लोकतान्त्रिक स्मृति में आपातकालीन इतिहास की युति-वियुति

शिवेंद्र सिंहसमझि बुझि दृढ़ हो रहे बल तजि निर्बल होय। कहैं कबीर सो संत को पला न पकड़े कोय ॥’ अर्थात् सोच-विचार कर दृढ़ बना रहता है; जो अपना बल तजकर निर्बल हो जाता है। कबीर कहते हैं, ‘उस साधक का पल्ला कोई नहीं पकड़ पाता है।’ कबीर वाणी की यह विवेचना आचार्य क्षितिमोहन सेन (पूर्व उपाचार्य विश्वभारती) की है, किन्तु परिस्थितिवश या व्यक्तित्व के अनुकूल वर्तमान राष्ट्रीय पटल पर सार्वजनिक जीवन में निर्लिप्त साधक भाव हेतु सुविख्यात पत्रकार रामबहादुर राय पर भी तकरीबन ठीक ही बैठती है। यदि आचार्य सेन जीवित होते तो वे भी राय साहेब के परिपेक्ष्य में इस तुलनात्मक उक्ति को असंगत नही मानते।

यूँ भी रामबहादुर राय ‘आपातकाल के संत’ कहे जाते रहे हैं और अपने निजी व्यक्तित्व में कबीर की भांति सधुक्कड़ी के रंग-ढंग से जीते आये हैं। तो जिस कालखंड में रामबहादुर राय का ये संतत्व आकार ले रहा था, उस दौर यानि भारत में आपातकाल की व्यथा-कथा, उसका जनतान्त्रिक संघर्ष, उसके इतिहास, तथ्य उद्घाटन जैसे कई बौद्धिक प्रभागों एवं आपातकाल से सम्बंधित लोकतान्त्रिक मूल्यों की मूल विषय वस्तु पर अपने चेतन-अवचेतन विचारों को शाब्दिक रूप से सूत्रबद्ध कर ‘इमरजेंसी के 50 साल लोकतंत्र को फांसी’ नामा पुस्तकीय स्वरुप में लेकर राय साहब उपस्थित है. ध्यात्वय है कि रामबहादुर राय को निकट ही भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण द्वारा’ सम्मानित किया गया है.
 इतिहास-बोध वर्तमान और भविष्य के सुरम्य अनुकूलता का एक नैसर्गिक आधार है. इतिहास वर्तमान की चकाचौंध या भविष्य की आशाधार्मिता में अपना अस्तित्व नही खोता. इसका तात्पर्य यह है कि इतिहास अतीत होकर भी सदैव अस्तित्वमान रहता है, चाहे वर्तमान के सौन्दर्य में या भविष्य की उम्मीद के आधारभूत सीख के रूप में. इसी अनुरूप भारतीय लोकतंत्र के अतीत, वर्तमान और भविष्य के राजनीतिक, सामाजिक और व्यावहारिक तथ्यों को शोध-दृष्टि से प्रकट करती है यह सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘इमरजेंसी के 50 साल’. 
प्रज्ञा संस्थान के सचिव राकेश सिंह द्वारा संपादित यह आलोच्य पुस्तक कुल 36 अध्यायों में विभाजित है. जिसमें हर अध्याय अपने भीतर आपातकालीन घटनाओं के यथार्थ का द्वन्द समेटे है . इस द्वन्द में शोध तथा तर्क भी है और रहस्य, रोमांच भी. उदाहरणस्वरुप, जैसे पहले अध्याय में लेखक ने हुबहू नोट किये रामलीला मैदान में दिए गये जेपी के भाषण का विवरण दिया है. चौथे अध्याय में, जेल में मिलने आने वाले अफसर से चंद्रशेखर कि बातचीत में इन्दिरा गाँधी की उनसे तल्खी का कारण, आठवें अध्याय में पुरुषोत्तम मावलंकर का छात्र आंदोलन को समर्थन और उससे विलगाव की पटकथा दी गई है.
नौवें अध्याय में 1934 के बिहार में आये भूकंप के दौरान ब्रिटिश सरकार के कार्यशैली से तत्कालीन बिहार बाढ़ के दौरान कि इन्दिरा सरकार कि मनोवृति की तुलना, तेरहवें अध्याय में हेमवती नंदन बहुगुणा के विरुद्ध इंदिरा गाँधी की कुंठा का चित्रण है. पंद्रहवें अध्याय में सिंधिया परिवार से इंदिरा के उलझाव- सुलझाव का रोचक इतिहास, सत्रहवें अध्याय में जनता पार्टी की टूट पर मधु लिमये एवं लालकृष्ण आडवाणी के वैचारिक द्वन्द का उल्लेख वर्णित है. बत्तीसवें अध्याय में शाह आयोग के रिपोर्ट का विवरण, उसके गायब होने एवं उस रिपोर्ट को पुनः स्थापित करने में एरा सेझियन (पूर्व राज्यसभा सदस्य) की भूमिका का रोचक प्रसंग व्यक्त किया गया है.
 इन सबसे बढ़कर पुस्तक के अध्याय तथ्यों की प्रमाणिकता को सहेजे हुए हैं, जिनमे शोध का पुट केंद्रित है. अत: समीक्षा और समदर्शिता के भाव में आलोच्य ग्रन्थ आपातकाल के इतिहास की तथ्यात्मक विवेचना है. वर्गीकृत रूप से यह किताब आधुनिक लोकतान्त्रिक इतिहास पर आधारित राजनैतिक इतिहास प्रभाग कि पुस्तक है . यानि पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक के पश्चात् संविधानविद् रामबहादुर राय अब इतिहासकार की नई भूमिका में अवतरित हुए हैं.
कभी गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने ‘शचीन्द्रनाथ सेन’ की रचना ‘दि पॉलिटिकल फिलॉसफी ऑफ़ रविंद्रनाथ’ की समीक्षा करते हुए लिखा था, ”जिस व्यक्ति का लेखन एक बहुत लंबे चिंतनकाल से जुड़ा हो, उसकी रचना-धारा को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखना ही उचित होता है.’ इस विचार के अनुकूल राय साहब की लेखकीय विशेषता की वज़ह से भी इस पुस्तक को इतिहास की श्रेणी में ही रखना होगा. अतः अपनी मेधा दृष्टि और शोध फलक के परिपेक्ष्य में यह पुस्तक मात्र बौद्धिक और शोधार्थी वर्ग के लिए ही नहीं बल्कि राजनितिक-सामाजिक रूप से जागरूक नागरिक समाज के आवश्यक रूप से पठनीय है. विशेषतः आलोच्य पुस्तक सामाजिक विज्ञान सम्बंधित विषयों के स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के लिए आवश्यक रुप से ध्यान संकेंद्रित ग्रन्थ है ताकि वे लोकतान्त्रिक व्यवस्था के आपात संकटों को समझ सकने की क्षमता विकसित कर सकें. इस नाते उक्त किताब को विश्वविद्यालय स्तर के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए.
 इसी सन्दर्भानुसार, निरपेक्ष दृष्टिकोण से आप्त सद्य प्रकाशित पुस्तक अपने शोध के सन्दर्भ प्रकटीकरण में रोचकता समेटे हुए है. अर्थात् किस्सागोई से इतर यह तथ्यपूर्ण इतिहास का मुजाहिरा है. दूसरे रूप में, यदि पाठक के मन में आधुनिक भारत के इतिहास के प्रति उत्कंठा से अधिक रोमांचकता के प्रति लगाव हो तब भी यह पुस्तक उसे बंधे रखती है. यह पुस्तक आपातकालीन भारतीय राजनीति की विवेचना के नये आयाम प्रकट करती है. जिसमें कई चौंकाने वाले घटना-क्रम और नई शोध सूचनाएं उपलब्ध हैं. इस किताब के तथ्य प्रकटीकरण में औपन्यासिक रोचकता है जो पाठकीय लाभ का अन्यतम पक्ष है.
वैसे समीक्षात्मक रूप से बतातें चलें कि यह पुस्तक मूल रूप में लेखक के पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों का संग्रह है यानि एक तरह से यह एक राजनीतिक विश्लेषण निपुण पत्रकार कि इतिहास मार्ग की शोध यात्रा भी है तथा इतिहासकार के रूप में परिवर्धन और परिमार्जन भी. अतः शोध के गांभीर्य और शोध अनुशासन के यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रदर्शन को समेटे आपातकालीन इतिहास आधारित इस तथ्य पर्याय ग्रन्थ के निरूपण हेतु वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय का शोधार्थी व्यक्तित्व साधुवाद का पात्र है.
 इस विषयानुकूल विशेष बात यह है कि आलोच्य पुस्तक का पाठक ये महसूस कर पायेगा कि लेखक रूप में रामबहादुर राय भारतीय लोकतन्त्र के इस संत्रासपूर्ण अध्याय को केवल लिख ही नही रहे हैं बल्कि जी भी रहे हैं. जैसा कि सर्वविदित है, राय साहब इस आपातकालीन संघर्ष-पथ के पथिक रहें हैं. वे इमरजेंसी के पहले मीसाबंदी एवं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय सचिव के रूप में इस लोकतान्त्रिक संघर्ष में शामिल एक आपातकाल सेनानी भी रहे हैं. यानि ये पुस्तक उनकी अपनी वैचारिक यात्रा है अर्थात् स्वयं के वर्तमान के साथ अपने अतीत को, देश के राजनैतिक इतिहास के दायरे में समेटे रामबहादुर राय की यात्रा का ‘अयन’ है. 
 साथ ही भाषाई दृष्टि से पुस्तक की भाषा क्लिष्टता से मुक्त सहज़ प्रवाहमय है जो सामान्य हिन्दी के साथ ही आंग्ल, उर्दू और फ़ारसी की शब्दावली से युक्त है. यानि कि लेखक सुगम तरीके से अपनी बात कह रहे है जो सामान्य एवं आधुनिक पाठक वर्ग के लिए भी सुग्राह्य बन पड़ा है.
 पुनश्च, प्रथमदृष्टया आलोच्य किताब में दो दिक्कतें हैं जिन्हें आलोचना के बिन्दु कह सकते हैं. पहली, अध्यायीकरण की लापरवाही पठनीयता की लयबद्धता को तोड़ती हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि अध्याय या पाठ की क्रमबद्धता घटनाक्रम के चलायमानता के अनुकूल नहीं हैं, जिससे आपातकालीन इतिहास को क्रमानुसार पढ़ने-समझने में दिक्कत हो रही है, विशेषकर इस विषय से अनभिज्ञ या नई आयु के पाठकों के लिए यह एक समस्या बनेगी. दूसरी दिक्कत है, तथ्यों के अनावश्यक दुहराव की, जो रोचकता की त्वरा को कई दफ़े मद्धिम करती लग रही हैं. उक्त दोनों समस्याएं अगले संस्करण के सुधार श्रेणी में सिद्ध हो सकने की संभाव्यता के कारण क्षम्य हैं.
 अब उक्त ग्रन्थ के सम्बन्ध में पाठक के मन में एक ईमानदार प्रश्न उभर सकता है कि वर्तमान में इस पुस्तक की साहित्यिक और ऐतिहासिक प्रासंगिकता क्या है? ऐसे में कहना होगा कि आज जब देश में घोषित-अघोषित आपातकाल का वैचारिक विमर्श भ्रम तथा कुंठा प्रसार के अवलंबन के साथ राजनैतिक कटुता के स्तर का मुद्दा बन चुका है, ऐसे में सद्य प्रकाशित पुस्तक आपातकाल के वास्तविक परिभाषा और व्याख्या का निरूपण लेकर ससमय उपस्थित है. जैसा की रामबहादुर राय लिखते हैं, ‘एक जुमला आम हो गया है। वह यह कि देश में अघोषित इमरजेंसी चल रही है। यह नया है। इससे पहले दस साल तक कांग्रेस के नेताओं ने लगातार भ्रमजाल फैलाया कि इमरजेंसी जैसे हालात बना दिए गए हैं। आजकल कांग्रेस को नई बात नहीं सूझी है। पुरानी बात को ही वे नये ढंग से कह रहे हैं हालांकि उनके दोनों जुमले का अर्थ बहुत ही अलग-अलग है। जो इमरजेंसी को जानते हैं, उन्हें पुराने और नये जुमले का बहुत साफ-साफ फर्क मालूम है.(पृष्ठ-55). अतः उपरोक्त प्रश्न का उत्तर स्पष्ट है.
 पुनः, सद्य प्रकाशित पुस्तक इन्दिरा सरकार की घोषित इमरजेंसी की यथार्थता एवं वर्तमान सरकार के अघोषित आपातकाल सम्बन्धी वितंडा की व्यर्थता, दोनों का भेद स्पष्ट करती है. इसी तथ्य एवं विभ्रम, तर्क और कुतर्क के द्वन्द को स्पष्ट करते हुए लेखक आगे लिखते है, ‘इसका विवेक सम्मत उत्तर यह है कि लोकतंत्र की जड़ें गहरी हुई हैं। क्या आज के हालात इमरजेंसी जैसे हैं? इसका विवेक सम्मत उत्तर यह है कि लोकतंत्र की जड़ें गहरी हुई हैं। जो राजनीतिक रूप से मनोरोगी हैं, वे ही यह प्रलाप कर रहे हैं कि हालात इमरजेंसी जैसे हैं। सच यह है कि आज संविधान सम्मत शासन है और उसके प्रभाव को दुनिया भी स्वीकार कर रही है।'(पृष्ठ-88)
 इसलिए उपरोक्त लेखकीय दृष्टि ही वास्तव में इस किताब की प्रासंगिकता सिद्ध कर रही है. इसी अनुकूल एक ऐतिहासिक घटना उल्लेखनीय है. जब मिस्र के सैन्य अभियान से फ्रांस वापस लौटने पर तत्कालीन राष्ट्रीय अवस्था को देखकर नेपोलियन ने कहा था, ‘मै बिलकुल सही समय पर आया हूँ, ना ही कुछ पहले, ना ही कुछ देर बाद.’ ऐसे ही रामबहादुर राय की किताब भी बिलकुल ठीक से समय पर आई है, वर्तमान के राष्ट्रीय परिदृश्य और राजनैतिक वातावरण के सार्वजनिक पटल पर घोषित-अघोषित आपातकाल के द्वन्द की उत्तेजना में वास्तविक इमरजेंसी की व्यथा और अंतर्कथा के तथ्यात्मक बोध को लेकर. 
 अंततः, इतिहास को जीना और फिर उसकी अभिव्यक्ति इतिहास बोध कि सर्वांग जागरूकता का बायस बनता है. भारत का ‘जन’ जिस ‘तंत्र’ को सुरक्षित रखकर जनतंत्र को प्रतिष्ठित रखता है उसमें वैचारिकी निर्देशन हेतु सद्य पुस्तक जैसे शोध ग्रन्थ से उपजा इतिहास-बोध अति आवश्यक है. यही इस ग्रन्थ की महत्ता भी है और प्रासंगिकता भी.
अब चूंकि इतिहास-बोध को वर्तमान का आधार और भविष्य की कुंजी माना जाता है, इसलिए इस पुस्तक की भारत के जागरूक नागरिक समाज तक अबाध पहुंच आवश्यक है ताकि भारत के लोकतान्त्रिक भविष्य के लिए एक नागरिक और मतदाता के दोहरे स्वरुप में उनके द्वारा वर्तमान राजनीति-सामाजिक परिवेश में लोकतंत्र के संकट या संविधान की गरिमा के आरोप-प्रत्यारोप का निरपेक्ष मूल्यांकन संभव हो सके. 

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