द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान को एक शांतिवादी राष्ट्र के रूप में जाना गया। 1947 के संविधान के अनुच्छेद 9 के अंतर्गत जापान ने युद्ध न करने और स्थायी सेना न रखने का संकल्प लिया था। इसी कारण लंबे समय तक जापान की रक्षा नीति केवल आत्मरक्षा तक सीमित रही। परंतु 21वीं सदी में अंतरराष्ट्रीय राजनीति, क्षेत्रीय तनाव और बदलते सामरिक समीकरणों ने जापान को अपनी रक्षा नीति में बड़े बदलाव करने के लिए प्रेरित किया है। आज जापान रक्षा बजट बढ़ा रहा है, आधुनिक हथियार खरीद रहा है और सामरिक साझेदारियों को मजबूत कर रहा है। यह परिवर्तन केवल सैन्य विस्तार नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों की प्रतिक्रिया है।
जापान की रक्षा नीति में परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण चीन का तेजी से बढ़ता सैन्य और आर्थिक प्रभाव है। पिछले दो दशकों में चीन ने अपनी सेना को अत्याधुनिक बनाया है। दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में चीन की आक्रामक गतिविधियों ने जापान की चिंताएँ बढ़ाई हैं।
विशेष रूप से सेनकाकू द्वीप समूह, जिस पर जापान का नियंत्रण है लेकिन चीन भी दावा करता है, दोनों देशों के बीच तनाव का प्रमुख कारण बना हुआ है। चीन के नौसैनिक जहाजों और लड़ाकू विमानों की बढ़ती गतिविधियों ने जापान को अपनी सुरक्षा नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया। जापान को भय है कि यदि चीन की शक्ति इसी प्रकार बढ़ती रही तो एशिया में शक्ति संतुलन बदल सकता है।
उत्तर कोरिया भी जापान की सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती है। उत्तर कोरिया लगातार बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण करता रहा है, जिनमें से कई जापान के समुद्री क्षेत्र के ऊपर से गुजर चुकी हैं। इसके अलावा उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार कार्यक्रम ने पूरे पूर्वी एशिया में अस्थिरता पैदा कर दी है।
जापान के लिए यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है क्योंकि वह भौगोलिक रूप से उत्तर कोरिया के काफी निकट है। यदि किसी संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है तो जापान सीधे खतरे में आ सकता है। इसलिए जापान ने मिसाइल रक्षा प्रणाली को
मजबूत करने, आधुनिक रडार लगाने और अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाने का निर्णय लिया।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से जापान की सुरक्षा काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर रही है। अमेरिका ने जापान को सुरक्षा प्रदान की और बदले में जापान ने अमेरिकी सैन्य अड्डों को अपने देश में स्थान दिया। लेकिन बदलती वैश्विक राजनीति में अमेरिका ने जापान से अपेक्षा की कि वह अपनी सुरक्षा में अधिक सक्रिय भूमिका निभाए।
अमेरिका की “इंडो-पैसिफिक रणनीति” के अंतर्गत जापान को एक महत्वपूर्ण सहयोगी माना जाता है। चीन के प्रभाव को संतुलित करने के लिए अमेरिका चाहता है कि जापान अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाए। इसी कारण जापान ने रक्षा बजट में वृद्धि की और सामूहिक आत्मरक्षा के अधिकार को स्वीकार किया।
विश्व राजनीति अब बहुध्रुवीय होती जा रही है। रूस, चीन और अमेरिका के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने भी जापान को यह एहसास कराया कि केवल शांतिवादी नीति अपनाकर सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।रूस और चीन के बीच बढ़ती निकटता ने जापान की चिंता को और बढ़ा दिया है। जापान को आशंका है कि यदि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में कोई बड़ा संघर्ष होता है तो उसे अपनी सुरक्षा के लिए अधिक सक्षम होना पड़ेगा। इसलिए उसने आधुनिक हथियार प्रणाली, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष रक्षा जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाया है।
आज युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं लड़े जाते। साइबर हमले, ड्रोन तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधुनिक युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं। जापान तकनीकी रूप से अत्यंत विकसित देश है, इसलिए साइबर हमलों का खतरा भी अधिक है।चीन, रूस और उत्तर कोरिया जैसे देशों से संभावित साइबर खतरों को देखते हुए जापान ने साइबर सुरक्षा को अपनी रक्षा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। जापान अब डिजिटल सुरक्षा, उपग्रह प्रणाली और अंतरिक्ष रक्षा पर विशेष ध्यान दे रहा है।
जापान के संविधान का अनुच्छेद 9 लंबे समय तक उसकी सैन्य गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाता रहा। लेकिन 2014 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे की सरकार ने इसकी नई व्याख्या प्रस्तुत की। इसके अनुसार जापान “सामूहिक आत्मरक्षा” के अधिकार का उपयोग कर सकता है।
इसका अर्थ यह है कि यदि जापान का कोई सहयोगी देश हमला झेलता है और उससे जापान की सुरक्षा प्रभावित होती है, तो जापान सैन्य सहायता दे सकता है। यह जापान की रक्षा नीति में ऐतिहासिक परिवर्तन माना गया। इसके बाद जापान ने अपनी सेना को अधिक सक्रिय भूमिका देने की दिशा में कदम बढ़ाए।
हाल के वर्षों में जापान ने अपने रक्षा बजट में रिकॉर्ड वृद्धि की है। जापान अब अपनी जीडीपी का लगभग 2 प्रतिशत रक्षा क्षेत्र पर खर्च करने की दिशा में बढ़ रहा है। यह परिवर्तन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय तक जापान रक्षा खर्च को सीमित रखता था।
नई रक्षा नीति के अंतर्गत जापान लंबी दूरी की मिसाइलें, आधुनिक लड़ाकू विमान और नौसैनिक क्षमता विकसित कर रहा है। इसका उद्देश्य केवल आत्मरक्षा नहीं, बल्कि संभावित दुश्मनों को रोकने की क्षमता विकसित करना भी है।जापान ने केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि भारत, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों के साथ भी रक्षा सहयोग बढ़ाया है। “क्वाड” समूह में जापान की सक्रिय भूमिका इसका उदाहरण है। भारत-जापान संबंध भी सामरिक दृष्टि से मजबूत हुए हैं।जापान समझता है कि अकेले सुरक्षा सुनिश्चित करना कठिन है, इसलिए वह लोकतांत्रिक देशों के साथ मिलकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना चाहता है।
