संघ प्रमुख की अमेरिका-कनाडा यात्रा का मूल संदेश “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भारतीय अवधारणा

प्रज्ञा संस्थानराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की अमेरिका और कनाडा यात्रा को संघ के वैश्विक संपर्क अभियान की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष के अवसर पर भारत के साथ-साथ विश्व के विभिन्न देशों में रहने वाले भारतीय समुदाय से व्यापक संवाद स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। 25 अगस्त 2026 से शुरू हुई इस विदेश यात्रा में अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन शामिल हैं।

अमेरिका में मोहन भागवत ने भारतीय मूल के लोगों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के साथ संवाद किया। न्यूयॉर्क में आयोजित कार्यक्रमों के दौरान उन्होंने भारतीय संस्कृति के मूल संदेश विविधता में एकता और मानवता की एकता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने यह विचार सामने रखा कि भाषा, पूजा-पद्धति, परंपराएं और जीवन-शैली अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन मानवता सभी को जोड़ने वाली सबसे बड़ी शक्ति है। उनके संबोधनों में “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भारतीय अवधारणा प्रमुख रूप से दिखाई दी।

मोहन भागवत की इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य प्रवासी भारतीयों के साथ संबंधों को मजबूत करना भी है। आज अमेरिका और कनाडा में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग रहते हैं और वे शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, व्यापार तथा  राजनीति सहित अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। ऐसे में भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और अपनी जड़ों से उनका संबंध बनाए रखना आवश्यक माना जाता है। संघ प्रमुख का संदेश यही रहा कि व्यक्ति जिस देश में रहता है, वहां की प्रगति और समाज के कल्याण में योगदान देना उसका कर्तव्य है, साथ ही अपनी सांस्कृतिक पहचान और मानवीय मूल्यों को भी बनाए रखना चाहिए।

कनाडा यात्रा भी विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह मोहन भागवत की पहली कनाडा यात्रा बताई गई है। ग्रेटर टोरंटो क्षेत्र में आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में उन्होंने भारतीय संस्कृति की एकता में विविधता की परंपरा और विश्व-बंधुत्व के विचार को रेखांकित किया। कार्यक्रम में विभिन्न प्रांतों से बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी हुई। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि अलग-अलग भाषाएं, परंपराएं और पूजा-पद्धतियां विभाजन का कारण नहीं, बल्कि मानव समाज की विविधता और समृद्धि का प्रतीक होनी चाहिए।

हालांकि, इस यात्रा के दौरान कुछ स्थानों पर विरोध और राजनीतिक विवाद भी देखने को मिले। अमेरिका में कुछ संगठनों और व्यक्तियों ने मोहन भागवत तथा आरएसएस की विचारधारा की आलोचना की। दूसरी ओर, संघ और उसके समर्थकों का कहना है कि आरएसएस का उद्देश्य समाज सेवा, सांस्कृतिक जागरूकता और सामाजिक संगठन के माध्यम से समाज को मजबूत बनाना है। इस प्रकार यह यात्रा केवल सांस्कृतिक संवाद तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने संघ की अंतरराष्ट्रीय छवि और उसके विचारों पर चल रही बहस को भी वैश्विक स्तर पर सामने रखा।

वास्तव में, मोहन भागवत की अमेरिका-कनाडा यात्रा को भारतीय प्रवासी समुदाय के साथ संवाद स्थापित करने की एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा सकता है। आज के वैश्विक युग में भारत की शक्ति केवल उसकी आर्थिक और सैन्य प्रगति में नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, दर्शन और विश्व को जोड़ने वाली विचारधारा में भी निहित है। वसुधैव कुटुम्बकम , विविधता में एकता और मानवता जैसे विचार भारत की पहचान को विश्व मंच पर मजबूत बनाते हैं।

संघ प्रमुख की यह यात्रा भारत और विश्वभर में बसे भारतीय समुदाय के बीच सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने का अवसर प्रदान करती है। साथ ही, यह यात्रा यह संदेश भी देती है कि वैश्विक समाज में संवाद, सहिष्णुता, पारस्परिक सम्मान और मानवता की भावना ही स्थायी शांति तथा सहयोग का आधार बन सकती है।

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