अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प बड़े व्यापारिक प्रतिनिधि मंडल के साथ चीन दौरे पर गए हुए हैं । अमेरिका को लगता है कि चीन अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर इरान अमेरिका संघर्ष को रुकवा सकता है ।ताइवान मुद्दे पर भी बात हो सकती है ,मगर चीन ने पहले ही कह दिया है कि ताइवान पर कोई बातचीत नहीं होगी यह चीन का आतंरिक मामला है ।
आज की वैश्विक राजनीति में यदि किसी मुद्दे को सबसे संवेदनशील और खतरनाक माना जा रहा है, तो वह है चीन, अमेरिका और ताइवान के बीच बढ़ता तनाव। यह संघर्ष केवल तीन देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और कूटनीति पर पड़ रहा है। एक ओर चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका ताइवान को सैन्य और राजनीतिक समर्थन देता रहा है। इसी कारण ताइवान आज विश्व राजनीति का सबसे बड़ा “हॉटस्पॉट” बन चुका है।
ताइवान पूर्वी एशिया में स्थित एक द्वीप है। वर्ष 1949 में चीन में गृहयुद्ध समाप्त होने के बाद माओत्से तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी ने मुख्य चीन पर कब्जा कर लिया। इसके बाद राष्ट्रवादी नेता च्यांग काई शेक अपनी सरकार के साथ ताइवान चले गए। तभी से चीन और ताइवान अलग-अलग प्रशासन के अंतर्गत काम कर रहे हैं।चीन की सरकार “वन चाइना पॉलिसी” के तहत ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानती है। चीन का कहना है कि ताइवान एक दिन मुख्य चीन में शामिल होगा, चाहे इसके लिए बल प्रयोग ही क्यों न करना पड़े। दूसरी ओर ताइवान स्वयं को एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक राष्ट्र की तरह संचालित करता है। उसकी अपनी सरकार, सेना, मुद्रा और संविधान है।
अमेरिका लंबे समय से ताइवान का समर्थक रहा है। हालांकि अमेरिका आधिकारिक रूप से ताइवान को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं देता, लेकिन वह ताइवान को हथियार और सुरक्षा सहायता प्रदान करता है। अमेरिका का मानना है कि ताइवान की सुरक्षा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक और सैन्य शक्ति को लेकर पहले से प्रतिस्पर्धा चल रही है। ऐसे में ताइवान का मुद्दा दोनों महाशक्तियों के बीच तनाव को और बढ़ा देता है। अमेरिका को डर है कि यदि चीन ताइवान पर कब्जा
कर लेता है, तो एशिया में उसकी शक्ति बहुत बढ़ जाएगी और अमेरिकी प्रभाव कम हो जाएगा।
ताइवान केवल राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक और सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। दुनिया में इस्तेमाल होने वाले अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर चिप्स का बड़ा हिस्सा ताइवान में बनता है। मोबाइल फोन, कंप्यूटर, कार और आधुनिक हथियारों में इन चिप्स का उपयोग होता है। यदि ताइवान में युद्ध होता है, तो पूरी दुनिया की तकनीकी और औद्योगिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।इसके अलावा ताइवान समुद्री व्यापार मार्गों के बीच स्थित है। दक्षिण चीन सागर और प्रशांत महासागर में नियंत्रण के लिए इसका महत्व बहुत अधिक है। इसलिए अमेरिका, जापान और अन्य पश्चिमी देश ताइवान की सुरक्षा को जरूरी मानते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में चीन ने ताइवान के आसपास सैन्य गतिविधियां काफी बढ़ा दी हैं। चीनी लड़ाकू विमान और युद्धपोत नियमित रूप से ताइवान के नजदीक दिखाई देते हैं। चीन कई बार बड़े सैन्य अभ्यास भी कर चुका है, जिससे ताइवान और अमेरिका की चिंता बढ़ गई है।दूसरी ओर अमेरिका भी अपने युद्धपोतों को ताइवान स्ट्रेट में भेजता रहता है। अमेरिका के कई वरिष्ठ नेता ताइवान का दौरा कर चुके हैं, जिसका चीन ने कड़ा विरोध किया। इन घटनाओं के कारण दोनों देशों के बीच टकराव का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
यदि चीन और ताइवान के बीच युद्ध होता है, तो इसका असर केवल एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। दुनिया की सप्लाई चेन टूट सकती है, व्यापार रुक सकता है और तेल तथा इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। वैश्विक शेयर बाजारों में भारी गिरावट आ सकती है।विशेषज्ञों का मानना है कि यह संघर्ष रूस-यूक्रेन युद्ध से भी अधिक गंभीर साबित हो सकता है, क्योंकि चीन विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और ताइवान तकनीकी उद्योग का केंद्र है।
भारत भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। चीन के साथ भारत के सीमा विवाद पहले से मौजूद हैं। यदि चीन और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ता है, तो भारत की सामरिक और आर्थिक नीतियों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग बढ़ा रहा है। क्वाड समूह के माध्यम से भारत क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। हालांकि भारत खुलकर किसी पक्ष का समर्थन करने से बचता है और संतुलित विदेश नीति अपनाने की कोशिश करता है।
विश्व के अधिकांश देश चाहते हैं कि चीन और ताइवान का विवाद शांतिपूर्ण तरीके से सुलझे। युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता। यदि यह संघर्ष बढ़ता है, तो करोड़ों लोगों का जीवन प्रभावित होगा और पूरी दुनिया आर्थिक संकट में फंस सकती है।संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन भी लगातार संवाद और कूटनीति पर जोर दे रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि बातचीत, समझौता और सहयोग ही इस संकट का स्थायी समाधान हो सकता है।
