
भूमिगत आंदोलन का महानायक कौन था? क्या यह हम जानते हैं? आज थोड़े से ही लोग हैं, जो इस प्रश्न का सही उत्तर दे सकते हैं। ऐसे लोग वे हैं, जिन्हें इमरजेंसी का हीरो माना जाता है। वे वास्तव में थे भी। ऐसे कई नाम हैं। उन नामों की चर्चा यहां अनावश्यक है। उनमें जो लोग हैं, वे जब अपना अनुभव साझा करते हैं तो उस महानायक को याद करते हैं। उनका नाम लिए बगैर इमरजेंसी में भूमिगत आंदोलन की कहानी पूरी नहीं होती। वे थे, माधवराव कोंडोपंत मुले। वे महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में 7 नवंबर, 1912 को जन्मे थे। जब 11 साल के थे तो वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के संपर्क में आए। 1931 में आजीवन संघ कार्य करने का व्रत लिया।
सात साल बाद वे पंजाब प्रांत में संघ कार्य के लिए भेजे गए। यह 1940 की बात है। इमरजेंसी से दो साल पहले वे संघ के सर्वोच्च नेतृत्वद्वय में थे। बाला साहब देवरस सरसंघचालक थे और माधवराव मुले सरकार्यवाह। बाला साहब देवरस 30 जून, 1975 को नागपुर में बंदी बनाए गए। स्वाभाविक ही था कि इमरजेंसी में संघ का नेतृत्व माधवराव मुले ही करते। दत्तोपंत ठेंगड़ी ने लिखा है, ‘इमरजेंसी में संघ के स्वयंसेवकों की ओर से संघर्ष के सूत्र-संचालन का कार्य माधवराव मुले ने किया। उन दिनों उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो चुका था। तो भी सतत् कठोर परिश्रम करते हुए पूरी ऊर्जा से उन्होंने नेतृत्व का दायित्व संभाला। उस समय के कठोर परिश्रमों के कारण ही इमरजेंसी के बाद उनकी अकाल मृत्यु हुई।’ वे पूरी इमरजेंसी भूमिगत रहे। नेतृत्व का कौशल दिखाया। हालांकि स्वास्थ्य की उनकी अवस्था हमेशा उनकी परीक्षा ले रही थी। दत्तोपंत ठेंगड़ी बरबस याद करते हैं और उसे इन शब्दों में व्यक्त करते हैं, ‘संघर्षरत माधवराव को उतने कष्ट उठाते हुए देखकर किसी को भी आधुनिक इतिहास के दो वीर पुरुषों का स्मरण होना स्वाभाविक था। इसी तरह व्याधिग्रस्त रहते हुए भी बोलिविया के जंगल में गुरिल्ला युद्ध का नेतृत्व करते हुए शत्रु की गोली का शिकार बनने वाले कॉमरेड चे ग्वेरा की गिरफ्तारी के समय जिनके पास केवल आॅक्सीजन सिलेंडर मिला, ऐसे नक्सलवाद के प्रणेता कॉमरेड चारु मजूमदार।’
माधवराव मुले की शक्ति का स्रोत क्या था? क्या वे स्वयं इतने स्वस्थ, सक्षम और महाकाय थे कि सीधे इंदिरा गांधी की पूरी सत्ता को परास्त कर सकें? उन्होंने तानाशाही के तंत्र को चौंकाया। उसे छकाया। उसे भरमाया और अंतत: अपने
जाल में फंसा ही लिया। जिसके परिणाम स्वरूप लोकतंत्र के लिए संग्राम की जीत हुई। इसका उत्तर वह नहीं है, जो कोई भी दे सकता है। बिना एक पहेली को हल किए उत्तर पाना असंभव है। उत्तर पाना सरल है और सुलभ है। यह उसके लिए सुलभ है, जो यह जाने कि माधवराव मुले को ‘संघ के कार्यकर्ताओं की देवदुर्लभ टीम उपलब्ध हुई थी।’ उसे उन्होंने एक सूत्रता दी। तानाशाही को ध्वस्त करने के लिए देशव्यापी भूमिगत संगठन का एक ताना-बाना बनाया।
जब विपक्ष सदमे में था और उसे कुछ सूझ नहीं रहा था, वैसे समय में माधवराव मुले पूरी तरह सचेत थे। इसीलिए जिस दिन इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया, उसी दिन दिल्ली में एक बैठक हुई। वे दिल्ली में ही रह रहे थे। पुलिस की निगाह इतनी तेज नहीं थी कि वह उस स्थान को देख सके। उनके निवास पर संघ के चुने हुए तपस्वी एकत्र हुए। वह रात थी। 4 जुलाई, 1975 की तारीख थी। जो उस बातचीत में सम्मिलित हुए, वे असाधारण व्यक्ति थे। माधवराव मुले की ही तरह वे भी संघ के अनुभवी कर्णधार थे। वे थे- भाऊराव देवरस, प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया), बापूराव मोघे, सुंदरसिंह भंडारी, दत्तोपंत ठेंगड़ी और नानाजी देशमुख। माधवराव मुले सहित ये सप्तर्षि थे। इसी रूप में भविष्य इन्हें याद करेगा।
इमरजेंसी में वह पहली ऐसी घटना थी जिसे बार-बार स्मरण करने की जरूरत है। विपक्ष ने दस दिन पहले लोकनायक जयप्रकाश नारायण की उपस्थिति में लोक संघर्ष समिति बनाया था। यह नहीं सोचा था कि उसके गठन के कुछ घंटे बाद ही तानाशाही का पंजा उनके गले पर होगा। लोक संघर्ष समिति में वह दम भी नहीं था कि वह संघर्ष को चला सके। इसलिए भी संघ के शिखर पुरुषों का वह मिलन आज इस दृष्टि से ऐतिहासिक है कि संघर्ष का स्वत: संकल्प और उसकी सुव्यवस्थित योजना उसी में बनी। वहां जो बातचीत हुई, वह अलिखित थी। उसे दीवारों ने सुना। लेकिन वह दीवारों की सीमा में बंद नहीं रही। जमीन पर उसकी योजना उसी तरह से उतरी, जैसे भगीरथ प्रयास से गंगा उतरी थी। उसने पितरों को तारा था। इस मिलन से लोकतंत्र के लिए संग्राम की गंगा जो बही, वह सदमे में मूर्छित समाज में संघर्ष की चेतना प्रवाहित कर सकी।
उस मिलन में एक मंथन हुआ। वह विचार मंथन था। परिस्थितियों को समझने के लिए उन सप्तर्षियों ने विश्लेषण किया। उसका सार था कि ‘प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अत्यंत व्यक्तिवादी हैं। वे पद लोलुप हैं। लोकतंत्र के सिद्धांत में उनका विश्वास नहीं है। वे संविधान, लोकतंत्र, कांग्रेस पार्टी में निष्ठा नहीं रखती। इनका अपने लिए दुरूपयोग ही करती हैं। वे अपने पद को सबसे ज्यादा महत्व देती हैं। उसी कसौटी पर अपना निर्णय करती हैं। अपने पद की रक्षा उनका परम लक्ष्य होता है। उसी अनुरूप उनका आचरण होता है। देशहित की अपेक्षा निजी हित में ही उनका यकीन है। लोकतंत्र इस देश का मूल स्वभाव है। जब तक लोकतंत्र उनकी सत्ता को स्थिर रखने में साधक बना रहा, वे इसकी प्रहरी बनी रहीं और जैसे ही इस लोकतंत्र के एक प्रमुख स्तंभ-न्यायपालिका ने 12 जून को उनके विरुद्ध निर्णय दिया, वे लोकतंत्र को ही समाप्त करने पर तुल गईं।’ उस मंथन का यह पहला निष्कर्ष था।
दूसरा निष्कर्ष पहले से ही निकला। लेकिन अधिक महत्वपूर्ण था। वह क्या था? एक, इमरजेंसी की घोषणा से लोकतंत्र की हत्या हुई है। संविधान का अपमान हुआ है। तानाशाही कायम हो गई है। दो, यह सत्ता राजनीति तक सीमित विषय नहीं है। इसका संबंध देश में लोकतंत्र के जीवन और मरण से है। इसलिए सत्ता राजनीति से अलग रहने के स्वभाव को आत्मपरिवर्तित कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस संग्राम में लोकतंत्र बचाने के लिए सर्वस्व दांव पर लगा देगा। अगर संघ ने यह निर्णय न किया होता तो क्या ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’ जीती जा सकती थी? यह काल्पनिक प्रश्न नहीं है। जमाने की हकीकत इससे जुड़ी हुई है। बहुत लोग समझते हैं कि संघ इसलिए मैदान में कूदा और पूरी ताकत से कूदा, क्योंकि इदिरा गांधी ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया था। यह सरासर असत्य तो नहीं है, इसमें सत्यांश है। लेकिन पूरा सच भी नहीं है। संघ समझ चुका था कि उस पर प्रतिबंध लगेगा।
यही सबसे बड़ा कारण है कि माधवराव मुले के नेतृत्व में आम सहमति से यह निर्णय हुआ कि इस समय संघ पर प्रतिबंध मूल मुद्दा नहीं है। लोकतंत्र की पुन:स्थापना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। इस निर्णय में संघ नेतृत्व का अपना अनुभव भी सहायक था। वह अनुभव, जिसे संघ ने पहले प्रतिबंध में संघर्ष कर प्राप्त किया था। इमरजेंसी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संगठन तंत्र अपनी जगह बना हुआ था। गिरफ्तारियों से ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। इसे यह तथ्य समझाता है। उस समय संघ के कुल 1356 प्रचारक थे। इनमें से केवल 189 प्रचारक जेल में थे। 4 जुलाई, 1975 की रात में जो बैठक हुई, उसमें भूमिगत आंदोलन के लिए संघ कार्य की नई रचना बनाई गई। जिसमें पूरे देश के लिए छ: क्षेत्र बनाए गए। हर क्षेत्र का एक प्रमुख बनाया गया। दिल्ली में बापू राव मोघे प्रमुख थे। जिसमें दिल्ली से कश्मीर तक का क्षेत्र था। दूसरा केंद्र था, कानपुर। इसके प्रमुख प्रो. राजेंद्र सिंह थे। तीसरा केंद्र था, कोलकाता। भाऊराव देवरस इसके प्रमुख थे। चौथा केंद्र था, बेंगलुरू। यादव राव जोशी प्रमुख थे। पांचवां केंद्र था, मुंबई। इसके प्रमुख थे, लक्ष्मण राव इनामदार। छठवां केंद्र था, नागपुर। जिसके प्रमुख डॉ. आबा जी थत्ते थे।
संघ के लिए भूमिगत आंदोलन की रचना का प्रयोजन क्या था? यह इतिहास के पन्नों से जाना जा सकता है। सबसे बड़ा इतिहास का ग्रंथ है, महाभारत। उसे अगर धर्म राज्य की स्थापना का युद्ध कहें तो किसी भी तरह की अतिशयोक्ति नहीं मानी जाएगी। वैसे ही संघ ने इमरजेंसी को लोकतंत्र के लिए लड़ा जाने वाला महाभारत माना। उसके लिए पूरी रचना खड़ी की। दो तरह की बड़ी जिम्मेदारी संघ ने एक कदम बढ़ कर ले ली थी। पहली कि संघ के स्वयंसेवक और समर्थक संघर्ष में उतरें और मनोबल अपना ऊंचा रखें। दूसरी कि लोक संघर्ष समिति के नाम से ही कार्य हो। भूमिगत आंदोलन के लिए उसे संगठन का स्वरूप संघ ने दिया। शुरू में लोक संघर्ष समिति का नेतृत्व नानाजी देशमुख ने किया।
नानाजी देशमुख की गिरफ्तारी जब हो गई तो संघ के प्रयास से लोक संघर्ष समिति के नेतृत्व में परिवर्तन हुआ। भूमिगत लोक संघर्ष समिति के नए अध्यक्ष एस. एम. जोशी और नए सचिव रवींद्र वर्मा बनाए गए। एस. एम. जोशी के निजी सचिव थे, भोगी भाई। उनके कार्य की उस समय बड़ी सराहना हुई। लोक संघर्ष समिति का नेतृत्व बदलता रहा, क्योंकि अध्यक्ष और सचिव गिरफ्तार होते रहे। दत्तोपंत ठेंगड़ी पर लोक संघर्ष समिति के नेतृत्व और सूत्रधार का दायित्व जब आया तो उन्हें इंदिरा गांधी की पुलिस पूरे हथकंडे अपनाने के बावजूद गिरफ्तार नहीं कर सकी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संयोजन में भूमिगत आंदोलन दो प्रकार से छिड़ा। बड़ी संख्या में व्यक्तिगत सत्याग्रह के लिए लोग आगे आए। यह पहला प्रकार था। दूसरे में समूहगत सत्याग्रह हुए।
भूमिगत आंदोलन में पहली कतार संघ के जनसंगठनों के पदाधिकारियों की थी। दूसरी कतार में वे थे, जो लोक संघर्ष समिति के राजनीतिक दलों से जुड़े हुए थे। आंदोलन का संचालन भूमिगत रूप में कैसे हो? यह शुरू में बड़ा प्रश्न था। जो कुछ दिनों बाद ही संघ के प्रयास से हल कर लिया गया। उससे ही भूमिगत आंदोलन की प्रकृति निर्धारित हुई। अंग्रेजी काल में क्रांतिकारियों ने अपना एक भूमिगत तंत्र बनाया था। उसी तरह संघ को भूमिगत आंदोलन चलाने का एक अनुभव था। जब जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने झूठे आरोप के बहाने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया तो उसने प्रतिकार में एक भूमिगत आंदोलन सफलतापूर्वक चलाया। उस समय संघ के लिए परिस्थितियां अत्यंत जटिल थीं। सरकार और उसकी एजेंसियों ने संघ के बारे में झूठे प्रचार कर भारी भ्रम का निर्माण किया था। इस कारण प्रतिबंध के शुरूआती दिनों में संघ को लोहे के चने चबाने पड़े। अज्ञानवश और भ्रमवश साधारण नागरिक भी दुष्प्रचार के प्रभाव में उस समय संघ के विरोध में था।
उस विपरीत परिस्थिति में भी संघ नेतृत्व ने अपने स्वयंसेवकों के बल पर भूमिगत आंदोलन चलाया। उसके लिए एक कार्यपद्धति अपनाई। भूमिगत आंदोलन का एक शास्त्र विकसित किया। उसी का परिणाम था कि भारत सरकार को संघ से प्रतिबंध हटाना पड़ा। इमरजेंसी में संघ नेतृत्व ने अपनी उस सफलता को याद कर भूमिगत आंदोलन के उस तंत्र को पुन: जीवित कर लिया। अपने पुराने अनुभव का भरपूर उपयोग करने का उसे इमरजेंसी ने अवसर भी दे दिया। इमरजेंसी में संघ के लिए भूमिगत आंदोलन कोई नई बात नहीं थी। उसे अपनी स्मृति को जगाना मात्र था। ऐसा अनुभव और स्मृति, संपूर्ण क्रांति आंदोलन के किसी दूसरे संगठन, संस्था, समूह या दल के पास नहीं था। इमरजेंसी से पहले लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने नारा दिया था, ‘संपूर्ण क्रांति’। यह उनकी इच्छा थी। जिसे वे पूरे मन से घटित होते देखना चाहते थे। क्या यही वे लोग भी चाहते थे, जो उनके पीछे चल रहे थे? यह प्रश्न जितना महत्वपूर्ण तब था, उतना ही आज भी है और भविष्य में भी बना रहेगा। लोक संघर्ष समिति में शामिल राजनीतिक दल की प्रेरणा सत्ता प्राप्ति थी। वे उसी तरह जेपी को नेता मानते थे, जैसे जवाहरलाल नेहरू महात्मा गांधी को। यही दुनिया ने देखा भी। यह ऐतिहासिक समानांतरों का एक सबक है।
इमरजेंसी की घोषणा से लोक संघर्ष समिति की वास्तव में भ्रूण हत्या हो गई। जिससे भूमिगत आंदोलन के लिए एक विषम परिस्थिति पैदा हुई। वह ऐसी चुनौती थी, जिसे इंदिरा गांधी की सरकार ने अपने लिए वरदान माना था। अगर संघ न होता तो वह तानाशाही उसी रंग में रंग जाती, जिसमें इंदिरा गांधी रंगना चाहती थीं। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मूल प्रश्न को समझा। लोकतंत्र के लिए संघर्ष में लोक संघर्ष समिति और उससे बाहर के राजनीतिक दलों को सम्मिलित करने का राष्ट्रीय दायित्व निभाया। देश भर में संघ के स्वयंसेवक भूमिगत आंदोलन में रीढ़ की हड्डी बने। ऐसी विषम परिस्थिति में धैर्य और साहस जैसे गुणों की जरूरत होती है। जो स्वयंसेवकों में पहले से थी।
भूमिगत आंदोलन के लिए पहली जरूरत यह होती है कि अपनी बात लोगों के बीच में कैसे पहुंचाई जाए। इसके लिए जनशिक्षण आवश्यक होता है। जनशिक्षण और प्रचार में बड़ा अंतर है। प्रचार से वातावरण बनता है, लेकिन जनशिक्षण से आंदोलन का विस्तार होता है। उसमें नागरिक शामिल होने लगते हैं। इमरजेंसी में प्रचार और जनशिक्षण का अनोखा प्रयोग संघ ने चलाया और वह प्रभावी भी रहा। एक तरफ इंदिरा गांधी का शासन तंत्र संघ को कुचलने के लिए अत्याचार और अनाचार की हर सीमाएं तोड़ रहा था, तो दूसरी तरफ स्वयंसेवकों ने अपने साहस, धैर्य और निष्ठा से भूमिगत आंदोलन को बलवान बनाया। तभी तो इंदिरा गांधी को यह स्वीकार करना पड़ा कि ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दस प्रतिशत कार्यकर्ता भी पकड़े नहीं जा सके हैं। वे भूमिगत हो गए हैं।’ प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने बयान में कार्यकर्ताओं का उल्लेख किया। उन्हें यह भी पता था कि संघ नेतृत्व की पहली कतार के लोगों को भी उनकी सरकार पकड़ नहीं सकी।
भूमिगत आंदोलन की कमान संघ नेतृत्व के जिन लोगों ने संभाली, वे बड़े नाम हैं। आज यह सोचकर बहुत आश्चर्य होता है कि इंदिरा गांधी की पुलिस उन्हें खोजती रही और वे लोग पूरी इमरजेंसी में सक्रिय रहे। उन्होंने यात्राएं कीं। हर चरण में नई रणनीति को अंजाम दिया। वे थे, माधवराव मुले, बापूराव मोघे, भाऊराव देवरस, प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया), लक्ष्मणराव इनामदार, दत्तोपंत ठेंगड़ी, भानुप्रताप शुक्ल और अशोक सिंघल। ये कुछ नाम हैं। जिन्हें आज कौन नहीं जानता! वैसे इमरजेंसी के दौरान 1 लाख 25 हजार से अधिक लोगों को बंदी बनाया गया था। उनमें से 75 हजार से भी अधिक कार्यकर्ता संघ के स्वयंसेवक थे।
इमरजेंसी में मीडिया पर सरकार का पूरा नियंत्रण था। इससे यह हुआ कि सरकार जो चाहती थी, वही प्रसारित होता था और छपता भी था। उसके समानांतर भूमिगत आंदोलन की गतिविधियां चलती रहीं। वे गतिविधियां लोक संघर्ष समिति के बैनर से संघ के स्वयंसेवक चला रहे थे। जिसे अखिल भारतीय संपादक सम्मेलन के कुछ संपादक अपने-अपने स्तर पर समर्थन कर लोकतंत्र के लिए प्रयास करते रहे। ‘स्टेट्समैन’ और ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने भूमिगत आंदोलन को बल प्रदान किया। अनेक पत्रिकाएं आंदोलन की खबरों को छापती थीं और उन्हें भूमिगत कार्यकर्ता लोगों में बांटते थे। यह कार्य देशभर में हुआ। लेकिन जो गोपनीय सूचनाएं, पर्चे और पत्र उस दौरान बंटे, उसे लोगों ने प्रामाणिक माना। सरकार के प्रचार का प्रभाव जनमानस पर अपेक्षाकृत कम पड़ा।
लोकतंत्र के लिए संघर्ष के दो सुपरिणाम स्पष्टतया निकले। लोकतंत्र की वापसी हुई। दूसरा कि हिन्दू-मुस्लिम संबंधों में अपनापन आया। जेलों में मुसलमानों का संघ के नेताओं और कार्यकर्ताओं से मिलना हुआ। उनका अनुभव सुखद था। सरसंघचालक बाला साहब देवरस के संपर्क में जो मुसलमान आए, वे उनके प्रति आदरभाव रखने लगे। इससे एकता का एक वातावरण बना। मुस्लिम नेताओं ने स्वयं कई बार कहा कि संघ के बारे में जो सुनते थे, हमारा अनुभव उसके विपरीत है। संघ मुस्लिम विरोधी नहीं है। यह वातावरण देर तक उसी तरह नहीं टिका, जैसे जनता पार्टी की सरकार नहीं टिक पाई। जनता पार्टी के सत्ता लोलुप कुछ नेताओं ने अगर दोहरी सदस्यता का सवाल उठाकर सरकार को गिराया न होता, तो हिन्दू-मुस्लिम संबंधों का नया अध्याय बहुत पहले लिखा जा सका होता।
‘प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अत्यंत व्यक्तिवादी हैं। वे पद लोलुप हैं। लोकतंत्र के सिद्धांत में उनका विश्वास नहीं है। वे संविधान, लोकतंत्र, कांग्रेस पार्टी में निष्ठा नहीं रखती। इनका अपने लिए दुरूपयोग ही करती हैं। वे अपने पद को सबसे ज्यादा महत्व देती हैं।लोकतंत्र के लिए संघर्ष के दो सुपरिणाम स्पष्टतया निकले। लोकतंत्र की वापसी हुई। दूसरा कि हिन्दू-मुस्लिम संबंधों में अपनापन आया। जेलों में मुसलमानों का संघ के नेताओं और कार्यकर्ताओं से मिलना हुआ। उनका अनुभव सुखद था।
