खादी के बहाने कुछ बातें

प्रज्ञा संस्थानबड़े खेद का विषय है कि खादी प्रदर्शनी के आयोजन की आवश्यकता महसूस की गई। यह कदापि बधाई देने का विषय नहीं है, क्योंकि आम तौर पर प्रदर्शनियां ऐसी वस्तुओं की लगाई जाती हैं, जो लोकप्रिय न हों। आम किस्म के चावल अथवा गेहूं या विदेशी तथा मिल में बने कपड़े की प्रदर्शनी लगाने की कभी आवश्यकता अनुभव नहीं की गई। क्योंकि देश का कोई भी कौना ऐसा नहीं होगा, जहां ये वस्तुएं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न हों। आयात किए हुए विदेशी कपड़े अथवा मिल में बने हुए देशी कपड़े में कोई विशेष अंतर नहीं है। मेरी नजरों में दोनों ही बराबर हैं। क्योंकि दोनों ही दशाओं में पैसे का बहुत बड़ा भाग अमीर एवं बड़े-बड़े मिल मालिकों के पास चला जाता है। गरीब मजदूरों को बहुत ही कम, वस्तुतः बहुत ही थोड़ा पैसा मिलता है।

जब मैंने खद्दर का काम शुरू किया था तो अहमदाबाद के बहुत से मिल-मालिकों ने, जिनमें से बहुतों को मैं अपना मित्र समझता था, कहा कि यह सब व्यर्थ है। उससे आपकी इच्छा के विपरीत लोगों के बजाए हम मिल मालिकों को बहुत अधिक लाभ होगा, क्योंकि खादी कभी हमारा मुकाबला नहीं कर सकेगी। मिल मालिकों ने सचमुच ही प्रतियोगिता में खादी को खत्म करने के लिए कपास के बचे हुए कचरे से एक नई किस्म का कपड़ा तैयार कर दिखाया। इन मिल मालिकों ने ही अपने कपड़े की कीमतें बढ़ाकर और इसके अलावा बहुधा विदेशी उत्पादन को स्वदेशी के नाम पर धोखे से लोगों के गले मढ़ कर बंगाल में स्वदेशी को खत्म कर दिया। उन्होंने मुझे इस बात की याद दिलाई और ठीक ही दिलाई कि उनके मिल उद्योग का आधार देश-भक्ति अथवा जनता के प्रति प्रेम नहीं है; वरन वह उनके लिए केवल व्यापार और उद्यम के रूप में ही है; और उसका उद्देश्य अपने हिस्सेदारों को ज्यादा से ज्यादा लाभांश देना है। परंतु जब बाद में उन्हें पता चला कि स्वदेशी आंदोलन के दिनों में जो कुछ किए जाने की कोशिश की जा रही थी, मैं उससे बिल्कुल भिन्न दिशा में प्रयत्न कर रहा हूं तो वे मेरे प्रयासों की सराहना करने लगे।

आप लोगों से आग्रह करता हूं कि आप स्वदेशी अथवा मिल में बने हुए कपड़े को उपयोग में न लाएं। यह आपका धर्म है कि आप खादी, केवल खादी ही खरीदें। जैसे केवल पचास वर्ष पूर्व आपके वस्त्र केवल गांवों में बनते थे, उसी तरह अब फिर होना चाहिए। मैं चरखा, हाथ कताई और हाथ-बुनाई के उन्हीं पुराने खुशहाल दिनों को फिर से लाना चाहता हूं। अर्थशास्त्रयों का कहना है कि मैं असंभव कार्य करना चाहता हूं। कुछ लोग मजाक के रूप में टीका-टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि जब मेरा देहांत होता तो मेरे मृत शरीर को जलाने के लिए लकड़ी की कोई कमी नहीं पड़ेगी, क्योंकि मैंने चरखे बनवा रखे हैं; इस रूप में मानो मैंने लकड़ी की पर्याप्त व्यवस्था पहले से ही कर ली है। कुछ भी हो यह तथ्य है कि मिल-उद्योग में गरीब मजदूरों को एक रूपया उत्पादन मूल्य की वरूतु में कठिनाई से एक पैसा मिलता है। रूपए पर एक आना भी उन्हें कभी नहीं मिलता। (महात्माजी ने आगे बोलते हुए, कुछ आंकड़ों का हवाला देते हुए लोगों की आर्थिक स्थिति का विस्तार से विवरण दिया।) लोगों की आमदनी के संबंध में दादाभाई नौरोजी, लार्ड कर्जन और आर.सी. दत्त ने जो आंकड़े प्रस्तुत किए हैं, वे वास्तविकता बताते हैं।

भारत की प्रति व्यक्ति आमदनी को बताने वाले छोटे-से निशान की तुलना में यह लंबी लाल पट्टी देखिए जो अमेरिका की प्रति व्यक्ति आमदनी को बता रही है। वहां एक व्यक्ति की, प्रतिदिन की, आमदनी 14 रूपए से ऊपर है और यहां प्रतिदिन 1।। आना है। अन्य देशों की आमदनी की तुलना कीजिए, क्रमशः इंग्लैंड, फ्रांस, जापान की प्रतिदिन की आमदनी 7,6, और 5 रूपए है और यहां प्रतिदिन 1।। आना औसत आमदनी है। यदि आप वेतन पाने वाले मंत्रियों, कार्यकारी पार्षदों और कुछ एक वकीलों तथा उनसे कुछ कम लखपतियों की आमदनी को इस हिसाब से अलग कर दें तो हमारे बहुसंख्यक गरीब लोगों की आमदनी इससे भी कम होगी।

मैं आपसे बड़ी विनम्रता से पूछता हूं कि आप कोई उपाय बताएं, जिससे इस स्वल्प आमदनी को बढ़ाया जा सके। मैं सभी से यह पूछता रहा हूं परंतु कोई लाभ नहीं हुआ। गहन चिंतन एवं हाल के वर्षों के दौरान लाखों लोगों से सजीव संपर्क के परिणामस्वरूप, मैंने यह सुझाव दिया है कि इस आमदनी को बढ़ाने के लिए केवल चरखे को ही साधन के रूप में अपनाया जा सकता है।

इस उत्पादन का अर्थ है 30,000 रूपयों का बिहार की 3,000 गरीब महिलाओं में वितरण। मेरे साथ दरभंगा के खादी केंद्रों में आइए और देखिए कि वहां की हिन्दू एवं मुसलमान महिलाओं को चरखे ने कितना उल्लास और कितनी प्रसन्नता दी है। यदि मैं इससे अधिक महिलाओं को काम नहीं दे सकता, तो यह मेरा नहीं, आपका दोष है। यदि आप उनके हाथों द्वारा बनाई गई वस्तुएं खरीदने की चिंता नहीं करते, तो काम आगे नहीं बढ़ सकता। आपके द्वारा प्रत्येक गज खद्दर खरीदने का मतलब उन महिलाओं के हाथ में कुछ पैसे रखना होगा। वे कुछ-एक पैसे ही होंगे, अधिक नहीं। परंतु जहां पहले एक पैसे की भी कमाई नहीं थी, वहां कुछ पैसों का भी महत्व होगा।

मैंने राजमहेंद्र और बारीसाल में पतित महिलाओं को देखा था। एक जवान लड़की ने मुझसे पूछा ‘‘आपका चरखा हमें क्या दे सकता है?’’ उसने कहा, ‘‘जो आदमी हमारे पास आते हैं, उनसे हमें कुछ-एक मिनटों के 5 या 10 रूपए मिल जाते हैं।’’ मैंने उसे बताया कि चरखे से आपको उतना तो नहीं मिल सकता; परंतु यदि आप लज्जास्पद जीवन जीना छोड़ दें, तो मैं आपको कातना और बुनाना सिखाने का प्रबंध कर सकता हूं और इनसे आपको समुचित जीविका कमाने में सहायता मिल सकती है। उस लड़की की बात सुनकर, मेरा दिल अंदर ही अंदर बैठ गया और मैंने ईश्वर से पूछा कि मेरा भी जन्म स्त्री के रूप में क्यों नहीं हुआ। मेरा जन्म स्त्री के रूप में न होने पर भी, मैं स्त्री बन सकता हूं और भारत की उन स्त्रियों के लिए ही, जिनमें अधिकांश को प्रतिदिन एक आना भी नहीं मिलता, मैं चरखा एवं अपना भिक्षापात्र लिए हुए देश भर में चक्कर काट रहा हूं।

मैं आपसे यह विनती, उन बहनों के लिए, करता हूं। मैं सरकार से विनती करने में भी कोई शर्म नहीं मानता। मैं खादी और चरखे के कार्यक्रम के लिए वाइसराय और मंत्रियों का सहयोग चाहता हूं। आप, आपको जो विभाग सौंपे गए हैं उनसे, मुझे पैसा दीजिए। अपने कर्मचारियों को खादी पहनाइए। अपने स्कूलों में चरखे शुरू करवाइए। अपने आप खादी पहनिए।

देश का यह मेरा तीसरा दौरा है। मेरा यह विचार है कि शिक्षित बिहारियों में से कुछ ही लोग प्रांत के गांवों में रहने वाले गरीब लोगों के उतने निकट संपर्क में आए हैं, जितना मैं स्वयं आया हूं। उनकी दुर्दशा का व्यक्तिगत रूप से अध्ययन करने के बाद मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि उनकी गरीबी को दूर करने का एक मात्र साधन चरखा है। कई लोगों का कहना है कि असहयोग आंदोलन के साथ खद्दर भी समाप्त हो गया है। परंतु ऐसी बात नहीं है। इसके विपरीद खादी ने बड़ी उन्नति की है। परंतु मुझे उसकी प्रगति से संतोष नहीं है। करोड़ों के लिए भोजन एवं काम की व्यवस्था करना मेरा उद्देश्य है। परंतु यह काम अभी लाखों की गिनती तक भी नहीं पहुंचा है।

मैंने खादी को सरकारी, गैर सरकारी और हिन्दू तथा मुसलमान दोनों के लिए संयुक्त मंच के रूप में पेश किया है। यदि हिन्दू यह सोचे कि इससे अधिकतर मुसलमानों को लाभ होगा, क्योंकि बुनकर (ज्यादातर) मुसलमान ही हैं, या मुसलमान यह सोचें कि इसका लाभ हिन्दुओं को होगा, क्योंकि अधिकतर हिन्दू महिलाएं ही कताई करती है-तो इसमें मेरा कोई बस नहीं है। वास्तव में इससे दोनों जातियों को लाभ होगा, क्योंकि बुनकर और कतैये हिन्दू और मुसलमान दोनों हैं। लोगों की यह भी शिकायत है कि खादी खुरदरी और घटिया किस्म की होती है। परंतु मैं पूछता हूं कि क्या आप माता की बनाई हुई रोटी को इस कारण से अस्वीकार कर देंगे कि दिल्ली के बढ़िया बिस्कुटों के मुकाबले में वह घटिया है। मुझे ऐसी आशा नहीं है।

प्रो. एस.बी. गुणतांबेकर एंव श्रीयुत वरदाचारी द्वारा लिखित, पुरस्कृत, ‘‘हाथ कताई और हाथ बुनाई’’ नामक निबंध आप लोगों को ध्यानपूर्वक पढ़ने की सलाह देता हूं। भाषण समाप्त करते हुए सभी लोगों से, विशेषकर शिक्षित और धनी लोगों से, हार्दिक अपील करता हूं कि वे चरखा और खादी को अपनाकर देश में उसके लिए वातावरण बनाएं। यदि एक बार ऐसा हो जाए तो उस प्रकार की प्रदर्शनी, जिसका मैं इस शाम को उद्घाटन करने जा रहा हूं, फिर कभी लगाने की कोई आवश्यकता नहीं होगी। आप गांवों में बसने वाले उन गरीब लोगों के लिए कुछ करें, जिनकी कीमत पर आप कस्बों और शहरों में चिरकाल से फल फूल रहे हैं? यह आपके योग्य काम है।

(अंग्रेजी से)

सर्चलाइट, 2.2.1927

(30 जनवरी, 1927 को पटना में खादी प्रदर्शनी के उद्घाटन के मौके पर प्रस्तुत भाषण)

चरखाः एक अद्वितीय उद्योग

 

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