सोशल मीडिया, वाद-विवाद-संवाद

राज आनंद की फेसबुक वाल से..

वामपंथी इतिहासकारों ने लिखा कि लालकिला मुगल शाहजहां ने १६३८ में बनवाया था…लेकिन ऑक्सफोर्ड संग्रहालय, लंदन मे १६२८ की पेटिंग है, जिसमें १६२८ में शाहजहां दीवाने आम लालकिले में विदेशी राजदूत से मुलाकात कर रहा है।

“१६३८” में बनवाना शुरु किया तो “१६२८” में शाहजहां लालकिले के अंदर कैसे?लालकिला १२वीं शताब्दी मे पृथ्वीराज का महल था, जिसे उनके नाना आंनद पाल सिंह तोमर ने बनवाया था, जिसका  कि नाम लालकोट था।

 

इम्तियाज अहमद की फेसबुक वाल से..

न्यायिक प्रणाली की स्थापना मिथक पर की जाती है कि न्यायाधीश कानून और योग्यता के आधार पर मामलों का निर्णय लेते हैं । सुप्रीम कोर्ट ने इस मिथक को विस्फोट किया है । यह स्पष्ट है कि न्यायाधीशों द्वारा दिए गए निर्णय उनकी इच्छाओं और उनके पूर्वाग्रहों और प्राथमिकताओं के आधार पर आधारित होते हैं. यह दुखद वास्तविकता है।

 

सुमंत बी की फेसबुक वाल से..

मेरी अपनी जानकारी में एकमात्र बंगाल कॉडर के आईएएस प्रमोद अग्रवाल रिटायरमेंट के बाद झांसी के अपने पुश्तेनी गांव में जाकर बसे। उन्होंने गंगा एक्शन प्लान के रीजनल डायरेक्टर रहते हुए मुझे कहा था, रिटायरमेंट बाद गांव में रहूंगा। शायद सन 1985 की बात थी। वो शायद बंगाल के चीफ सेक्रेटरी होकर रिटायर हुए।

 

बाकी आईएएस तो छोड़िए, हिन्दू पटवारी भी पलट कर आज अपने पूर्वजों का गांव नहीं देखता। यह दीगर है, गांव में ढहते मकानों पर उस अधिकारी हिन्दू के नाम की तख्तियां लटकी मिलती है।

कल जो कहानी मेरे पास पूर्वी बंगाल में मेरे परदादा की जमींदारी की है, वही कहानी कल आपकी संतानें भी आगे सुनाएंगी। तब शायद कोई सुनने वाला ना हो।

मुतमइन रहिए।

अल्लाह सब देख रहा है

चंद्रकांत पी सिंह की फेसबुक वाल से..

अगले कुछ सालों में देश ही नहीं पूरी दुनिया में जिहादियों के खिलाफ गृहयुद्ध शुरू हो जाने की संभावना है. 10 से 15 सालों के लिए चुनाव भी टाले जा सकते हैं क्योंकि चुनाव हुए तो वे गृहयुद्ध की आग में घी का काम करेंगे.
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जिस किसी देश में राष्ट्रवादी पार्टी की सरकार होगी, वहाँ का विपक्ष ही नहीं चाहेगा कि चुनाव हों क्योंकि चुनाव हुए तो विपक्ष कहीं पूरी तरह साफ़ न हो जाए .
भारत का विपक्ष तो चुनाव के ख़िलाफ़ मोर्चा तक खोल देगा क्योंकि ऐसा करना उसको जनता के करीब ले जाएगा और साथ ही उसके चीनी और पाक आका भी इससे खुश होंगे.
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लेकिन जब भी चुनाव होंगे तो इस देश का विपक्ष खुद को सत्ताधारी भाजपा से कहीं अधिक राष्ट्रवादी घोषित करेगा और मुसलमानों तथा ईसाइयों की पसंद भाजपा होगी न कि काँग्रेस-वामी गठजोड़. भाजपा में भी दोफाड़ हो जाएगा जिसका एक धड़ा प्रखर राष्ट्रवादियों का नेतृत्व संभालेगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो इसकी कमी को काँग्रेस का ही एक धड़ा पूरा करेगा क्योंकि काँग्रेस तबतक नेहरू-गाँधी परिवार से मुक्त हो चुकी होगी.
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इस बीच संघ या तो एक प्रखर राष्ट्रवादी संगठन में तब्दील हो चुका होगा (जिसके आसार कम हैं) या फिर इसके 20-40 वर्षीय स्वयंसेवक देश-विदेश में फैले संगठन-मुक्त राष्ट्रवादियों की सहायता से एक प्रखर एवं ओजस्वी संगठन खड़ा कर लेंगे. दोनों ही स्थितियों में संघ की भूमिका महत्वपूर्ण होगी लेकिन दूसरी स्थिति में आज के अधिकतर संघ-विरोधी वामीस्लामी संगठन संघ से हाथ मिलाकर नवजात प्रखर राष्ट्रवादी संगठन का जीजान से विरोध करेंगे.
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ज़ाहिर है संघ की तरफ़ से ज़मीनी विरोध का मोर्चा वामीस्लामी संगठन संभालेंगे और यह विरोध घर-घर, गाँव-गाँव, शहर-शहर तक फ़ैल जाएगा. एक ही परिवार में वैचारिक रूप में दोफाड़ हो जाएगा. 45-50 वर्ष से अधिक की उम्र वाले संघ के साथ होंगे तो 20 से 40 की उम्र वाले नवजात प्रखर राष्ट्रवादी संगठन के साथ होंगे जिसका ग्रामीण और कस्बाई इलाक़ों में अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव होगा. यही स्थिति काँग्रेस की भी होगी।
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यह सब तब होगा जब वैश्विक गृहयुद्ध ख़त्म हो चुका होगा जिसके बाद हर पार्टी कमोबेश राष्ट्रवादी पार्टी होगी। लेकिन इस बीच वैश्विक गृहयुद्ध में 35-40 करोड़ लोग मारे जा चुके होंगे जिसमें भारत का हिस्सा 5-7 करोड़ होगा। नये भारत के प्रेरणास्रोत होंगे नेताजी और सावरकर, इसके आध्यात्मिक गुरु होंगे महर्षि अरविंद. साथ ही ‘राष्ट्रपिता’ के संबोधन को संस्कृति-बाह्य माना जाएगा क्योंकि ‘राष्ट्रपिता’ की अवधारणा मूलतः ‘अब्राह्मिक’ है जो ‘भारतमाता’ की सभ्यतागत अवधारणा से मेल नहीं खाती।
@ प्रो सी पी सिंह
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