चेतावनी जो सही हुई और देश विभाजित हो गया

रामबहादुर राय

संविधान सभा के पांचवे दिन पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव रखा। वे चाहते थे कि उसे संविधान सभा बिना बहस के पारित कर दे। वैसा हुआ नहीं। बहस हुई। जिसे डा. एम.आर. जयकर ने शुरू की। उनका पूरा नाम था-मुकुंद रामाराव जयकर। वे संविधान सभा में अनुभवी सदस्यों में से एक थे। मोती लाल नेहरू के साथ वे स्वराज पार्टी के नेताओं में अग्रणी थे। उन्हें बंबई लेजिस्लेटिव काउंसिल और सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेंबली का अनुभव था। वे फेडरल कोर्ट और प्रिवी काउंसिल में जज भी रहे थे।

ऐसे एम.आर जयकर ने लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव में एक संशोधन प्रस्तुत कर संविधान सभा को न केवल चकित किया अपितु अपने पैने तर्कों से एक लहर पैदा कर दी। उन पर अनेक सवाल खड़े किए गए थे। उन्हें सलाह दी गई थी कि संशोधन पेश न करें। उन पर आरोप लगाया गया था कि वे मुस्लिम लीग को संतुष्ट करने के लिए संशोधन लाए हैं। लेकिन इन बातों से अविचलित जयकर ने बताया कि वे इसलिए संशोधन लाए हैं जिससे संविधान सभा को विफल होने से बचा लिया जाए। उन्होंने दो बाते रखी। पहली का संबंध कानूनी और तकनीकी ज्यादा था। दूसरी बात में चेतावनी थी। उनका कहना था कि संविधान सभा को अपने प्रारंभिक चरण में बुनियादी प्रश्नों पर विचार करने का अधिकार नहीं है।

लक्ष्य संबंधी जो प्रस्ताव था वह संविधान की आधारशिला के बारे में ही था। उन्होंने लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव के विषयों को गिनाकर बताया कि ये सब संविधान की बुनियादी बातें हैं। जैसे गणतंत्र, राज्यों के अधिकार और अल्पसंख्यकों के अधिकार आदि। जयकर का मूल तर्क तो यह था कि केबिनेट मिशन ने जो अधिकार सीमा निर्धारित की है उसमें ही संविधान सभा को काम करना है। उस सीमा में रहकर संविधान के मूल सिद्धांतों का प्रस्ताव नहीं आ सकता। वे कह रहे थे कि यह संविधान सभा केबिनेट मिशन से निकली है। उसी से निर्धारित सीमा में ही संविधान सभा की सत्ता है। डा. जयकर के इतना कहने पर संविधान सभा में एक सनसनी फैल गई। अनेक वरिष्ठ सदस्यों ने उन्हें टोका। यह पूछा कि क्या वे प्रस्ताव पर विचार स्थगित करने का संशोधन पेश कर रहे हैं? तब डा. जयकर ने अपना संशोधन पढ़कर सुनाया। वह यह था-‘यह सभा अपना दृढ़ और गंभीर निश्चय घोषित करती है कि भारत के भावी शासन के लिए जो संविधान यह बनाएगी वह एक स्वतंत्र, गणतांत्रिक सत्ता-संपन्न राज्य का संविधान होगा।

परंतु ऐसा संविधान बनाने में मुस्लिम लीग और देशी रियासतों का सहयोग पाने के लिए संविधान सभा इस प्रश्नों पर विचार स्थगित रखती है।’ डा. जयकर के तर्क को समझने के लिए 1946 की परिस्थितियों और घटनाओं पर एक निगाह डालनी चाहिए। संविधान सभा के लिए चुनाव में कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने उत्साह से हिस्सा लिया। चुनाव के बाद एक विचित्र परिस्थिति ने जन्म लिया। साफ है कि उसके बीज उस समय की राजनीति में मौजूद थे। जो उग आए। केबिनेट मिशन ने एक व्यवस्था दी थी कि संविधान सभा के सदस्य को विभिन्न समूहों में बैठना होगा। समूह संबंधी जो व्यवस्था केबिनेट मिशन ने सुझाई थी उस पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग में मतभेद हो गए। ब्रिटिश सरकार ने मुस्लिम लीग का समर्थन किया। पहली बार ब्रिटिश सरकार ने 6 दिसंबर, 1946 को माना कि दो देश और दो संविधान सभाएं बन सकती हैं।

इसे ही मुस्लिम लीग ने अपनी पूंजी माना। उसके बल पर वह संविधान सभा में नहीं गई। संविधान सभा के सामने यही सबसे बड़ी पहेली थी कि क्या मुस्लिम लीग शामिल होगी! अगर मुस्लिम लीग संविधान सभा के बहिष्कार पर अड़ी रही तो क्या होगा? डा. एम.आर. जयकर ने इसे ही सुलझाने के लिए प्रस्ताव पेश किया था। उनका मूल तर्क यही था कि संविधान की बुनियादी बातों को तय करते समय कांग्रेस के अलावा मुस्लिम लीग और रियासतों के प्रतिनिधि भी होने चाहिए। जब तक वे नहीं आते तब तक लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव पर विचार स्थगित रखना चाहिए। यही वे कह रहे थे। उनके इस तर्क से सदन तो उद्वेलित था ही, संविधान सभा के अध्यक्ष भी उलझन में थे।

यह संविधान सभा अधूरी है। यह वास्तविकता है। इसे ही डा. जयकर संविधान सभा के गले उतारना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार के बयान का भी जिक्र किया। बताया कि उससे ‘अब स्थिति में जबरदस्त अंतर आ गया है।’ इस पर सरदार वल्लभ भाई पटेल अपने को रोक नहीं सके और बोल पड़े। पूछा कि ‘क्या माननीय सदस्य ब्रिटिश सम्राट की सरकार की नीति की व्याख्या कर रहे हैं?’ इसके बाद उन्होंने जो कहा वह संविधान सभा के लिए मार्गदर्शन बना। तभी तो पूरा सदन हर्षध्वनि से गूंज उठा।

सरदार पटेल ने कहा कि ‘यह सभा केबिनेट मिशन के 16 मई की घोषणा को मानती है। उसमें किसी परिवर्तन को हम मानने के लिए तैयार नहीं हैं।’सरदार पटेल के हस्तक्षेप से अप्रभावित डा. जयकर बोले कि ‘मैं तो केवल आपकी कठिनाइयों को बता रहा हूं।’ इसमें उन्होंने जोड़ा और कहा-‘मैं तो आपको यह बता रहा हूं कि मुस्लिम लीग को क्या-क्या (ब्रिटिश सरकार से) नई रियायतें मिली हैं।’ जयकर अपनी बात पर अड़े रहे कहते रहे कि ‘मेरा कथन बिल्कुल प्रासंगिक है। यदि माननीय सरदार पटेल यह समझते हैं कि कांग्रेस इन रियायतों को कभी मंजूर नहीं करेगी तो वे लोग शौक से ऐसा कर सकते हैं।’ एक सदस्य ने पूछा कि ‘मुस्लिम लीग का इंतजार हम कब तक करेंगे?’ वह क्षण सभा में उत्तेजना का था।

गोविंद वल्लभ पंत और एम.आर. जयकर में नोक-झोंक हुई। उसके बाद एम.आर. जयकर ने अपने भाषण के समापन अंश में जो चेतावनी दी वह सही निकली। तब उन्होंने जो कहा था वही घटित हुआ। भारत बटा और पाकिस्तान बना। इस आशंका को दूर करने के लिए उनकी पुरजोर अपील थी कि ‘यह जरूरी है कि मुस्लिम लीग को यहां (संविधान सभा में) बुलाने के लिए हम हर तरह से प्रयास करें। यह नहीं कि हम उनका यहां आना और कठिन बना दें।’ वे देख-समझ रहे थे कि कांग्रेस नेतृत्व जिस रास्ते चल रहा है वह मुस्लिम लीग को एक कोने में खड़ा कर देने जैसा है। जिससे मुस्लिम लीग संविधान सभा में नहीं आएगी। वह प्रतिक्रिया में संकट खड़ा करेगी।

उन्होंने एक मार्मिक बात भी कही। वह यह थी कि ‘महात्मा गांधी के अनुयायी बनने का हम दावा करते हैं। वह महिमामय महापुरूष आज दुखित होकर यहां से बहुत दूर एकाकी, दुर्बल गात, परिमित भोजन और परिमित निद्रा का कठोर व्रत लेकर सदभावना और सहयोग से मुसलमानों को अपनाने के लिए अथक परिश्रम कर रहा है। उस महापुरूष के आदर्श का हम यहां अनुसरण क्यों नहीं कर सकते?’ उनके भाषण का यह अंश बहुत रोचक और उनका परिचय कराता हुआ है-‘मेरे इस विचार से आप में से बहुतेरे सज्जन असहमत होंगे। मुझे चेतावनी दी गई थी आप अपने को बहुत अप्रिय बना रहे हैं। मैंने अपने मित्र को जवाब दिया बाल्यकाल से मुझे अप्रियता ही पारितोषिक स्वरूप मिली है। मैं बहुत अप्रियता के बीच गुजरा हूं।

जब मैंने स्वराज्य पार्टी स्थापित करने में मदद दी तो बदनाम हुआ। जब जवाबी सहयोगी पार्टी (रिसपांसिव कोआपरेशन पार्टी) चलाई तब मैं अप्रिय बना। जब गोलमेज कांफ्रेंस में शामिल होने लंदन गया तब अप्रिय बना। मैं उस समय अप्रिय बना जब सन् 1935 के कानून को पास कराने में मैंने हाथ बटाया, उस कानून को, जिसे मेरी राय में आपने विवेकहीनता से ठुकरा दिया था। अब उसी ठुकराये हुए कानून से आप चार महत्वपूर्ण चीजें ले रहे हैं। वह चार चीजें ये हैं, संघ, कमजोर केंद्र, स्वायत्तशासन प्राप्त प्रांत और प्रांतों में अवशिष्ट अधिकार। क्या मैं यह कहूं कि समय के साथ-साथ मेरी अप्रियताएं भी बढ़ गई हैं? इसलिए अब इस उम्र में और उतने अनुभवों के बाद मुझे अप्रियता का कोई डर नहीं है। मेरा यह कर्तव्य है कि मैं आपको बता दूं कि जो रास्ता आप पकड़ रहे हैं वह गलत है, गैर कानूनी है, असामयिक है, विनाशकारी है, संकटपूर्ण है; यह आपको मुसीबत में डाल देगा।

आपने मुझे अपने (कांग्रेस के) टिकट पर चुना है मैं बाध्य हूं कि आप से साफ-साफ कह दूं कि आगे संकट है, असफलता का संकट है, कलह का संकट है, जबरदस्त मतभेद का डर है। आपका फर्ज है कि आप इससे बचें।’ केबिनेट मिशन ने मुस्लिम लीग की मांगें नामंजूर कर दी थी। मुस्लिम लीग अलग संविधान सभा और पाकिस्तान की मांग कर रही थी। अपनी घोषणा में केबिनेट मिशन ने जो योजना प्रस्तुत की उसमें ये मांगें ठुकरा दी गई थी। लेकिन उसी योजना में मुस्लिम लीग की मांगें जिन सिद्धांतों पर थीं उसे केबिनेट मिशन ने स्वीकार कर लिया था। इस बारीक फर्क को डा. जयकर समझ रहे थे। संविधान सभा को समझाने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन कांग्रेस का नेतृत्व भ्रम में था। वह इस बात से ही गदगद था कि केबिनेट मिशन ने मुस्लिम लीग की मांगें अस्वीकार कर दी है। इसी भाव को सरदार पटेल ने उस दिन व्यक्त किया और कहा कि ‘हम संकट से पार हो गए और अब पाकिस्तान का सपना काफूर हो गया, अब वह नहीं बन सकेगा।’

रहस्य आज भी बना हुआ है कि आखिर क्यों और कैसे कांग्रेस केबिनेट मिशन योजना पर उत्साहित थी? क्यों वह भ्रम में थी? क्यों वह यह नहीं समझ पाई कि केबिनेट मिशन के प्रारूप में ही जहां संविधान सभा का प्रलोभन है वहीं भारत विभाजन के सूत्र भी हैं। विडंबना देखिए कि जहां कांग्रेस भ्रम में रही वहीं पाकिस्तान के निर्माता जिन्ना और उनके नेतृत्व में मुस्लिम लीग किसी भ्रम में नहीं पड़ी। वह अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठावान और समर्पित थी। मुस्लिम लीग स्पष्ट थी। तभी तो उसने संविधान सभा के लिए चुनाव लड़ने और अपने उम्मीदवारों को जिताने के बावजूद उसके बहिष्कार का निर्णय बिना देर लगाए शुरू में ही कर लिया। मुस्लिम लीग ने दूसरों को भ्रम में रखा। स्वयं तो उसकी दिशा तय थी।

 

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