वैश्विकअर्थव्यवस्था का अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में बढ़ता कदम

प्रज्ञा संस्थानआज की वैश्विक राजनीति केवल युद्ध और कूटनीति तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह आर्थिक शक्ति और मुद्रा व्यवस्था की लड़ाई भी बन चुकी है। हाल के वर्षों में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वैश्विक अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे “डी-डॉलराइजेशन” यानी अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में बढ़ रही है। विशेष रूप से तेल व्यापार, अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली और ब्रिक्स देशों की नीतियों ने इस बहस को और तेज कर दिया है।

अमेरिका लंबे समय से वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का केंद्र रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद डॉलर दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी बना और तेल व्यापार भी डॉलर में होने लगा। इसे “पेट्रोडॉलर सिस्टम” कहा गया। लेकिन अब रूस, चीन, ईरान और ब्रिक्स जैसे समूह इस व्यवस्था को चुनौती देने का प्रयास कर रहे हैं। ईरान-अमेरिका संघर्ष ने इस प्रक्रिया को और गति दी है।

दुनिया के अधिकांश देशों के विदेशी मुद्रा भंडार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल लेन-देन में अमेरिकी डॉलर का प्रयोग होता है। अमेरिका की ताकत केवल उसकी सेना नहीं, बल्कि उसकी मुद्रा भी है। डॉलर के कारण अमेरिका वैश्विक वित्तीय संस्थानों और भुगतान प्रणालियों पर प्रभाव बनाए रखता है।यदि कोई देश अमेरिकी नीतियों का विरोध करता है, तो अमेरिका उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा सकता है। ईरान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अमेरिका ने ईरान के बैंकिंग नेटवर्क, तेल निर्यात और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कई प्रतिबंध लगाए। इससे ईरान को भारी आर्थिक नुकसान हुआ।

इसी कारण कई देशों को यह महसूस होने लगा कि यदि पूरी दुनिया केवल डॉलर पर निर्भर रहेगी, तो अमेरिका किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। यही सोच डी-डॉलराइजेशन की नींव बन रही है।ईरान और अमेरिका के बीच तनाव नया नहीं है। लेकिन हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया में बढ़ती सैन्य गतिविधियों और तेल आपूर्ति संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर दिया है। हाल की रिपोर्टों में बताया गया कि अमेरिका-ईरान संघर्ष के  कारण तेल कीमतों में तेजी आई और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है। यहां से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। यदि यहां तनाव बढ़ता है, तो तेल बाजार में संकट पैदा हो सकता है। इसी स्थिति ने कई देशों को वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने के लिए प्रेरित किया।

डी-डॉलराइजेशन का अर्थ है अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय लेन-देन में अमेरिकी डॉलर की भूमिका को कम करना। इसका मतलब यह नहीं कि डॉलर अचानक खत्म हो जाएगा, बल्कि देश धीरे-धीरे अन्य मुद्राओं जैसे चीनी युआन, यूरो, रूबल या अपनी स्थानीय मुद्रा का उपयोग बढ़ा रहे हैं।रूस और ईरान ने तो आपसी व्यापार पूरी तरह डॉलर के बिना करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। चीन भी अपने “क्रॉस बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम को बढ़ावा दे रहा है ताकि स्विफ्ट जैसी पश्चिमी भुगतान प्रणाली पर निर्भरता कम की जा सके।

ब्रिक्स देशों ने हाल के वर्षों में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर जोर दिया है। रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों ने इस प्रक्रिया को तेज किया।रिपोर्टों के अनुसार ब्रिक्स देशों के बीच अब बड़ी मात्रा में व्यापार स्थानीय मुद्राओं में हो रहा है। भारत भी रूस से तेल खरीदने के लिए कई बार रुपये, दिरहम और युआन जैसे विकल्पों का इस्तेमाल कर चुका है। इससे यह संकेत मिलता है कि वैश्विक व्यापार में डॉलर का एकाधिकार धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है।हालांकि भारत पूरी तरह किसी एक गुट के साथ नहीं जाना चाहता। भारत की नीति संतुलन बनाए रखने की रही है। एक ओर भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर रूस और ईरान के साथ ऊर्जा संबंध भी बनाए हुए है।

चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है। वह लंबे समय से चाहता है कि तेल व्यापार में युआन का इस्तेमाल बढ़े। ईरान और रूस जैसे देशों पर अमेरिकी प्रतिबंध लगने के बाद चीन को यह अवसर मिला। कई रिपोर्टों में कहा गया है कि अब कुछ तेल सौदे युआन में हो रहे हैं और “पेट्रोयुआन” की अवधारणा मजबूत हो रही है। यदि तेल व्यापार में डॉलर की जगह दूसरी मुद्राओं का प्रयोग बढ़ता है, तो यह अमेरिकी आर्थिक शक्ति के लिए चुनौती बन सकता है।

हालांकि डी-डॉलराइजेशन की चर्चा तेजी से हो रही है, लेकिन यह कहना गलत होगा कि डॉलर जल्द खत्म हो जाएगा। आज भी वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार और अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में डॉलर की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था, उसके वित्तीय बाजार और निवेश प्रणाली पर दुनिया का भरोसा अभी भी मजबूत है।डॉलर की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्थिरता और वैश्विक स्वीकार्यता है। दुनिया के अधिकांश केंद्रीय बैंक अभी भी डॉलर को सुरक्षित मानते हैं। इसलिए निकट भविष्य में डॉलर का विकल्प पूरी तरह तैयार नहीं दिखता।लेकिन इतना जरूर है कि दुनिया अब “मल्टीपोलर फाइनेंशियल सिस्टम” की ओर बढ़ रही है, जहां केवल डॉलर ही नहीं बल्कि कई और मुद्राएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी ।

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