भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जहाँ चुनावी राजनीति का समाज और अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ता है। लोकतंत्र में राजनीतिक दल जनता का समर्थन प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार के वादे करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में “लोकलुभावन राजनीति” और “मुफ्त योजनाओं” का दायरा तेजी से बढ़ा है। मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, महिलाओं के लिए मुफ्त बस और मेट्रो यात्रा, किसानों की ऋण माफी, मुफ्त राशन और महिलाओं को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण जैसी योजनाएँ अब राजनीतिक घोषणापत्रों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं।
इन योजनाओं का उद्देश्य गरीबों और कमजोर वर्गों को राहत देना होता है, लेकिन इनके बढ़ते विस्तार ने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर कई महत्वपूर्ण चुनौतियाँ भी उत्पन्न की हैं। आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह कल्याणकारी योजनाओं और दीर्घकालिक आर्थिक विकास के बीच संतुलन कैसे बनाए। बढ़ती महँगाई और बेरोजगारी के कारण आम जनता की सरकार से अपेक्षाएँ भी लगातार बढ़ रही हैं।
लोकलुभावन राजनीति का अर्थ ऐसी राजनीति से है जिसमें राजनीतिक दल जनता को तात्कालिक लाभ पहुँचाने वाले वादों के माध्यम से वोट प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। इसमें अल्पकालिक लोकप्रियता को दीर्घकालिक विकास से अधिक महत्व दिया जाता है। चुनावों के दौरान मुफ्त बिजली, गैस सिलेंडर, नकद सहायता, लैपटॉप, स्कूटी और अन्य सुविधाओं की घोषणाएँ इसी प्रवृत्ति का उदाहरण हैं।
देश के कई राज्यों में सीमित यूनिट तक बिजली मुफ्त या अत्यधिक रियायती दर पर दी जाती है। इन योजनाओं का उद्देश्य गरीब और मध्यम वर्ग को राहत प्रदान करना है, लेकिन इससे राज्य सरकारों के बजट पर भारी वित्तीय दबाव भी पड़ता है।
महिलाओं के लिए मुफ्त सार्वजनिक परिवहन योजना जनकल्याणकारी नीतियों का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। कई राज्यों में महिलाओं के लिए सरकारी बसों और सार्वजनिक परिवहन में मुफ्त यात्रा की सुविधा दी गई है। इन योजनाओं का
उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा, गतिशीलता और आर्थिक भागीदारी को बढ़ाना है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार ऐसी योजनाओं से महिलाओं की शिक्षा और रोजगार तक पहुँच आसान हुई है।
हालाँकि, इन योजनाओं का वित्तीय बोझ भी काफी अधिक होता है। सरकारों को परिवहन निगमों को सब्सिडी देनी पड़ती है, जिससे राज्य के बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यदि ऐसी योजनाओं का विस्तार लगातार बढ़ता रहा, तो सरकारों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना जैसे क्षेत्रों में पर्याप्त निवेश करना कठिन हो सकता है।
मुफ्त राशन योजना भी भारत की सबसे बड़ी कल्याणकारी योजनाओं में से एक है। कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू की गई खाद्य सुरक्षा योजनाओं के अंतर्गत वर्तमान में लगभग 80 करोड़ लोगों को रियायती अथवा मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है। इस योजना ने करोड़ों गरीब परिवारों को भूख और आर्थिक संकट से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विशेषकर महामारी और महँगाई के दौर में यह योजना गरीबों के लिए जीवनरक्षक साबित हुई।
लेकिन दूसरी ओर, इतनी बड़ी आबादी को लगातार खाद्यान्न सहायता उपलब्ध कराना सरकार पर भारी वित्तीय बोझ डालता है। खाद्य सब्सिडी पर सरकार को लाखों करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या लंबे समय तक इतनी बड़ी आबादी को मुफ्त सहायता देना आर्थिक रूप से टिकाऊ होगा।
इसी प्रकार प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण व्यवस्था भी भारत की कल्याणकारी नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। इसके माध्यम से सरकार सब्सिडी और अन्य लाभ सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में भेजती है। इसका उद्देश्य भ्रष्टाचार और बिचौलियों की भूमिका को कम करना है। गैस सब्सिडी, किसान सहायता, छात्रवृत्ति और पेंशन जैसी अनेक योजनाएँ प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के माध्यम से संचालित की जा रही हैं। इससे पारदर्शिता बढ़ी है और गरीबों तक सहायता पहुँचाने की प्रक्रिया अधिक सरल हुई है।
हालाँकि, लगातार नकद हस्तांतरण की बढ़ती प्रवृत्ति यह चिंता भी पैदा करती है कि कहीं समाज में सरकारी सहायता पर अत्यधिक निर्भरता न बढ़ जाए। अत्यधिक निर्भरता की प्रवृत्ति श्रम संस्कृति और उत्पादकता को प्रभावित कर सकती है।
लोकलुभावन राजनीति का सबसे बड़ा प्रभाव राज्य की वित्तीय स्थिति पर पड़ता है। सरकारों के पास सीमित संसाधन होते हैं, जबकि विकास के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, रोजगार और आधारभूत संरचना जैसे क्षेत्रों में भारी निवेश की आवश्यकता होती है। यदि बजट का बड़ा हिस्सा मुफ्त योजनाओं पर खर्च होगा, तो दीर्घकालिक आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है।
उदाहरण के लिए, भारत में अभी भी सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की स्थिति सुधारने की आवश्यकता है। आंगनवाड़ी, पोषण अभियान और स्वच्छता कार्यक्रमों में निरंतर निवेश जरूरी है। लेकिन जब राजनीतिक दल चुनावी लाभ के लिए मुफ्त योजनाओं पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं, तब सामाजिक क्षेत्रों की उपेक्षा होने का खतरा बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए सरकारों को मुफ्त सुविधाओं की बजाय रोजगार सृजन, कौशल विकास और उद्यमिता को अधिक प्राथमिकता देनी चाहिए। रोजगार व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाता है और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है। इसके विपरीत, केवल रियायत आधारित नीतियों पर अत्यधिक निर्भरता आर्थिक उत्पादकता को प्रभावित कर सकती है।
हालाँकि, यह भी सच है कि सभी मुफ्त योजनाएँ हानिकारक नहीं होतीं। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और महिला सशक्तिकरण से जुड़ी योजनाएँ मानव विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। इसलिए मुख्य समस्या मुफ्त योजनाओं के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उनके स्वरूप और संतुलन में है। ऐसी योजनाएँ जो लोगों को आत्मनिर्भर बनाती हैं, उन्हें कल्याणकारी निवेश माना जा सकता है, जबकि केवल चुनावी लाभ के लिए दी जाने वाली योजनाएँ दीर्घकालिक आर्थिक बोझ बन सकती हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें अल्पकालिक लोकलुभावन राजनीति की बजाय दीर्घकालिक आर्थिक विकास पर अधिक ध्यान दें। मुफ्त योजनाएँ केवल अस्थायी राहत प्रदान कर सकती हैं, लेकिन किसी भी देश की वास्तविक प्रगति रोजगार, कौशल विकास, शिक्षा और आत्मनिर्भरता से होती है। यदि सरकारें लगातार मुफ्त सुविधाओं पर निर्भर रहेंगी, तो इससे राज्यों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो सकती है और विकास परियोजनाओं पर निवेश कम हो सकता है।
भारत जैसे युवा देश के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता रोजगार के अवसर पैदा करना है। युवाओं को मुफ्त सुविधाओं की नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और स्थायी रोजगार की आवश्यकता है। रोजगार से व्यक्ति आत्मनिर्भर बनता है, उसकी आय बढ़ती है और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। इसके विपरीत, अत्यधिक मुफ्त योजनाएँ लोगों में सरकारी सहायता पर निर्भरता की भावना बढ़ा सकती हैं, जिससे श्रम संस्कृति और उत्पादकता प्रभावित होने का खतरा रहता है।
इसलिए कल्याणकारी योजनाओं और आर्थिक अनुशासन के बीच संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक है। ऐसी योजनाएँ जो लोगों को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाएँ, वही वास्तविक अर्थों में विकासोन्मुख नीतियाँ कहलाएँगी। भारत में मुफ्त योजनाओं का अनियंत्रित विस्तार केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि देश के दीर्घकालिक विकास, रोजगार सृजन, सामाजिक उत्तरदायित्व और सुशासन से जुड़ा अत्यंत गंभीर और चिंतनीय विषय बन गया है।
(द्वारा कमलाकांत पाठक )
