भारत में महिला सशक्तिकरण : अधिकार नहीं, जिम्मेदारी और सहयोग का भी विषय

प्रज्ञा संस्थानभारत में महिला सशक्तिकरण की चर्चा कई वर्षों से होती आ रही है। सरकारों द्वारा अनेक योजनाएँ चलाई जा रही हैं, समाज में जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं और महिलाओं को शिक्षा, रोजगार, राजनीति तथा अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ाने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं। आज महिलाएँ विज्ञान, खेल, सेना, प्रशासन, व्यापार और राजनीति जैसे हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं। यह निश्चित रूप से एक सकारात्मक परिवर्तन है। लेकिन इसके साथ-साथ यह समझना भी आवश्यक है कि महिला सशक्तिकरण के लिए केवल सरकार ही नहीं, बल्कि समाज का जागरूक होना भी उतना ही आवश्यक है।

केवल अधिकार प्राप्त कर लेना ही सशक्तिकरण नहीं होता, बल्कि उन अधिकारों का सही दिशा में उपयोग करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। सशक्तिकरण का अर्थ अच्छाई को स्थापित करना, अन्याय का विरोध करना और समाज को बेहतर बनाना है, न कि स्वयं अन्याय और शोषण करने वालों का हिस्सा बन जाना।

महिला सशक्तिकरण की चर्चा के बीच समाज में घट रही कुछ घटनाएँ हमें आत्ममंथन करने पर मजबूर करती हैं। हाल ही में सामने आए कुछ मामलों ने समाज को गंभीरता से सोचने पर विवश किया है। एक शिक्षित और आत्मनिर्भर युवती की विवाह के कुछ महीनों बाद संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। युवती के परिवार ने आरोप लगाया कि उसे दहेज और आर्थिक दबाव को लेकर मानसिक एवं शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था। दूसरी ओर, ससुराल पक्ष ने इसे आत्महत्या बताया और मानसिक स्वास्थ्य जैसी बातों का उल्लेख किया। इस घटना में सबसे गंभीर आरोप उसके पति और सास पर लगे। यह मामला केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज के सामने एक बड़ा प्रश्न भी खड़ा करता है कि महिलाओं के बीच पारस्परिक संवेदनशीलता और सहयोग भी उतना ही आवश्यक है।

समाज में अक्सर यह कहा जाता है कि पुरुषों ने महिलाओं को आगे नहीं बढ़ने दिया और उनके अधिकारों का हनन किया। यह बात कई परिस्थितियों में सही भी है, क्योंकि इतिहास गवाह है कि महिलाओं को लंबे समय तक शिक्षा, संपत्ति, स्वतंत्रता और निर्णय लेने के अधिकारों से वंचित रखा गया। हालांकि भारतीय संविधान लागू होने के साथ ही महिलाओं को समान अधिकार प्रदान किए गए और समय के साथ उनकी स्थिति में निरंतर सुधार हुआ है। आज महिलाएँ हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। इसके बावजूद एक सच्चाई यह भी है कि कई बार महिलाओं के संघर्षों में दूसरी महिलाएँ ही बाधा बन जाती हैं।

घर-परिवार में सास-बहू के विवाद, ननद-भाभी के तनाव, कार्यस्थल पर प्रतिस्पर्धा या सामाजिक दबाव जैसी अनेक परिस्थितियों में महिलाओं द्वारा महिलाओं का मानसिक शोषण देखने को मिलता है। कई मामलों में परिवार की महिलाएँ भी दहेज जैसी कुप्रथाओं को बढ़ावा देती दिखाई देती हैं। कभी-कभी एक महिला दूसरी महिला की स्वतंत्रता, सफलता या आत्मनिर्भरता को स्वीकार नहीं कर पाती। यह स्थिति अत्यंत दुखद है, क्योंकि जिस समाज में महिलाएँ एक-दूसरे का साथ दें, वहाँ वे और अधिक मजबूत बन सकती हैं।

महिला सशक्तिकरण का वास्तविक उद्देश्य महिलाओं को पुरुषों के खिलाफ खड़ा करना नहीं है। इसका उद्देश्य महिलाओं को आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और सम्मानजनक जीवन जीने योग्य बनाना है। पुरुष और महिला दोनों समाज के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। यदि दोनों के बीच संघर्ष की भावना होगी, तो समाज कमजोर होगा; लेकिन यदि दोनों सहयोग और सम्मान की भावना के साथ आगे बढ़ेंगे, तो समाज अधिक मजबूत और संतुलित बनेगा।

भारत की संस्कृति में नारी को शक्ति का स्वरूप माना गया है। हमारे यहाँ माँ दुर्गा, माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती की पूजा की जाती है। माँ दुर्गा शक्ति और साहस का प्रतीक हैं, माँ लक्ष्मी समृद्धि का और माँ सरस्वती ज्ञान का। यह केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि नारी समाज के लिए कितनी महत्वपूर्ण है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस समाज में देवी की पूजा होती है, वहीं कई बार महिलाओं को अपमान, हिंसा और भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इसलिए केवल पूजा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वास्तविक जीवन में भी महिलाओं को सम्मान देना आवश्यक है।

यह भी सत्य है कि आज भी कुछ पुरुष महिलाओं का अनादर करते हैं और उनके अधिकारों का हनन करते हैं। घरेलू हिंसा, दहेज, कार्यस्थल पर भेदभाव और मानसिक उत्पीड़न जैसी समस्याएँ अभी भी समाज में मौजूद हैं। इनका विरोध होना चाहिए और कानून को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। लेकिन किसी भी समस्या के लिए पूरे वर्ग को जिम्मेदार ठहराने के बजाय हमें व्यक्तिगत और सामाजिक व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए। समाज में अनेक पुरुष ऐसे भी हैं जो महिलाओं के सम्मान, शिक्षा और स्वतंत्रता का समर्थन करते हैं तथा उनके साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहे हैं। इसलिए हमें समस्या की जड़ को समझने और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की दिशा में कार्य करना होगा।

महिलाओं को भी आत्ममंथन करना होगा कि क्या वे दूसरी महिलाओं के लिए सुरक्षित, सहयोगी और प्रेरणादायक वातावरण बना रही हैं। यदि एक महिला दूसरी महिला का साथ दे, उसका मनोबल बढ़ाए और उसके संघर्षों को समझे, तो समाज में बड़ा परिवर्तन आ सकता है। एक माँ यदि अपनी बेटी और बेटे दोनों को समान संस्कार दे, एक सास यदि बहू को बेटी समान सम्मान दे, एक सहकर्मी यदि दूसरी महिला की सफलता से ईर्ष्या करने के बजाय उसका समर्थन करे, तो समाज में सकारात्मक बदलाव तेजी से दिखाई देगा।

रिश्ते कोई भी हों — सास-बहू, माँ-बेटी, पति-पत्नी, भाई-बहन, मित्र या सहकर्मी — हर रिश्ते की नींव आदर, प्रेम और सहयोग पर टिकती है। जब रिश्तों में अहंकार, प्रतिस्पर्धा और अपमान की भावना आ जाती है, तब परिवार और समाज दोनों कमजोर होने लगते हैं। इसके विपरीत यदि रिश्तों में समझदारी, सहानुभूति और सहयोग हो, तो जीवन अधिक सुखद और संतुलित बन सकता है।

आज समाज को आवश्यकता है कि वह केवल समस्याओं पर चर्चा करने के बजाय उनके समाधान की दिशा में आगे बढ़े। पुरुष और महिला दोनों को एक-दूसरे को प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहयोगी समझना होगा। बच्चों को बचपन से ही समानता, सम्मान और संवेदनशीलता के संस्कार देने होंगे। शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं होनी चाहिए, बल्कि वह इंसानियत, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी भी सिखाए।

महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल महिलाओं को अधिकार देना नहीं, बल्कि ऐसा समाज बनाना है जहाँ हर व्यक्ति — चाहे वह पुरुष हो या महिला — सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर के साथ जीवन जी सके। साथ ही इसका अर्थ यह भी नहीं है कि कोई किसी दूसरे का शोषण करे और उसे सशक्तिकरण का नाम दे। वास्तविक सशक्तिकरण वही है जिसमें सभी के अधिकारों और सम्मान की रक्षा हो।

समस्याएँ हर समाज में होती हैं, लेकिन उनका समाधान भी संभव है। आवश्यकता केवल सकारात्मक सोच, सहयोग और पारस्परिक सम्मान की है। यदि महिलाएँ महिलाओं का साथ दें, पुरुष महिलाओं का सम्मान करें और दोनों मिलकर समाज को आगे बढ़ाने का प्रयास करें, तो एक मजबूत, संवेदनशील और सशक्त समाज का निर्माण निश्चित रूप से संभव है।

अंततः समाज की वास्तविक शक्ति किसी एक की जीत में नहीं, बल्कि सभी के साथ आगे बढ़ने में है। जब हम एक-दूसरे को गिराने के बजाय संभालना सीखेंगे, तभी सच्चे अर्थों में विकास और सशक्तिकरण संभव होगा। आइए, हम ऐसा समाज बनाने का संकल्प लें जहाँ सम्मान हो, समानता हो, सहयोग हो और हर व्यक्ति को आगे बढ़ने का अवसर मिले। क्योंकि जब इंसान इंसान का सहारा बनता है, तभी समाज मजबूत बनता है और राष्ट्र प्रगति करता है।

 (द्वारा कमलाकांत पाठक )

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