आजाद हिंद फौज के सेनानी

शिवेंद्र सिंह लोकनायक जयप्रकाश नारायण–

  “शायद आपको मालूम हो, श्री सुभाषचंद्र बोस ने शोनान (सिंगापुर) में एक अस्थाई स्वतंत्र भारतीय सरकार कायम की है जिसे जापान की सरकार ने मंजूर कर लिया है. उन्होंने ‘आजाद हिंद फौज’ के नाम से एक सेना भी संगठित की है, जो दिन-दिन बढ़ती जा रही है. यह घटनाएँ हमारे लिए बहुत महत्व की हैं……. यह आसान है कि श्री सुभाष को देशद्रोही (Quisling) कह दिया जाए. जो लोग खुद देशद्रोही हैं, वे आज आसानी से उन्हें गालियाँ दे सकते हैं. लेकिन, राष्ट्रीय भारत उन्हें एक ज्वलंत देशभक्त के रूप में जानता है. जिसने हमेशा अपने को देश की आजादी की लड़ाई के अगली कतार में रखा है. यह सोचा भी नहीं जा सकता कि उनके ऐसा आदमी किसी भी हालत में अपने देश को बेचेगा.” ( जयप्रकाश नारायण एक जीवनी– श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी, पृष्ठ 133 )
  डॉ राममनोहर लोहिया–
“नेताजी सुभाषचंद्र हल्दीघाटी भावना के समाहार थे. हमारे राष्ट्रीय जीवन में आज ठीक इसी भावना की बहुत आवश्यकता है. उनका लक्ष्य स्पष्ट था, उन्होंने न हार, न कमजोरी में पलायन किया और सभी स्थितियों में वे काम करने की कोशिश करते रहे. हल्दीघाटी भावना अकसर जितनी चतुर होती है, उससे ज्यादा चतुर अगर बने तो कितनी अच्छी हो……हल्दीघाटी भावना दूरदृष्टि से काम लेती है और लगातार हार की परवाह नहीं करती. वह नहीं मानती कि वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ संसार का भी अंत हो जाएगा. वह नहीं मानती कि शक्ति और कल्याण का चरम मेल संकल्प के अधीन है और वह कितना पवित्र और विज्ञ और नि:स्वार्थ एवं अविज़ेय है.”  (भारत विभाजन के गुनहगार, पृष्ठ- 12,13)
 डॉ. चम्पक रमण पिल्लै–
  डॉ पिल्लै का जन्म सितम्बर, 1891 को त्रिवेंद्रम में हुआ था. उन्हें यूरोप में अध्ययन का अवसर मिला. इटली के भाषा विद्यालय में उन्होंने बारह भाषाएं सीखी. इसके पश्चात् उन्होंने फ्रांस, स्विट्जरलैंड और जर्मनी में उच्च अध्ययन किया. उन्होंने बर्लिन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और अभियांत्रिकी दोनो विषयों से डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की. शिक्षा समाप्त कर उन्होंने एक इंजीनियर के रूप में जर्मनी में कार्य कर बहुत ही प्रसिद्धि पाई. प्रथम विश्व युद्ध के समय वे ज्यूरिख में अंतरराष्ट्रीय भारत समर्थक समिति के अध्यक्ष थे. उन्होंने ज्यूरिख के कौँसल जनरल से 1914 में ब्रिटेन के विरुद्ध साहित्य प्रकाशित करने की सुविधा प्राप्त की. डॉ पिल्लै ने अनुभव किया कि जर्मनी की सहायता से भारत को ब्रिटिश दासता से मुक्ति दिलाई जा सकती है. जर्मनी में उन्होंने इंडियन नेशनल पार्टी की स्थापना की जिसने जर्मन विदेश मंत्रालय के सहयोग से कार्य करना प्रारंभ किया. इस दल में लाला हरदयाल, तारकनाथ दास, चंद्र कुमार चक्रवर्ती, हेडम्बलाल गुप्त, वीरेंद्र चट्टोपाध्याय और राजा महेंद्र प्रताप जैसे व्यक्तित्व शामिल थे. डॉ पिल्लै ने एक इंडियन नेशनल वालंटियर कोर की भी स्थापना की. महायुद्ध के समय वे जर्मन नौसेना में भर्ती हो गए और बम चलाने की विशेषज्ञता प्राप्त की. उन्होंने जर्मन सम्राट को इस बात के लिए राजी किया कि वे भारतीय समुद्र तटों की तरफ जर्मन पनडुब्बियां भेजें. इसी अनुरूप प्रसिद्ध जर्मन जंगी जहाज ‘एमडन’ के सहायक कमांडर के रूप में वह बंगाल की खाड़ी से  होते हुए दक्षिणी-पूर्वी तट पर पहुंच गए. उनकी योजना थी कि अंडमान पर हमला करके वीर सावरकर समेत अन्य भारतीय क्रांतिकारियों को मुक्त कराया जाए. लेकिन नियति के दुर्भाग्य से 11 नवंबर 1914 को उनकी पनडुब्बी एक हमले में नष्ट हो गई और डॉ. पिल्लै की योजना असफल हो गई. इस समय तक ब्रिटेन उनसे इतनी खौफजदा था कि डॉ पिल्लै की गिरफ्तारी के लिए ब्रिटिश-भारत सरकार की तरफ से एक लाख रूपये की पुरस्कार राशि घोषित की गई थी.
श्री पिल्लै अंग्रेजी सेना से बचकर वापस जर्मनी पहुंचे एवं पुनः अपने क्रांतिकारी उद्योग में संलग्न हो गए. दिसंबर 1915 को राजा महेंद्र प्रताप के अध्यक्षता में ज़ब काबुल में भारत की प्रथम अस्थायी राष्ट्रीय सरकार का गठन हुआ तब में डॉ. पिल्लै उसमें विदेश मंत्री का पद ग्रहण किया. वर्साय की संधि (1919 ई.)के समय डॉ. पिल्लै ने भारतीय प्रतिनिधि के रूप में इसका विरोध किया और भारतीय जनता की ओर से एक आठ सूत्री घोषणा-पत्र भी प्रकाशित किया जिसमें ब्रिटिश सरकार से भारत को तत्काल मुक्त कर देने की मांग की गई थी. युद्ध में सहयोग के फलस्वरुप जब जर्मन सरकार ने उन्हें पुरस्कृत करना चाहा तब डॉ. पिल्लै ने नम्रतापूर्वक इसे अस्वीकार कर दिया. प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के पश्चात् उन्होंने दमित-दलित राष्ट्रीयताओं के संगठन की स्थापना की और अफ्रीका तक गये जहां उनकी भेंट महात्मा गांधी से भी हुई.
सन 1924 में उन्हें उन्होंने लिपजिक के अंतरराष्ट्रीय मेले में भारत में तैयार की गई वस्तुओं की प्रदर्शनी लगवाई. यूरोप जाने वाले भारतीय नेता जैसे मोतीलाल नेहरू विट्ठल भाई पटेल आदि उनसे बराबर मिलते रहे. उनकी सबसे महत्वपूर्ण भेंट सन् 1933 में  सुभाषचंद्र बोस से वियना में हुई. इसी समय उन्होंने नेताजी को प्रथम विश्वयुद्ध की उस योजना से अवगत कराया था जिसमें यह व्यवस्था थी कि थाईलैंड के रास्ते बर्मा में भारतीय सैनिकों की टोलियां भेजी जाएंगी और भारत पर आक्रमण कर ब्रिटिश सेनाओं को खदेड़ दिया जाएगा. यह माना जाता है कि नेताजी ने जब आजाद हिंद फौज का नेतृत्व संभाला तब उन्होंने श्री चंपक पिल्लै की उसी योजना के अनुरूप अपनी सैन्य रणनीति का संचालन किया.
जर्मनी में जिस समय हिटलर का प्रादुर्भाव हुआ, तब भारत की स्वाधीनता के संबंध में हिटलर के विचारों के डॉ पिल्लै विरोधी हो गये. नाजी सत्ता के दृढ़ होने पर एक बार जब वह अपनी चिकित्सा के लिए इटली गए थे, तब  नाजियों ने बर्लिन में उनकी संपत्ति जब्त कर ली. बर्लिन लौटने पर इस सम्बन्ध में जाँच-पड़ताल के  दौरान एक नाजी दल के साथ झड़प में लगी चोटों के कारण मई 1934 को मात्र 46 वर्ष की आयु में इस महान क्रांतिकारी की मृत्यु हो गई.
डॉ. पिल्लै की दृढ़ इच्छा थी कि उनकी अस्थियां स्वतंत्र भारत के सैनिक पोत द्वारा भारत में लाकर उनके गृहनगर में ही विसर्जित की जाये. उनकी मृत्यु के 25 वर्ष पश्चात् सितंबर 1966 में उनकी अस्थियां, जिन्हें मुंबई के महापौर से भारतीय नौसेना अध्यक्ष एडमिरल नंदा ने गेटवे ऑफ इंडिया में ग्रहण की जिसे  आई.एन.एस. दिल्ली द्वारा कोचिन तत्पश्चात् त्रिवेंद्रम ले जाकर विधिवत अरब सागर में प्रवाहित किया गया. भारत के इस अदम्य देशभक्त का मातृभूमि के प्रति त्याग और समर्पण राष्ट्र की गौरव का विषय ह
  रास बिहारी बोस —–
 भारतीय क्रांतिकारियों के अग्रणी नेता रासबिहारी बोस का जन्म 1885 में चंद्रनगर (पांडिचेरी) में हुआ था. यहीं पर श्री चारूचंद्र राय के सुहृद-सम्मेलन नामक क्रांतिकारी समिति के वे सदस्य हो गए. उन्होंने फोर्ट विलियम कलकत्ता में कलर्क की नौकरी कर ली जहां उनका संपर्क प्रसिद्ध क्रांतिकारी जतीन्द्रनाथ मुखर्जी से हुआ. यहाँ से नौकरी छोड़कर वे अपने पिता के पास शिमला आ गये और देहरादून के वन विभाग में क्लर्क की नौकरी करने लगे. 1907-08 में उत्तर भारत में क्रांतिकारी गतिविधियां बढ़ने लगी. लाला हरदयाल के यूरोप चले जाने के बाद उनका कार्यभार जे.एम. चटर्जी ने संभाल लिया. चटर्जी की देहरादून में श्री रासबिहारी बोस से मुलाकात हुई. श्री बोस तब युगांतर आश्रम कलकत्ता के सदस्य हुआ करते थे. चटर्जी से मित्रता के बाद रासबिहारी ने सक्रिय क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेना प्रारंभ किया. अपने दक्ष योजना और कार्यकुशलता के कारण शीघ्र ही वे क्रांतिकारी दल के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए.
15 अक्टूबर 1912 को अपने द्वारा प्रशिक्षित क्रांतिकारियों बसंत कुमार विश्वास और भाई बालमुकुंद की सहायता से उन्होंने लॉर्ड हार्डिंग पर चांदनी चौक दिल्ली में बम फेंका. दुर्भाग्य से लॉर्ड हार्डिंग बच गया. रासबिहारी का क्रांतिकारी आंदोलन के प्रति समर्पण का भाव इतना गहरा था कि  आर्थिक समस्या से जूझते संगठन की सहायता के लिए उन्होंने साथियों से स्वयं को अंग्रेजों के हवाले करके. उनपर घोषित साढे सात हज़ार रुपए का ईनाम वसूलने की सलाह दी. लाला हरदयाल की सहायता से रासबिहारी ने समस्त उत्तर भारत में क्रांति की योजना बनाई जिसके लिए 21 फरवरी 1915 की तारीख निश्चित कर दी गई. इसके लिए उनके द्वारा भेजे गए  क्रांतिकारियों शचिन्द्रनाथ सान्याल आदि ने सेना. की छावनियों तक भी घुसपैठ कर उन्हें भी अपनी योजना में मिलाना प्रारंभ किया. इसका विस्तृत वर्णन  सान्याल की आत्मकथा ‘बंदी जीवन’ में मिलता है. परंतु इस योजना का भेद खुल जाने पर ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारियों के दमन का मार्ग अपना लिया. रासबिहारी बोस उसकी सूची में प्राथमिकता पर थे.
बहुत दिनों तक विभिन्न शहरों के क्रांतिकारी संगठनों ने अपनी सामर्थ्य अनुसार रासबिहारी को ब्रिटिश सरकार के दमन से बचाए रखा. लेकिन सरकार का दबाव बढ़ता जा रहा था. यह सुनिश्चित् था कि पकड़ जाने पर उन्हें फांसी की ही सजा होगी. अंततः क्रांतिकारियों ने सर्वसम्मति से 12 मई 1915 को उन्हें भारत से बाहर निकाल देने का निश्चय किया. जिसके बाद वे सिंगापुर और फिर टोक्यो पहुंचे.       जापान पहुंच कर भी उन्होंने वहां के प्रवासी भारतीय और भारत से सहानुभूति रखने वाले जापानियों के साथ मित्रता कर अपने क्रांतिकारी कार्य प्रारंभ किया. उनके प्रयत्न से जापान में भी भारतीय क्रांतिकारी दल संगठित हुए, जिनका कार्य भारत में अस्त्र शस्त्र भेजना था.  टोकियो में वे  पी.एन. टैगोर के नाम से रह रहे थे लेकिन फिर भी ब्रिटिश सरकार को यह पता चल चुका था कि यह शख्स रासबिहारी ही है. ब्रिटिश सरकार के दबाव में जापान की पुलिस ने रासबिहारी को तलब किया परंतु में भूमिगत हो गए. उसी दौरान ब्रिटेन और जापानी नौसेना के बीच होने वाली एक झड़प के बाद दोनों के सरकारों के संबंध खराब हो गए और रासबिहारी को पकड़ने के लिए निकाला गया वारंट जापान सरकार ने खारिज कर दिया. तब अप्रैल 1916 में रासबिहारी पुनः प्रकट हुए. उन्मुक्त कार्य करने के लिए रासबिहारी बोस ने जापान की नागरिकता लेने का प्रयास किया. उन्होंने जापानी भाषा सीखी और एक जापानी लड़की तोशिको से जुलाई, 1918 में विवाह कर लिया.
अगस्त 1926 को नागासाकी (जापान) में एशियावासियों के सम्मेलन में श्री बोस ने भाग लिया. जिसमें चीन, भारत, अफगानिस्तान, फिलीपींस वियतनाम और जापान के 142 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए. 1937 में चीन-जापान युद्ध के समय श्री बोस ने  इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की.  11 दिसंबर 1941 को उन्हीं के प्रयास से कौताबारू के ऐतिहासिक सम्मेलन में भारतीय राष्ट्रीय सेना की स्थापना हुई जो बाद में आजाद हिंद फौज कहलाई.
 
15 फरवरी 1942 को सिंगापुर पर जापानी कब्जे के पश्चात प्रधानमंत्री तोजो ने संसद में घोषणा की कि उनका देश भारत को स्वतंत्र कराने में भारतीयों की मदद करेगा. इस घोषणा के बाद मार्च 1942 को टोक्यो में भारतीयों का एक बड़ा सम्मेलन श्री बोस की अध्यक्षता में आयोजित हुआ जिसमें तय हुआ के देश को स्वतंत्र कराने के लिए संगठित सैन्य हमला किया जाए. इसके पश्चात जून 1942 को बैंकाक में एक सभा आयोजित की गई जिसमें मंचुकाओ, बर्मा, बारेन्यू, जावा, मलाया, थाईलैंड, जापान हांगकांग आदि के सैकड़ों भारतीय प्रतिनिधि शामिल हुए. निश्चय हुआ कि भारतीय स्वतंत्र संघ की स्थापना की जाएगी तथा इस संघ को आजाद हिंद फौज खड़ा करने का अधिकार प्रदान किया गया. इस सम्मेलन में 31 प्रस्ताव पारित हुए. जिसमें 31वां एवं सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव सुभाषचंद्र बोस को आजाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व स्वीकारनें  के लिए आमंत्रण करने के साथ ही जापान सरकार से प्रार्थना की गई कि वह सुभाष बाबू को बर्लिन से जापान तक पहुंचाने में सहायता करें.
जून से लेकर दिसंबर 1942 तक रासबिहारी बोस ने दक्षिण-पूर्व एशिया के विभिन्न देशों का दौरा कर भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के लिए सहानुभूति तथा सहायता इकट्ठी की. अप्रैल 1943 में वे सिंगापुर पहुंचे और सुभाष बाबू की आने की व्यवस्था की. सिंगापुर के 4 जुलाई 1943 के ऐतिहासिक सम्मेलन में उन्होंने संघ और सेना का नेतृत्व नेताजी को सौंप दिया. सुभाष बाबू ने अपने भाषण में रासबिहारी बोस की सेवाओं की प्रशंसा करते हुए उनसे परामर्शदाता के रूप में मार्गदर्शन करते रहने प्रार्थना की .
 स्वाधीनता संघर्ष हेतु अथक एवं अनवरत परिश्रम ने उनके स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित किया. वे कई प्रकार की बीमारियों से पीड़ित थे. पत्नी एवं पुत्र की असमय मृत्यु ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था. एक लंबे समय तक बीमारी से जूझने के बाद फरवरी 1945 को यह महान क्रांतिकारी जापान के एक अस्पताल में चिरनिद्रा में सो गया. जापान के सम्राट ने उन्हें ‘सेकंड अवार्ड ऑफ मेरिट के तमगे से नवाजा.
 आजाद हिंद फ़ौज के गुमनाम क्रांतिकारी—-
1- सत्येंद्रचंद्र बर्धन जो मलाया में पोस्ट एवं टेलीग्राफ कार्यालय में नौकरी किया करते थे, नेताजी के प्रभाव आजाद हिंद फ़ौज में भर्ती हो गये. उन्हें भारत में गुप्तचर टोली के साथ भेजा गया जिसे यहाँ की अंग्रेजी सरकार की सूचनाएं लीग को भेजनी थीं और जनता को क्रांति के लिए तैयार करना था. कठियावाड़ में गिरफ्तार होने के पश्चात् इमरजेंसी आर्डीनेन्स के तहत उन्हें  मुकदमा चलाकर 10 सितम्बर 1943 को फांसी पर लटका दिया गया.
2- ठाकुर मानुकुमार बासू ब्रिटिश-भारतीय सेना के सिपाही थे. आजाद हिंद फ़ौज के प्रभाव में मद्रास के समुंद्री तट पर चौथी सुरक्षा सेना ने विद्रोह कर दिया. इन्हीं विद्रोहियों में शामिल बासू को गिरफ्तार कर उनका कोर्ट मार्शल हुआ और फिर 27 सितंबर 1943 को उन्हें फांसी दे दी गई. उनके अतिरिक्त जिन अन्य आठ विद्रोही युवकों को फांसी दी गई उनमें श्री निरंजन बरुआ, श्री नंद कुमार डे, श्री सुनील कुमार मुकर्जी, श्री दुर्गा दास चौधरी, श्री फणी भूषण चक्रवर्ती, श्री नरेंद्र मोहन मुकर्जी एवं श्री कालीपाधा  एच. शामिल थे.
3- करनैल सिंह, जो कि फिरोजपुर पंजाब के रहने वाले थे. युवावस्था में मलाया चले गए. वहां उन्होंने एक ट्रैक्टर खरीदा जिसे वे स्वयं चलाते थे. सुभाष बाबू की पुकार पर उन्होंने अपना ट्रक आजाद हिंद सेना को समर्पित कर स्वयं फौज में भर्ती हो गए. एक सिपाही के रूप में उन्होंने बर्मा में इरावती के तट और पोपा पहाड़ियों पर ब्रिटिश सेना से मुठभेड़ में बहादुरी का परिचय दिया. जुलाई 1944 में वे शत्रु सेना द्वारा  शहीद हो गए.
4- टी.पी. कुमारन नायर जिनका जन्म कालीकट (केरल) में हुआ था. वे विशेष सरकारी पुलिस में नौकरी करते थे. 1931 में भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी से दुःखी होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी और मलाया चले गये. वहां से सिंगापुर पहुंचे और आई.एन.ए. में भर्ती हो गये. चूंकि वे पहले पुलिस विभाग में काम कर चुके थे, अतः उन्हें सेना के ख़ुफ़िया विभाग में नियुक्त किया गया. वे आजाद हिंद फ़ौज के जासूस हो गये और भारत भेजे गये. जासूसी के दौरान उन्हें इम्फाल में गिरफ्तार कर लिए गया और मद्रास कारागार में 7 जुलाई 1944 को फांसी दे दी गई.
5- अजैब सिंह का जन्म अमृतसर में हुआ था. वे जोहोर बहरू मलय प्रदेश में रहते थे. उच्च शिक्षित होने के कारण उन्हें आई.एन.ए. के जासूस के रूप में नियुक्त किया गया. उन्होंने कुशलता पूर्वक भारत से बर्मा के मध्य अपने कार्य का निर्वहन किया. अचानक एक दिन में अंग्रेजों द्वारा पकड़ लिए गये. सैनिक अदालत द्वारा देहली जेल में उन पर मुकदमा चलाकर 24 अगस्त 1944 को फांसी दे दी गई.
6- दुर्गा मल जिनका जन्म देहरादून के डोईवाला कस्बे में हुआ था. वे अंग्रेजी सेना की गोरखा राइफल्स के हवलदार थे. नेताजी सुभाष चंद्र से प्रभावित होकर और वह अंग्रेजी सेना से भागकर आजाद हिंद फौज में भर्ती हो गए. इंफाल मणिपुर कोहिमा के युद्ध में उन्होंने अपूर्व वीरता का प्रदर्शन किया. 27 मार्च 1944 को उन्हें गिरफ्तार कर अंग्रेजी सैन्य अदालत ने जासूसी के आरोप में 25 अगस्त 1944 को दिल्ली जेल में फांसी पर लटका दिया.
7-  जागे राम जो रोहतक, हरियाणा के रहने वाले थे और ब्रिटिश भारतीय सेना में हवलदार के पद पर थे. सितंबर 1942 को वे आजाद हिंद फौज में भर्ती हो गए. 28 अगस्त 1944 को एक युद्ध में उन्हें शहादत मिली.
8- डी.एस. देशपांडे जो जापान में रहते थे और  रासबिहारी बोस के विश्वासपात्र थे. आजाद हिंद फौज के समर्थन में उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का लगातार दौरा किया. ऐसे ही एक दौरे से  जापान लौटते समय अप्रैल 1945 में अमेरिकी सेना द्वारा उनके जहाज पर हमला कर डुबो दिए जाने के कारण उनकी मृत्यु हो गई.
9- फ़ौजा सिंह, पंजाब के रहने वाले थे एवं अंग्रेजी सेना के सिपाही थे. बर्मा में वह अंग्रेजों से बगावत कर नेताजी के साथ हो गये. अंग्रेजों द्वारा बाद में उन्हें गिरफ्तार कर दिल्ली लाया गया और और देशद्रोह का मुकदमा चलाकर फायरिंग इस कॉल्ड के सामने खड़ा कर 1945 में गोली मार दी गई.
10- केसरी चंद, जो चकराता उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे एवं अंग्रेजी सेना में सिपाही थे. आजाद हिंद फौज में भर्ती होकर उन्होंने इंफाल, कोहिमा और पोपो पहाड़ियों पर लड़ाई लड़ी. बाद में अंग्रेजों द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया तथा 1945 में दिल्ली में फांसी पर लटका दिया गया.  इनके अतिरिक्त श्री जगन्नाथ भोसले, अनिल चटर्जी, लोकनाथन आदि आजाद हिंद सेना से जुड़े अनेक गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी हैं जिन्हें राष्ट्र ने विस्मृत कर दिया है किंतु उनके त्याग और बलिदान का देश हमेशा ऋणी रहेगा
  भारत की प्रथम स्वतंत्र सरकार—–
 सन् 1915 में जर्मनी की सहायता से काबुल में प्रवासी भारतीय क्रांतिकरियों द्वारा आतंरिम सरकार की स्थापना की गई जिसके अध्यक्ष राजा महेन्द्र प्रताप थे. इसके मंत्रिमंडल के अन्य सदस्यों में डॉ. मथुरा सिंह, सी. पिल्लै, मुहम्मद बरकतुल्ला शमशेर सिंह आदि थे. इसके सदस्य ‘रेशमी रुमाल षड़यंत्र’ से जुड़े थे. इस सरकार ने कई देशों से संपर्क कर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए समर्थन और सहयोग जुटाने का प्रयास किया. 1919 में राजा महेन्द्र प्रताप के नेतृत्व में इस सरकार के प्रतिनिधिमंडल ने लेनिन से मास्को में मुलाक़ात की.
   महत्वपूर्ण तिथिक्रम —
1- जुलाई, 1940 को भारत सुरक्षा क़ानून के तहत सुभाषचंद्र बोस की गिरफ़्तारी एवं प्रेसीडेंसी जेल में बंदी 
2- 29 नवंबर, 1940 को भूख-हड़ताल प्रारंभ
3- 5 दिसंबर को जेल से रिहा कर ब्रिटिश सरकार द्वारा उनके एलगिन रोड़ स्थित आवास में नजरबंद
4- 17 जनवरी, 1941 को फरार होकर पेशावर पहुंचे
5- 28 मार्च, 1941 को नेताजी बर्लिन पहुंच.
6- दिसंबर, 1941 को जापान द्वारा उत्तरी मलाया पर कब्ज़ा किया गया. इसी दौरान पहली बटालियन के कप्तान मोहन सिंह और कई अफसरों के साथ बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक बंदी बनाये गये. वही एक भारतीय सिख साधु ज्ञानी प्रीतम सिंह और जापानी मेजर फूजीहारा से विमर्श के पश्चात् मोहन सिंह अंग्रेजों से लड़ने को तैयार हुए.
7- 15 जनवरी, 1942 कों जापान द्वारा सिंगापुर पर कब्जा, लगभग 40 हजार भारतीय सैनिक युद्धबंदी बने जिन्हें फूजीहारा द्वारा मोहन सिंह के सुपुर्द किया गया. इन्हीं युद्धबंदियों को लेकर मोहन सिंह द्वारा भारतीय राष्ट्रीय सेना (इंडियन नेशनल आर्मी) का गठन.
8- 28-29 मार्च, 1942 को रास बिहारी बोस की पहल पर राजनैतिक मामलों पर चर्चा हेतु टोकियो सम्मेलन का आयोजन. यही ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध भारतीयों की सेना के गठन का प्रस्ताव पास हुआ तथा जापान अधिकृत सभी एशियाई क्षेत्रों में प्रवासी भारतीयों के सहयोग से ‘इंडिया इंडपेंडेंस लीग’ की स्थापना
9- 23 जून, 1942 को रास बिहारी बोस की अध्यक्षता में बैंकाक सम्मेलन का आयोजन, जिसमें जापान, चीन, बर्मा, मलाया, बोर्निंयो, जावा, सुमात्रा, हांगकांग, फिलीपीन के लगभग सौ से अधिक प्रतिनिधि शामिल हुए. इस समय तक 25000 भारतीय सेना में भर्ती हो चुके थे. इन भारतीय सैनिकों के प्रतिनिधि भी सम्मेलन में उपस्थित थे. यहाँ भारतीय स्वाधीनता लीग की स्थापना के साथ ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस कों पूर्वी एशिया बुलाने का निश्चय हुआ.
10- अगस्त, 1942 तक आजाद हिंद सेना के सैनिकों की संख्या लगभग 40 हजार हो चुकी थी.
11– दिसंबर, 1942 में जापानी सैन्य अधिकारियों के साथ विवाद के पश्चात् निरंजन गिल और मोहन सिंह गिरफ्तार हुए. इसके पश्चात् उनके नेतृत्व में गठित भारतीय मुक्ति सेना भंग.
12-अप्रैल, 1943 में बिगड़ती स्थिति को सुधारने के लिए रास बिहारी बोस द्वारा सम्मेलन आयोजित. इसके निर्णयस्वरूप मुक्ति सेना के पुनर्गठन और उसकी सर्वोच्च कमान संभालने के लिए नेताजी को सिंगापुर बुलाने का निर्णय.
13- 2 जुलाई, 1943 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस सिंगापुर पहुंचे और आजाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व ग्रहण किया 
14- 4 जुलाई, 1943 को  रासबिहारी बोस द्वारा नेताजी कों विधिवत पूर्वी एशियाई आंदोलन का नेतृत्व सौंप दिया गया. नेताजी ‘इंडिया इंडिपेंडेंस लीग’ के प्रेसिडेंट घोषित किये गये.
15- 21 अक्टूबर, 1943 को भारत की स्वतंत्र सरकार की स्थापना की घोषणा, जिसे जर्मनी, जापान, इटली, चीन, कोरिया, मांचूको, आयरलैंड, बर्मा, फिलीपीन्स जैसे नौ देशों की मान्यता
16-  23 अक्टूबर, 1943 ई. को इस सरकार द्वारा मित्र राष्ट्र गठबंधन  के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी.
 17- 8 नवंबर, 1943 को जापान सेना के सहयोग से अंडमान और निकोबार द्वीप पर आजाद हिंद फ़ौज का अधिकार
18- दिसंबर, 1943 को नेताजी स्वयं यहाँ आये और अंडमान का नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का नाम स्वराज द्वीप रखा.
 19- 4 फरवरी, 1944 को आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजी सेना पर हमला प्रारंभ किया और उसे को पीछे धकेलती हुई और रामू, कोहिमा, पलेल, तिद्दीम इत्यादि भारतीय प्रदेशों तक पहुंच गई.
20- मार्च, 1944 को मणिपुर रियासत पर हमला
21- 7 अप्रैल, 1944 को इम्फाल में संघर्ष 
22- 22 सितंबर 1944 को सुभाष बाबू ने कोहिमा में शहीदी दिवस मनाया
23- 4 मई को जर्मनी एवं 10अगस्त तक जापान का आत्मसमर्पण, 14 अगस्त, 1945 तक विश्वयुद्ध की समाप्ति
24- अगस्त, 1945 में नेताजी बोस टोकियो रवाना एवं 18 अगस्त, 1945 को फोरमोसा द्वीप के पास एक विमान दुर्घटना में उनकी संदिग्ध मृत्यु की सूचना.

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