरपुर पहुंच गए थे। यहां उनकी भेंट निषादराज से हुई थी। इसी स्थान के लिए बाबा तुलसी ने कहा है-

मांगी नाव न केवट आना, कहहिं तुम्हार मरम मैं जाना।

यहां आज भी भग्नावशेष के रूप में निषादराज का किला, संध्या घाट, राम शैय्या, वीरासन, जटाकुंड आदि स्थान मौजूद हैं। यहां के लोगों का मानना है कि श्रीराम ने यहां रात्रि विश्राम किया था। यहां से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर सीताकुंड नामक स्थान है। गंगा पार करने के बाद विभिन्न स्थानों से भ्रमण करते हुए श्रीराम प्रयाग धाम में भारद्वाज आश्रम पहुंचे थे। यह आश्रम उस समय गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम स्थल के करीब था। यहां श्रीराम ने ऋषि भारद्वाज का दर्शन किया और उनसे चर्चा भी की। आगे की यात्रा के लिए ऋषि भारद्वाज ने उनके साथ अपने चार शिष्यों को भेज दिया। लोक मान्यता है कि ऋषि भारद्वाज आश्रम से निकले श्रीराम प्रयाग के दक्षिण-पश्चिम की ओर यमुना तट से आगे कई गांवों के आसपास से होकर ऋषियों के जंगल पहुंच गए थे। उस समय इसे ऋषियन जंगल के नाम से जाना जाता था। इस जंगल में ऋषियों की मंडली अलग-अलग स्थानों पर रहकर तपस्या करती थी। यह स्थल कोटरा गांव से कुछ दूर पर यमुना के तट पर स्थित है।

                                                                                        मध्य प्रदेश

श्रीराम ने वनवास काल में मध्य प्रदेश के तत्समय दंडकारण्य में शामिल चित्रकूट, सतना, पन्ना, कटनी, जबलपुर, होशंगाबाद, उमरिया, शहडौल जिलों में भ्रमण किया था। इनमें कई चर्चित स्थल शामिल हैं। भ्रमण के दौरान वह जहां रुके और जहां से आगे बढ़े, जिन स्थानों पर उन्होंने भगवान भोले की आराधना की ऐसे पौराणिक स्थल जनश्रुति और परंपरा में आज भी शामिल हैं। प्रयाग की सीमा पार करने के बाद श्रीराम ऋषियों के जंगल में घूमने लगे थे। बडिय़ारी गांव के पास गुफा वाली सीता पहाड़ी पर इनके विश्राम करने की लोक मान्यता है। इससे आगे मुरका नामक स्थान से उन्होंने ऋषि भारद्वाज से भेजे गए उनके चार शिष्यों को वापस आश्रम भेजे जाने की मान्यता है। ऋषियों के इस जंगल में भ्रमण के दौरान ही अयोध्या में महाराज दशरथ की मृत्यु होना मानी जाती है। यहां के लोक परंपरा में लोरी नामक स्थान पर श्रीराम से अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध किए जाने की मान्यता है। यहीं से चित्रकूट की सीमा शुरू हो जाती है। चित्रकूट के मार्ग पर लालापुर में पहाड़ी पर स्थित महर्षि बाल्मीकि के आश्रम में पहुंतचने की आस्था यहां के लोगों में है। यही पर उन्होंने महर्षि बाल्मीकि से भेंट की थी। इसके बाद वह चित्रकूट पहुंच गए थे। चित्रकूट में श्रीराम ने कुछ समय बिताया था। चित्रकूट के ईर्द-गिर्द कई तीर्थस्थलों की मौजूदगी हैं। इनमें राम शैय्या, कोटि तीर्थ, देवामना, रामघाट, माण्डव्य आश्रम, भरत कूप, स्फटिक शिला, गुप्त गोदावरी जैसे कई तीर्थ शामिल हैं। श्रीरामचरित मानस का वह चर्चित स्थान यहीं पर है, जिसको लेकर कहा जाता है कि स्फटिक शिला पर इंद्र के पुत्र जयंत ने माता सीता के पैरों पर चंचु (चोंच) प्रहार किया था, जिसके बाद श्रीराम ने कुश को तीर के रूप में उसके पीछे छोड़ा तो त्रैलोक्य में उसे कहीं शरण नहीं मिली। मंदाकिनी नदी यहीं से होकर निकलती हैं। गुप्त गोदावरी को लेकर मान्यता है कि यहां चमत्कारिक रूप से जल लुप्त हो जाता है। यहीं पर मां सीता के स्नान के समय मयंक नामक चोर ने उनके वस्त्राभूषण चुराए थे। लक्ष्मण जी ने उसे दंडित किया था। ऐसी यहां मान्यता है। यहां से कुछ दूर पर ऋषि अत्रि का आश्रम है। लोक मान्यता है कि इसी आश्रम में श्रीराम, लक्ष्मण व सीता की मुलाकात अत्रि व मां अनुसूइया से हुई थी। मां अनुसूइया की तपस्या से मंदाकिनी की सहस्रधाराएं प्रकट हुईं थीं। लोक मान्यता है कि आगे अमरावती पहुंचे। यह स्थान श्रीराम के पूर्र्वज राजा अंबरीश की तपस्थली थी। यहां श्रीराम ने रात्रि निवास किया था। इसके आगे कुछ दूर पर विराध ने श्रीराम पर आक्रमण किया था, जिसके बाद उन्होंने उसका वध कर दिया था। विराध जहां दफनाया गया था। अब उसे विराधकुंड के नाम से जाना जाता है। आगे यात्रा करते हुए मार्कण्डेय आश्रम इसके बाद सतना जिले में स्थित ऋषि शरभंग के आश्रम पहुंचे थे। यहीं पर श्रीराम को इंद्र के दर्शन हुए थे। श्रीराम का आतिथ्य करने के बाद शरभंग मुनि ने योगाग्नि में स्वयं को भस्म कर लिया था। प्रतीक के तौर पर यहां श्रीराम लक्ष्मण कुंड, श्रीराम बाण से बना जल का स्रोत, सूर्य कुंड आदि चर्चित स्थल हैं। शरभंग आश्रम से आगे सिद्धा पहाड़ है। जिस स्थान के लिए बाबा तुलसी ने रामचरित मानस में कहा है कि अस्थि समूह देखि रघुराया पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया। फिर उन्होंने रक्ष संस्कृति के विनाश के लिए यहीं पर संकल्प लिया था, जिसके लिए बाबा तुलसी ने कहा है कि निश्चर हीन करऊं महि भुज उठाइ पन कीन्ह। इसके बाद श्रीराम सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में उनसे भेंट की। लोक मान्यता है कि सिद्धा पहाड़ ऋषियों के अस्थियों के ढेर से बना था। इसीलिए श्रीराम ने यहां निश्चरों के विनाश का प्रण किया था। बताते हैं कि इसकी खुदाई में मानव कंकाल बरामद हो चुके हैं। यहां स्थित मंदिर के कुएं को अमृत कुंड और झरने को सियावारि कहा जाता है। यह स्थल वनवासी समुदाय के लोगों से पूजित है। यह लोग यहां पर माता सीता से मन्नत मांगने आते हैं। इसे सीता रसोई भी कहते हैं। यहां से लगभग चार किलोमीटर दूर रामसैल पर्वत नामक स्थान पर श्रीराम के चरण चिंह्न पूजे जाने की प्रथा है। श्रीराम घूमते हुए मैहर के जंगल तक गए थे। वह पन्ना जिले मेंं ब्रहस्पति कुंड पर गए थे। इस स्थल को लेकर मान्यता है कि देवगुरु बृहस्पति ने यहां यज्ञ किया था। यह स्थान पहाड़ी खेरा से लगभग छह किलोमीटर दूर है। यहां से कुछ दूर पर ऋषियों का स्थल था। इनमें सुतीक्ष्ण आश्रम भी शामिल था। श्रीराम ऋषियों से मिलने यहां पहुंचे थे। लोक मान्यता है कि इस स्थान पर श्रीराम ने एक बार फिर यहां सारंग धनुष को पृत्वी पर टिका कर राक्षसों के वध की प्रतिज्ञा को दोहराया था। इसीलिए इस स्थान को सारंगधर के नाम से भी जाना जाता है। जबलपुर जिले के मगरमुहा रामघाट स्थान से नर्मदा नदी पार करने के बाद श्रीराम ने होशंगाबाद जिले में नर्मदा के तटीय क्षेत्रों में भ्रमण किया था। ऐसा माना जाता है कि उमर्धा के पास नर्मदा और दूधी नदी के संगम पर उन्होंने रात्रि विश्राम, स्नान-ध्यान किया। आगे कुब्जा नदी के पास बिल्वासक तीर्थ पर शिव की आराधना की थी। लोक मान्यता है कि उमरिया जिले में सोनभद्र व महानदी के संगम पर श्रीराम ने दशरथ जी का श्राद्ध किया था। राष्ट्रीय उद्यान ताला बांधवगढ़ की पहाड़ी से घूमते हुए वह मानपुर से लगभग १४ किलोमीटर दूर जंगल में सोनभद्र और जुहिला नदी के संगम तट से आगे बढ़े थे। वनवासी समुदाय के लोग यहां श्राद्ध करते हैं। उनकी मान्यता है कि श्रीराम ने अपने पिता दशरथ का श्राद्ध यहां किया था। इसे दशरथ घाट विजौरी के नाम से भी पुकारा जाता है। शहडौल जिले के गंधिया गांव के पास वनवासी लोगों के साथ श्रीराम ने विश्राम किया था। यह स्थान सीतामढ़ी गंधिया के नाम से जाना जाता है। यहां सीता रसोई स्थित है।

                                                                        महाराष्ट्र प्रदेश

रामायणकालीन घटनाओं के तमाम चिंह्न महाराष्ट्र प्रांत में मिलते हैं। श्रीराम ने अपने वनवास काल में यहां के नागपुर, अमरावती, नासिक, यवतमाल, नांदेड़, वासिम, बुलढाणा, जालना, बीड, औरंगाबाद, अहमदनगर, मुंबई, पुणे, उस्मानाबाद, शोलापुर जिलों में भ्रमण किया था। उनके साथ अयोध्या की संस्कृति यहां पुष्पित व पल्लवित हुई। महाराष्ट्र के नागपुर जिले में कई स्थानों पर वनवासी श्रीराम ने भ्रमण के साथ निवास किया था। रामगिरि नामक पर्वत इसी की निशानी है। इसे बाद में श्रीराम मंदिर रामटेक के नाम से जाना जाने लगा। यहां निवास के साथ ही श्रीराम ने समाज के अति पिछड़ों के बीच रहकर उन्हें भयमुक्त किया था। नासिक जिले में सप्तश्रृंगी देवी मंदिर श्रीराम के वनवास काल का महत्वपूर्ण स्थल है। मान्यता है कि पंचवटी प्रवास के दौरान वनवासी श्रीराम यहां माता दुर्गा के दर्शनार्थ आए थे और राक्षसों से संघर्ष के लिए उन्होंने यहीं शक्ति की साधना की थी।

यवतमाल जिले के राले गांव रामायणकाल का अति महत्वपूर्ण स्थल है। माना जाता है कि सीता जी के श्राप से आज भी यहां गेहूं नहीं पैदा होता। यहां माता सीता का मंदिर बना है। नांदेड़ जिले में सीमा के निकट उनकेश्वर नामक स्थल पर शरभंग ऋषि का आश्रम है। यहां श्रीराम ने ऋषि के कुष्ठ को शांत करने के लिए अग्नि बाण से गरम जल का स्रोत बनाया था। यह आज भी निरंतर बह रहा है। इसी जिले में माहुर नामक स्थान से नौ किलोमीटर दूर पांच पर्वत शिखरों पर ऋषि यमदग्नि, अनुसूइया, अत्रि, दत्तात्रेय, रेणुका आदि के पांच मंदिर हैं। पास ही सर्वतीर्थ उपाझरा कुंड, अंब कुंड, मंत्रतीर्थ तथा गणेश मंदिर हैं। वासिम जिले में मुरडेश्वर नामक स्थान पर श्रीराम और शिव जी के साथ-साथ रहने की मान्यता है। कहा जाता है कि शिव जी ने मुडक़र श्रीराम का दर्शन किया था। इसलिए इसे मुरडेश्वर महादेव के नाम से पूजित किया जाने लगा। बुलढ़ाड़ा जिले में श्रीराम को पंचाप्सर सरोवर में संगीत की ध्वनि सुनाई पड़ी थी। लोड़ार में स्थित विश्व के इस अद्भुत स्थल में मंडकरणी ऋषि पांच अप्सराओं के साथ जल में रहते थे। इसीलिए संगीत की ध्वनि सुनाई पडऩे की बात कही जाती है। जिले के सिंदखेड़ में बहुत प्राचीन रामेश्वर शिव मंदिर है। मान्यता है कि वनवासी श्रीराम ने इसकी स्थापना की थी। जालना जिले के वनों में भ्रमण के दौरान सेवली के निकट नागरतास स्थान के आसपास श्रीराम ने किसानों को हल चलाना सिखाया था। अब भी यहां हल व लीक की पूजा होती है। सेवली के शंभु सावर गांव के पास श्रीराम ने शंभु नामक दैत्य का वध किया था। भगवान शिव की आराधना की थी। इसीलिए इस स्थान को शंभु महादेव के नाम से जाना जाता है। श्रीराम ने जालना में दशरथ जी का श्राद्ध किया था। पुराणों में कुंडलिनी नदी के किनारे इस स्थान को रामतीर्थ नाम से श्मशान घाट बताया गया है। अंबड़ तहसील के रामस्य गांव में श्रीराम से स्थापित रामेश्वर लिंग, सीता मां से स्थापित सिद्धेश्वर लिंग व लक्ष्मण जी से स्थापित लक्ष्मणेश्वर मंदिर गोदावरी नदी के तट पर है। मान्यता है कि श्रीराम ने यहां भी दशरथ जी का श्राद्ध किया था। बीड जिले में श्नैश्चर मंदिर नामक स्थान है। लोक मान्यता है कि श्रीराम पर शनि की साढे साती लगने पर यहां पर भगवान शनि की पूजा की थी। आज भी लोग शनि के प्रकोप की शांति के लिए यहां पूजन-अर्चन करने आते हैं। नासिक जिले में अंकयी किला की पहाड़ी की चोटी पर एक विशाल गुफा में अगस्त्य ऋषि, श्रीराम, लक्ष्मण व माता जानकी का मंदिर है। निकट ही छह तालाब हैं, जिसमें शीतल स्वच्छ जल मिलता है। वनवास काल में श्रीराम यहां भी आए थे। इसे अगस्त्य आश्रम के नाम से जाना जाता है। पंचवटी प्रवास के दौरान श्रीराम आसपास के क्षेत्रों में भ्रमण करते थे। उसी दौरान उन्होंने पाटौदा गांव में रामेश्वर लिंग की स्थापना की थी। इस स्थान को ही रामेश्वर पाटौदा के नाम से जाना जाता है। इस शिवलिंग में आज भी सर्वदा पानी रहता है। इसे यहां लोग औषधि के रूप में प्रयोग करते हैं। नासिक से १६ किलोमीटर उत्तर में एक अति प्राचीन अगस्त्येश्वर आश्रम है। यहीं श्रीराम व अगस्त्य मुनि की भेंट हुई थी।

नासिक में गोदावरी नदी के किनारे पांच वट वृक्षों का एक स्थान है। इसी को पंचवटी के नाम से जाना जाता है। इसी पंचवटी के लिए बाबा तुलसी ने श्रीराम चरित मानस में लिखा है-

गीधराज सैं भेंट भइ, बहु विधि प्रीती बढ़ाइ।

गोदावरी निकट प्रभू रहे परन गृह छाइ।।

श्रीराम ने सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ लंबी अवधि तक यहां प्रवास किया। लोगों का विश्वास है कि यहीं से रावण ने सीता माता का अपहरण किया था। पंचवटी से आठ-दस किलोमीटर दूर गोदावरी तथा कपिला नदी के संगम पर श्रीलक्ष्मण जी ने सूर्पनखा की नाक काटी थी। नासिका कर्तन स्थल के नाम पर ही यहां का नाम नासिक पड़ा है। पंचवटी से लगभग चार किलोमीटर उत्तर की ओर म्हसरूल में दो सरोवर श्रीराम व सीता मां के नाम पर हैं। दोनों लोग इन सरोवरों में स्नान करते थे। यहां से १६ किलोमीटर दूर गुजरात मार्ग पेट रोड पर पहाड़ी है, जिसे रामसेज पर्वत के नाम से जाना जाता है। इसे लोक मान्यता में सीता और श्रीराम के विश्राम स्थल हैं। यहां से २८ किलोमीटर पश्चिम गोदावरी के उद्गम स्थल के पास श्रीराम ने कुशों से दशरथ जी का श्राद्ध किया था। इसीलिए इसका नाम कुशावर्त तीर्थ त्रयंबकेश्वर है। गोदावरी के उद्गम स्थल गोमुख से कुछ आगे चलकर मां गोदावरी पुन: लुप्त हो गई थीं। कहा जाता है कि श्रीराम ने बाण से यहीं पर पुन: मां गोदावरी को प्रकट किया था। इसलिए इसे रामकुंड त्रयंबकेश्वर के नाम से जाना जाता है। जिले में सिद्धेश्वर प्रावरा संगम नामक स्थान है। मान्यता है कि मारीच श्रीराम से डरकर यहां छुप गया था। शिव कृपा से श्रीराम को मारीच यहां मिला। इसीलिए सिद्धेश्वर मंदिर की यहां स्थापना हुई। जिले के ठाण गांव की मान्यता है कि मारीच को मारने के लिए श्रीराम ने यहीं से खड़े होकर उस पर बाण का संधान किया था। नेफाड़ से दस किलोमीटर पूर्व दिशा में गोदावरी के किनारे बाणेश्वर मंदिर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने यहीं से खड़े होकर मारीच को मारा था। हालांकि इस तरह के दो स्थान हैं। नासिक के बाणेश्वर मंदिर के स्थान पर से ही श्रीराम ने मारीच पर बाण छोड़ा था। इसीलिए बाद में इसका नाम बाणेश्वर हुआ। नेफाड़ से १२ किलोमीटर पूरब दिशा में मृग व्याधेश्वर स्थान स्थित है। यहीं पर मारीच को बाण लगा था। मध्यमेश्वर नांदूर स्थान पर बाण लगने के बाद मारीच ने श्रीराम की नकली आवाज निकाली थी। इसी स्थान पर श्रीराम व लक्ष्मण जी की भेंट हुई थी। नासिक से ५८ किलोमीटर दूर घोटी के पास काकेर गांव में सर्वतीर्थ वही पवित्र स्थल माना जाता है, जहां सीता जी का हरण कर ले जा रहे रावण का जटायु से युद्ध हुआ था। श्रीराम ने उनका अग्नि संस्कार और जलांजलि दी थी। मान्यता है कि औरंगाबाद जिले में रामेश्वर खांड गांव में बाण लगने पर मारीच का धड़ काय गांव में गिरा और सिर टोक गांव में। यहां श्रीराम द्वारा स्थापित शिव मंदिर है। अहमदनगर जिले कें मुक्तेश्वर नामक स्थान के बारे में लोक मान्यता है कि श्रीराम ने इसी स्थान पर मारीच को मुक्ति प्रदान की थी। रामनवमी एवं चैत्र माह के अंतिम सोमवार को यहां मेला लगता है। सीता की खोज करते हुए श्रीराम मुंबई में समुद्र तट तक आए थे। यहां उन्होंने बालू के शिवलिंग की स्थापना की थी, अपने बाण से मीठे जल का स्रोत बनाया था। वही बालुकेश्वर मंदिर है। मीठे जल का स्रोत बाण गंगा की अजस्र धारा अब भी प्रवाहित हो रही है।

मुंबई से पुणे की ओर जाने के दौरान श्रीराम रामदरिया नामक स्थान से होकर गुजरे थे। यह स्थान पहाड़ की दो चोटियों से बना रामद्वार कहलाता है। श्रीराम ने घोड़ नदी के किनारे रूर नामक राक्षस का वध किया था। इस स्थान का नाम रामलिंग देवस्थानम है। राक्षस का सिर जहां गिरा वह स्थल पहले सिररूर के नाम से था जो अब उसे सिरूर कहा जाता है। उस्मानाबाद जिले के एडेश्वरी नामक स्थान पर श्रीराम ने सती माता से भेंट की थी। सती माता ने श्रीराम की परीक्षा लेते समय काफी लंबी दूरी तक उनके आगे-आगे यात्रा की थी। उसी दौरान श्रीराम ने सती मां को एडयी मां कहकर पुकारा था। ऐडशी के निकट घने जंगल में श्रीराम ने शिवलिंग की स्थापना की थी। इसीलिए यहां स्थित मंदिर का नाम रामलिंग है। जिले के तुलजापुर में श्रीराम वरदायिनी स्थल पर सती मां ने श्रीराम की परीक्षा लेने के बाद उन्हें माता सीता की खोज में सफल होने का वरदान दिया था। इसी के पास घाटशिला मंदिर है। जहां मां सती ने अपने वास्तविक रूप में आकर श्रीराम को सीता की खोज के लिए दक्षिण की ओर जाने के लिए बताया था। लोक मान्यता है कि शोलापुर जिले में श्रीराम तुलजापुर से बोरी नदी के किनारे-किनारे आगे बढ़े थे। किनी गांव के निकट उने स्नान स्थल को रामतीर्थ किनी गांव के नाम से जाना जाता है।

                                                                         छत्तीसगढ़ प्रदेश

वनवास में श्रीराम ने छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में भी काफी समय बिताया था। प्रदेश के कोरिया, सरगुजा, धमतरि, रायपुर, विलासपुर, महासमुन्द्र, कांकेर, बस्तर, दंतेवाड़ा जिले के अदिवासी, गिरिवासी लोगों के बीच अयोध्या की संस्कृति के मुताबिक उनके जीवन में परिवर्तन लाने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए थे, जिसका प्रभाव अब तक परिलक्षित होता है। छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के जनकपुर से लगभग २५ किलोमीटर दूर मवई नदी के किनारे सीतामढ़ी नामक स्थान पर श्रीराम के पहुंचने की लोक मान्यता है। जनकपुर से ४० किलोमीटर पूर्व दिशा में छतोड़ा के पास नेउर नदी के किनारे श्रीराम के पहुंचने और विश्राम करने की लोक मान्यता के चलते वनवासी लोग आज भी मां सीता से मन्नत मांगने यहां आते हैं। माना जाता है कि जनकपुर से ५० किलोमीटर दूर वरुणी नदी के किनारे श्रीराम के दर्शन के लिए देवांगनाएं पहुंची थी। सरगुजा जिले के जंगलों में लंबे समय तक श्रीराम ने भ्रमण किया था। यहां बहुत से स्मृति चिंह्न बताए गए हैं। इनमें से लक्ष्मण पंजा एक स्थान है। दूर-दूर से वनवासी समुदाय के लोग इस पावन चरण चिंह्न का पूजन करने पहुंचते हैं। इन जंगलों में कई स्थलों को मां सीता से संबंधित माना जाता है। पाषाणों पर मां सीता से की गई चित्रकारी के दर्शन व पूजन के लिए घने जंगलों में आज भी वनवासी दूर-दूर से आते हैं। चित्रकारी में श्रीराम, सीता व लक्ष्मण के चित्र मिलते हैं। जंगल में ऐसे भी स्थान बताए गए हैं, जहां आज भी श्रीराम सीता और लक्ष्मण के चरण चिंह्न पाए जाते हैं। इसे राम, लक्ष्मण पायन मरहट्टाके नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि श्रीराम ने इसी मार्ग से जाकर महानदी पार की थी। श्रीराम ने जंगल में सरा नामक असुर का जिस स्थान पर वध किया था। उसे सरासोर के नाम से जाना जाता है। दंडकारण्य में विचरण के दौरान बेंगरा उदयपुर स्थान पर श्रीराम सीता के कुछ काल तक निवास करने की बात कही जाती है। वेंगरा का अर्थ रहने के स्थान से लिया जाताहै। इस पहाड़ी के पीछे लक्ष्मण बेंगरा है। माना जाता है कि यहां लक्ष्मण जी ठहरे थे। यहां श्रीराम के वनवास की चित्र लिपि है लेकिन यह अभी तक पढी नहीं जा सकी है। उदयपुर के पास प्राचीन राम मंदिर व सीता गुफा है। ऐसी लोक मान्यता है कि यहां पर श्रीराम के मिट्टी से जटाएं धोने के कारण गुफा से आज भी चिकनी मिट्टी निकलती है। इसे यहां के लोग चंदन मिट्टी कहते हैं।

जसपुर जिले में शिव मंदिर बगीचा नामक एक अहम स्थान है। लोक मान्यता है कि सीता मां ने यहां वनवासियों को ठंड और बुखार से बचाने के लिए तुलसी के पौधे रोपे थे और यह तुलसी का बगीचा बन गया। तब से यह बगीचा के नाम से प्रसिद्ध है। पहाड़ी की तलहटी में भगवान शिव का मंदिर है, बगीचा से दस किलोमीटर पूरब लेखा पत्थर रेंगले नामक स्थान पर श्रीराम के ठहरने की मान्यता है। यहां चट्टानों पर चित्र लिपि और उनके चित्र बने हुए हैं। वनवासी यहां श्रीराम, लक्ष्मण व सीता और भगवान शिव की अनगढी मूर्तियों की पूजा करते हैं। कुंकुरी से १८ किलोमीटर दूर रिंगारघाट के गांव के पास बगीचा-जसपुर मार्ग के निकट लक्ष्मण जी ने वराह रूप में विचर रहे राक्षस का संहार किया था, जिसे लक्ष्मण पंजा के नाम से जाना जाता है।

जसपुर जिले के राम मंदिर जसपुर लक्ष्मीगुड़ी स्थान पर सीता मां ने वनवासी महिलाओं को बांस की टोकरी बनाना सिखाया था। यहां आज भी बांस की बनी पहली टोकरी फलों सहित सीता मां को समर्पित की जाती है। जसपुर जिले में रामपायन लोधमा स्थान पर श्रीराम के चरण चिंह्न आज भी मौजूद हैं।

रायपुर जिले में रायपुर-घरगोड़ा मार्ग पर गेरवानी गांव के निकट जंगल में लक्ष्मण पादों की पूजा होती है। इस स्थान को लक्ष्मण पादुका के नाम से जानते हैं। रायगढ़ से २१ किलोमीटर दूर भूपदेवपुर स्टेशन के पास वनगभ्रण के दौरान स्नान करने वाले स्थान पर झरना है। इस झरने की विशेषता यह है कि किसी भी मौसम में झरने का पानी घटता और बढ़ता नहीं है। जिले में पैसर घाट से श्री राम के महानदी पार करने की मान्यता है। यहां शिवनाथ व महानदी का पवित्र संगम है। गांव में पुरातत्व विभाग ने खनन कर प्राचीन शिव मंदिर के अवशेष मिले हैं। जिले के शिबरी नारायण मंदिर से दो किलोमीटर दूर महानदी के पार प्राचीन वट वृक्ष को विश्राम वट कहते हैं। कहा जाता है कि तीनों लोगों ने यहां विश्राम किया था। नदी के किनारे-किनारे यात्रा करते हुए श्रीराम आरंग स्थान पहुंचे थे। कभी यह मोरध्वज की राजधानी रही है। लोक मान्यता है कि महानदी के किनारे भ्रमण काल में श्रीराम ने फिंगेश्वर में शिव मंदिर की स्थापना की थी। इसे फिंगेश्वर शिव मंदिर के नाम से जाना जाता है। राजीम-फिंगेश्वर मार्ग पर प्राचीन माण्डव्य आश्रम है। इसी आश्रम में श्रीराम दर्शन के लिए आए थे। दंडकारण्य में राक्षसों के वध के दौरान श्रीराम सर्गी ऋषि के यहां भी पहुंचे थे। इस स्थान को वर्तमान समय में सर्गी नाला के नाम से जाना जाता है। यहां के जल का तापमान व स्वाद अलग-अलग है। जिले के कुलेश्वरनाथ नामक मंदिर के बारे में मान्यता है कि यह जनकवंश के कुलदेवता थे। यहां माता सीता ने उनकी पूजा की थी। यह शिव मंदिर तीन नदियों की धारा में स्थित है। इसी जिले में लोमश ऋषि का आश्रम भी है, जहां श्रीराम पहुंचने की बात कही जाती है। रायपुर जिले में ऋषि मंडल महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इसमें सिहावा को केंद्र मानें तो २५ किलोमीटर के घेरे में लोमश (राजीम), बाल्मीकि, माण्डव्य, श्रंृंगी, मुचकुंद, सरभंग, सरभंग डोंगरी, अंगिरा (घटुला), अगस्त्य (हरदीभाटा/खारुगढ़), पुलस्त्य (दुधावा), पर्क/कंक (कांकेड़ डोगरी) के स्थल इसी क्षेत्र में हैं। ऋषि मंडल के सात ऋषियों के आश्रम में श्रीराम दर्शन के लिए आए थे। इस क्रम में वह अगस्त्य आश्रम हरदीभाटा भी पधारे थे।

बिलासपुर जिले में रतनपुर शहर में पहाड़ी पर श्रीराम करने की बात कही जाती है। पहाड़ी पर ऊंचे मंदिर में श्रीराम के पैर के अंगूठे से गंगा जी प्रवाहित हो रही हैं। इस स्थल को रामटेकड़ी कहते हैं। रायपुर के शिबरी नारायण से चार किलोमीटर दूर खरोद गांव में भगवान शिव के प्राचीन मंदिर की स्थापना लक्ष्मण जी ने की थी। इसकी मान्यता लक्ष्मणेश्वर मंदिर के रूप में है। मां शबरी शबर जाति की थीं। यहां मां शबरी का जन्म स्थान है। शबर परिवार नारायण भक्त था। श्रीराम यहां मिलने आए थे। इसे शिबरी नारायण के नाम से जाना जाता है।

महासमुन्द्र जिले में तुरतुरिया नामक स्थान के पास जंगल में महर्षि बाल्मीकि का आश्रम है। इसी जिले के राम दिवाला स्थान पर श्रीराम लक्ष्मण व सीता आए थे। आर्शग्रंथों में वर्णित यहां का श्रोणितपुर, श्रीपुर, शिवपुर नामों की यात्रा करता हुआ अब यह सिरपुर के नाम से प्रसिद्ध है। मान्यता है कि महानदी के किनारे चलते हुए श्रीराम धमतरि जिले के रुद्रेश्वर धमतरि, यहां से १५ किलोमीटर दूर विश्रामपुर से आगे निकले थे। धमतरि जिले में महानदी के छोटे से कुंड के उद्गम स्थल पर सिहावा स्थित श्रंृगी ऋषि आश्रम में ऋषि से मिलने पहंचे थे। यह आश्रम पहाड़ की चोटी पर है। साथ वाले पहाड़ पर मां शांता की तपस्थली है। मां शाता का अब शीतला माता के रूप में यहां पूजित है। धमतरि क्षेत्र में ही सरभंग आश्रम स्थित है। श्रीराम यहां संतों के दर्शनार्थ पधारे थे। नगरी से २० किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में घटुला गांव के पास पहाड़ की चोटी पर अंगिरा आश्रम है। यहां श्रीराम ऋषि से मिलने आए थे। नगर से २७ किलोमीटर दूर पूरब मैचिका गांव के पास एक अन्य ऋषि मुचकुंद ऋषि का आश्रम है। सिहावा से दक्षिण में सीता नदी को चित्रोत्पला नदी कहते हैं। यहां बाल्मीकि ऋषि का एक प्राचीन आश्रम है। वनवास काल में श्रीराम यहां आए थे।

इसी क्षेत्र में कर्क ऋषि का आश्रम दुधावा है। लोक मान्यता है कि यहां के ऋषि कर्क ने श्रीराम को शत्रु के हथियार ध्वस्त करने की विद्या सिखाई थी। कांकेर जिले में रामपुर जुनवानी में श्रीराम ने भगवान विष्णु की आराधना की थी। यहां आज भी एक मंंदिर है। जोगी गुफा यहां का चर्तित स्थल है। लोक मान्यता है कि इसी गुफा में ऋषि कंक तपस्या करते थे। श्रीराम ऋषि से आशीर्वाद लेने आए थे। यहां जोगी गुफा के अलावा रामनाथ मंदिर और गडिया मंदिर विशेष महत्व रखते हैं। जिले में भंडारीपारा में श्रीराम ने रामनाथ महादेव मंदिर की स्थापना की थी। कांकेर से १५-२० किलोमीटर आगे दुर्गम घाटी के ऊपर जंगल में बहुत विशाल शिवलिंग हैं। सरोवर हैं। श्रीराम वनवास काल में यहां पहुंचे थे। इस शिव मंदिर को केशकाल घाटी के नाम से जाना जाता है। बस्तर जिले में नारायणपुर से ११ किलोमीटर दूर राकस हाड़ा ऐसा स्थान है, जहां श्रीराम ने राक्षसों का भयंकर विनाश किया था। एक छोटी सी पहाड़ी पर राक्षसों की अस्थियां अब भी मिलती हैं। इन्हें जलाने पर हड्डियों जैसी गंध आती है। इसी जिले में रकसा डोंगरी नामक स्थान है। इस स्थान पर एक गुफा है। मान्यता है कि राक्षसों से युद्ध के दौरान श्रीराम ने सीता जी और लक्ष्मण जी को सुरक्षा की दृष्टि से इन गुफाओं में भेज दिया था। यह पहाड़ी राक्षसों की पहाड़ी मानी जाती है। श्रीराम ने तोड़मा नामक स्थान पर शिवमंदिर की स्थापना की थी। इंद्रावती नदी के जल प्रपात के पास एक गुफा में श्रीराम और मां सीता ने एक शिवलिंग की स्थापना भी की थी। जगदलपुर से २५ किलोमीटर दूर कांगेर नदी के किनारे श्रीसीताराम जी की लीला और शिव पूजा प्रसिद्ध है। जगदलपुर से ४० किलोमीटर दक्षिण राष्ट्रीय उद्यान में एक अति सुंदर गुफा है, जिसमें प्रकृति निर्मित अनेकानेक शिवलिंग हैं। वनवास काल में श्रीराम के यहां पहुंचने की अनेक लोककथाएं हैं। इसे कोटि महेश्वर के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में रामारम चिट्टमिट्टिन मंदिर नामक स्थान स्थित है। यहां श्रीराम ने भूदेवी धरती माता की पूजा की थी। पास ही एक पहाड़ी पर श्रीराम के पदचिंह्न बने हैं। दंतेवाड़ा जिले में कोंटा नगर से आठ किलोमीटर दूर उत्तर में शबरी नदी के किनारे इंजरम गांव में शिव मंदिर स्थित है।

लोक मान्यता है कि गुमला जिले के शिमडेगा से २०-२५ किलोमीटर उत्तर-पश्चिम जंगलों में श्रीराम ने अपने बाण से कुछ रेखाएं खींची थी। इसे रामरेखा के नाम से जाना जाता है। मलकान गिरि जिले में गुप्तेश्वर रामगिरि स्थान पर श्रीराम के चरण चिंह्न विद्यमान होने की मान्यता है। यह स्थान जगदलपुर से ५० किलोमीटर पूरब घनघोर जंगल में है। यहां एक अंधेरी गुफा में भगवान शिव ने शयन किया था। आज भी छत्तीसगढ़, उड़ीसा व आंध्र प्रदेश के हजारों वनवासी यहां पहुंचते हैं। बाली मेला व गोविंदपल्ली मार्ग पर खैरपुट नामक गांव से चार किलोमीटर दूर पहाड़ी पर प्राकृतिक कुंड अम्मा कुंड है। मान्यता है कि यहां मां सीता स्नान करती थीं। मां सीता से पालित मछलियों के आज भी यहां मिलने की मान्यता है। जिला मुख्यालय से ९० किलोमीटर दूर पहाड़ी व बस्ती पर डुमनरी पाडा स्थान स्थित है। यहां के लोगों का मानना है कि श्रीराम ने बालि को यहीं पर मारा था। जिले में मल्लिकेश्वर मंदिर स्थित है। यहां के लोग इसे किष्किंधा की तरह मानते हैं। कोंटा से आठ किलोमीटर दक्षिण दिशा में मोटू के जंगल में श्रीराम सीता, लक्ष्मण, शिव जी, गणेश जी आदि देवों के विग्रह भूमि से उभर रहे हैं लेकिन कुछ साल पहले खुदाई आरंभ करने के दौरान ही लाल रंग के सांप निकलने लगे थे।

आंध्र प्रदेश

अयोध्या की संस्कृति के साथ वन-वन घूम रहे श्रीराम ने आंध्र प्रदेश के खम्मम, करीमनगर, निजामाबाद के अति पिछड़े इलाकों में भ्रमण किया था। उन्होंने समाज के अति पिछड़े लोगों में आत्म सम्मान का भाव भरने के साथ ही भय को दूर किया था। श्रीराम खम्मम जिले के शबरी-गोदावरी संगम स्थान पर पहुंचे थे। कोंटा से ४० किलोमीटर दूर शबरी-गोदावरी संगम से दो किलोमीटर और दूरी पर सुंदर सीताराम स्वामी देवस्थानम श्रीराम मंदिर कोनावरम है। मान्यता है कि यहां वनवास के दौरान श्रीराम ने कुछ समय तक निवास किया था। इसी जिले के भद्राचलम से ३५ किलोमीटर पश्चिम दिशा में गोदावरी के किनारे पर्णशाला में भी रहे थे। लोक मान्यता है कि करीमनगर जिले में श्रीराम ने जिमिकुंटा, मंडल में इलेंदा के फलों से दशरथ जी का श्राद्ध किया था। आज भी लोग नया कार्य शुरू करने और पूर्वजों को श्राद्ध के लिए यहां आते हैं। इसे श्रीराम मंदिर इलेंदाकुटा के नाम से जाना जाता है। निजामाबाद जिले में निजामाबाद से ३० किलोमीटर दूर गोदावरी, माजरा तथा हल्दी होल के पवित्र संगम पर मां पार्वती का मंदिर ही स्कंदमाता मंदिर कहा जाता है। श्रीराम वनवास से संबंधित सिंदूर गांव की कथा यहां प्रचलित है। इसे स्कंद आश्रम कंदाकुती के नाम से जाना जाता है।

                                                                                     कर्नाटक

दंडकारण्य में भ्रमण के दौरान वनवासी श्रीराम ने कर्नाटक के विभिन्न क्षेत्रों में भ्रमण किया। कई स्थानों पर ठहरे और समाज के गरीबों को जीवन जीने की कला सिखाई। उन्होंने बीजापुर, बेलगांव, बागलकोट, कोपल, बेल्लारी, चित्रदुर्ग, हासन, मैसूर, मंडिया, सेलम के जिलों के आदिवासी इलाकों में रहे। श्रीराम ने बीजापुर जिले में सिडगी के उत्तर की ओर २० किलोतक मीटर तक माता सीता की खोज में आए थे। बेलगांव जिले में अथड़ी तालुका के रामतीर्थ गांव में राम जी से पूजा करवाने भगवान शिव सपरिवार यहां आए थे। श्रीराम के आग्रह पर शिव जी ने शिवलिंग का अलंकरण नाम रामेश्वर, गर्म जल से जलाभिषेक तथा केतकी फूलों से पूजा स्वीकार की। यह चारों परंपराएं आज भी यहां विद्यमान हैं। बागलकोट जिले में अथड़ी से ६० किलोमीटर दक्षिण जमखंडी में भगवान शिव की श्रीराम ने पूजा की थी। इसे रामतीर्थ जमखंडी के नाम से जानते हैं। बेलगांव जिले में रामदुर्ग में १६ किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर अधोमुखी राक्षसी की गुफा है। उसने भोग-विलास की इच्छा से लक्ष्मण जी को पकड़ लिया था। लक्ष्मण जी ने उसके नाक, कान काट लिए थे। बेलगांव में कबंध आश्रम स्थित है। कर्णीगुड्ड जिसे रीछों के पहाड़ के गांव के रूप में जाना जाता है। यहां टेढ़े-मेढ़े पत्थर की मूर्ति रखी है। यह कबंध के शरीर से मेल खाती है। यहां के लोग इसको राक्षस का मंदिर कहते हैं। यहीं पर श्रीराम ने कबंध नामक राक्षस का संहार किया था। बेल गांव में रामदुर्ग से १४ किलोमीटर उत्तर में गुनग्गा गांव मेंं शबरी आश्रम स्थित है। यहां आश्रम के आसपास बेरी वन है। बेर अब भी मीठे होते हैं। यहां शबरी मां की पूजा वनशंकरी, आदि शक्ति तथा शाकंभरी देवी के रूप में की जाती है। कोपल जिले में पंपासर नामक सरोवर है। यहां इस सरोवर के किनारे मंदिरों की कतार भी है। माता सीता की खोज के समय श्रीराम यहां आए थे। इसी जिले में हनुमान हल्ली नामक स्थान है। लोक मान्यता है कि हनुमान जी और श्रीराम का यहीं मिलन हुआ था। पास में ही एक पर्वत पर हनुमान जी की मां अंजना देवी का मंदिर भी है। सुग्रीव, श्रीराम, लक्ष्मण का मिलन हंपी में ऋष्यमूक पर्वत पर हुआ था। तब सुग्रीव बालि के भय से यहीं रहा करते थे। इसी पहाड़ी में एक कंदरा को सुग्रीव गुफा के रूप में मान्यता है। बेल्लारी जिले में चिंतामणि स्थान है। तुंगभद्रा नदी यहां् धनुषाकार आकार लेती हैं। लोकमान्यता है कि नदी के एक ओर बालि-सुग्रीव का युद्ध हुआ था और दूसरे किनारे से वृक्षों की ओट से श्रीराम ने बालि को बाण मारा था। यहां श्रीराम के चरण चिंह्न मौजूद हैं। माना जाता है कि जिले का अन्नागोंडी गांव ही प्राचीन किष्किंधा है। यहां बालि का भंडार, अंजनी पर्वत, वीरुपाक्ष मंदिर, कोदंडराम मंदिर, मतंग पहाड़ी स्थित है। हंपी से चार किलोमीटर दूर माल्यवंत पर्वत चोटी का नाम प्राश्रवण शिखर है। श्रीराम ने वर्षा के चार महीने प्राश्रवण चोटी पर बिताए थे। यहीं से लंका के लिए प्रस्थान किया था। यहां एक मात्र विग्रह है जहां श्रीराम ने धनुष धारण नहीं कर रखा है। जिले में स्फटिक शिला के स्थल को राम कचहरी के नाम से जाना जाता है। हनुमान जी ने श्रीराम को यहां सीता माता की खोज की सूचना दी थी और वानरों की सभा हुई थी। बेल्लारी जिले एक स्थान है चक्रतीर्थ। माना जाता है कि श्रीराम ने लंका से पुष्पक विमान द्वारा जब वायु यात्रा आरंभ की। विमान किष्किंधा पहुंचा तब माता सीता ने आग्रह किया कि वह वानर पत्नियों के साथ अयोध्या जाना चाहती हैं। तब पुष्पक विमान यहां चक्रतीर्थ पर उतरा था। बाद में सुग्रीव जी ने यहां कोदंड राम मंदिर की स्थापना की थी। चित्रदुर्ग जिले में होसदुर्ग से २५ किलोमीटर दूर रामगिरि नामक पहाड़ी है। लंका जाते समय श्रीराम ने यहां भगवान शिव की आराधना की थी। इसीलिए पहाड़ी का नाम रामगिरि और शिव मंदिर को रामेश्वर कहा जाता है। होसदुर्ग से ११ किलोमीटर दूर जंगल में हाल रामेश्वर में श्रीराम ने भगवान शिव की पूजा की थी। इसीलिए इसका नाम रामेश्वर पड़ा। हासन जिले में मनकमें भैरव मंदिर नामक स्थान स्थित है। लोक मान्यता है कि स्थानीय प्रभाव से यहां पर लक्ष्मण जी का मन राम भक्ति से टूट गया था। बाणेश्वर मंदिर नामक स्थान से लक्ष्मण जी ने श्रीराम के धनुष-बाण लेकर चलने से मना कर दिया था। ऐसी लोक मान्यता है। इसके बाद भगवान शिव ने दोनों पर स्थानीय प्रभाव बताकर शांत किया था। आगे रामेश्वर रामनाथपुर नामक स्थान पर श्रीराम ने शिवलिंग की स्थापना की थी। किष्किंधा के बाद कावेरी नदी के साथ-साथ सेना सहित लंबी यात्रा के बाद यहां पहुंचे थे। जिले में कावेरी नदी पार करने के बाद लक्ष्मणेश्वर रामनाथपुर नामक स्थान है। यहां पर लक्ष्मण जी ने कावेरी नदी के पार शिव पूजा की और लक्ष्मणेश्वर मंदिर की स्थापना की। मैसूर जिले में कोदंडराम मंदिर नामक स्थान कृष्णराज नगर के पास है। इसी के पास कावेरी नदी के किनारे चुंचाचुंची नामक राक्षस दंपत्ति को श्रीराम ने शिक्षा देकर सात्विक बनाया था और उनसे ऋषियों की रक्षा की थी। जिले में गावीरायन वेट्टा नामक स्थान है। लंका पर चढ़ाई करते समय श्रीराम ने गावी दैत्य का वध किया था। फिर उन्होंने शिव पूजा करके दशरथ जी का श्राद्ध किया था। सत्यगाला नामक स्थान से तीन किलोमीटर दूर प्रेत पर्वत पर भगवान शिव के मंदिर पर लोग आज भी श्राद्ध करने आते हैं। मंडिया जिले में धनुषकोटि नामक स्थान है। नगर से तीन किलोमीटर दूर स्थित जंगल में श्रीराम जी के बाण से बनाया गया जलस्रोत आज भी स्थित है। वानर सेना ने मेलकोटे नामक स्थान पर जलपान किया था। सेलम जिले में अयोध्या पट्टनम सेलम नामक स्थान है। लंका विजय अभियान के दौरान श्रीराम इसी मार्ग से होकर आगे बढ़े थे।

                                                                                      तमिलनाडु

वनवास के उत्तराद्र्ध में श्रीराम ने सुदूर दक्षिण सागर तट स्थित तमिलनाडु के त्रिचिरापल्ली, तंजावुर, तिरुवापुर, नागपट्टिनम, पोद्दूकोट्टई, रामनाथपुरम में भ्रमण किया था। हालांकि तमिलनाडु के विभिन्न क्षेत्रों के भ्रमण का समय लंका पर चढृाई की तैयारी का है लेकिन श्रीराम ने इस कठिन समय में भी धर्म, संस्कृति के अनुसार जो आचरण किया आज भी उसका प्रभाव इन क्षेत्रों में दिखाई पड़ता है। त्रिचिरापल्ली का मूल नाम त्रिसिरापल्ली है। इसे रावण के भाई त्रिसिरा ने बसाया था। श्रीराम की सेना यहीं से होकर रामेश्वरम गई थी। खर-दूषण और त्रिसिरा की ब्रह्म हत्या से छुटकारे के लिए श्रीराम ने जिस स्थान पर शिवपूजा की थी उसे शिवमंदिर पापनाशम के नाम से जाना जाता है। यहां रामलिंग रामेश्वरम की तरह ही बनाया गया है। यहां कुल १०८ शिवलिंग स्थापित किए गए हैं। यह स्थान तंजावुर जिले में है। सेना सहित श्रीराम के यहां पहुंचने पर ऋषियों ने उन्हें यहीं रहने के लिए कहा था। इसके बाद अनुमति पर लंका की ओर गए थे। लंका अभियान पर जाते समय नागपट्टिनम जिले में श्रीराम ने वेदरणेश्वर नामक स्थान पर भगवान शिव की पूजा की थी। यहां अति प्राचीन शिव मंदिर है। लोक मान्यता है कि जंगल में भगवान शिव के डमरू से वेदों का उद्घोष यहीं पर हुआ था। इस वेदारण्यम स्थान से सात किलोमीटर दूर रामपाद्म नामक स्थान है। मान्यता है कि श्रीराम ने यहां से समुद्र का दर्शन किया। इससे आगे वह समुद्र के किनारे-किनारे रामेश्वरम तक गए। समुद्र के तट पर जंगल में श्रीराम के चरण चिंह्न हैं। तिरुवायुर जिले में वीरकोदंड राम मंदिर नामक स्थान है। यहां के मंदिर में स्थापित विग्रह में श्रीराम की नसें स्पष्ट दिखाई देती हैं। इसका कारण सेना के नायक श्रीराम का रावण के प्रति गहरा आक्रोश था और वे वीर रूप में सैनिकों को दिखाई दे रहे थे। जिले के कल्याण राम मंदिर से आठ-दस किलोमीटर दक्षिण में श्रीराम ने शिव पूजा की थी। उसे मुत्तूकुंडा शिव मंदिर के नाम से जाना जाता है। मुत्तूकुंडा से दस किलोमीटर दक्षिण में रामनाथपुरम जिले के तीरतांड धाड़म में ऋषि अगस्त्य के आदेश पर श्रीराम ने शिव की आराधना की थी। यहां शिव मंदिर है। इसे शिवमंदिर तीरतांडें के नाम से जाना जाता है। धूप, गर्मी तपन से त्रस्त श्रीराम, लक्ष्मण ने स्नान कर गणेश जी की पूजा जिस स्थान पर की थी उसे तापनाशम विनायक मंदिर के नाम से जाना जाता है। गणेश जी ने उन्हें युद्ध में विजयी होने का आशीर्वाद दिया था। देवीपट्टनम स्थान पर श्रीराम ने शनिदेव को शांत करने के लिए नवग्रह की पूजा की थी। विष्णु चक्र की पूजा की तो उन्हें आशीर्वाद मिला कि वानर सेना को समुद्री लहरें परेशान नहीं करेंगी। इसे नवग्रह तालाब के नाम से जाना जाता है। इसी जिले में समुद्र तट पर श्रीराम समुद्र से रास्ता लेने के लिए तीन दिनों तक तपस्यारत होकर पृथ्वी पर लेटे रहे। यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। इसे आदि रामेश्वर कहा जाता है। यहीं पर समुद्र ने प्रकट होकर श्रीराम को पुल बनाने की युक्ति बताई थी। इस स्थान को दर्भसैनम के नाम से जाना जाता है। जिले के छेद्दुकरई स्थान से समुद्र में लगभग दो किलोमीटर आगे बढऩे पर सेतु के अवशेष देखे जा सकते हैं। यह अवशेष समुद्र में दस से ११ फिट गहरे हैं। माना जाता है कि यहीं पुल की आधारशिला रखी गई थी। जिले में तंगचिमडम स्थान पर सेना के लिए शुद्ध मीठे जल की व्यवस्था में श्रीराम ने बाण मार कर यहां जलस्रोत बनाया था। इसी कुएं से मीठा पानी निकलता है। यह स्थान विलुंडी तीर्थ के नाम से चर्चित है। पास के जंगल में एक एकांत स्थान है। माना जाता है कि लंका जाने से पूर्व श्रीराम ने युद्ध नीति पर पहले स्वयं तथा बाद में मंत्रियों के साथ मंत्रणा की थी। उस स्थान को एकांत राम मंदिर के नाम से जाना जाता है। इसी जिले में समुद्र के तट पर गंधमादन पर्वत स्थित है। समुद्र के किनारे छोटी पहाड़ी को गंधमादन कहते हैं। इस पर श्रीराम के चरण चिंह्न बने हैं। यहां खड़े होकर श्रीराम ने समुद्र का सुंदर दृश्य देखा था। इसीलिए इसे रामझरोखा भी कहते हैं। जिले के कोदंडराम मंदिर को वह स्थान माना जाता है। जहां लंकापति रावण के भाई विभीषण श्रीराम की शरण में आए थे। यहीं उनका राज्याभिषेक हुआ था। रामेश्वरम मंदिर से धनुषकोटि के मार्ग में जटातीर्थ माना जाता है कि यहां श्रीराम ने अपनी जटाएं धोई थी। मान्यता है कि यहां स्नान करने से संतान की प्राप्ति होती है। जिले का अग्नि तीर्थ मुख्य तीर्थ स्थल है। श्रीराम ने यहां स्नान किया था। यहां स्नान कर मुख्य मंदिर में दर्शन किए जाते हैं। रामेश्वरम् मंदिर भगवान शिव के १२ ज्योर्तिलिंगों में से एक है। मंदिर परिसर में बने २२ कुंडों में सभी के जल का स्वाद भिन्न-भिन्न है। अयोध्या जाते समय श्रीराम ने विभीषण के अनुरोध पर धनुष की नोक से जहां पुल को तोड़ा था। धनुषकोटि के नाम से यह वही स्थान विख्यात है।

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