किसी भी लोकतांत्रिक देश में सामाजिक संगठनों, गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीओ), शैक्षणिक संस्थानों और विभिन्न ट्रस्टों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये संस्थाएँ शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण तथा सामाजिक विकास जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करती हैं। अनेक बार इन्हें विदेशों से आर्थिक सहायता भी प्राप्त होती है। हालांकि, जब विदेशी धन का उपयोग राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध, राजनीतिक गतिविधियों को प्रभावित करने अथवा सामाजिक अस्थिरता फैलाने के लिए होने की आशंका उत्पन्न होती है, तब सरकार के लिए ऐसे धन के प्रवाह को नियंत्रित करना आवश्यक हो जाता है। इसी उद्देश्य से भारत में विदेशी अंशदान को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाया गया है।
भारत में विदेशी फंडिंग के नियमन के लिए विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम लागू है।अभी संसद के मौजूदा सत्र में संसोधन के लिए पेश किया जाना है । इसका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशों से प्राप्त
धन का उपयोग केवल वैध और घोषित सामाजिक उद्देश्यों के लिए ही किया जाए तथा इससे देश की संप्रभुता, सुरक्षा, लोकतांत्रिक व्यवस्था और सार्वजनिक हित प्रभावित न हों। समय-समय पर इस कानून में संशोधन कर इसे अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाया गया है।
इस कानून के अंतर्गत कोई भी संस्था विदेशी सहायता प्राप्त करने से पहले सरकार से पंजीकरण या पूर्व अनुमति प्राप्त करती है। इसके अतिरिक्त संस्था को विदेशी धन के उपयोग का विस्तृत लेखा-जोखा रखना होता है तथा समय-समय पर सरकार को रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होती है। यदि कोई संस्था नियमों का उल्लंघन करती है, तो उसका पंजीकरण निलंबित या रद्द किया जा सकता है।
विदेशी फंडिंग पर नियंत्रण के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि कई देशों में बाहरी शक्तियाँ आर्थिक सहायता के माध्यम से किसी देश की नीतियों, चुनावी माहौल या सामाजिक वातावरण को प्रभावित करने का प्रयास कर सकती हैं। इसलिए सरकार का यह दायित्व है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता को ध्यान में रखते हुए ऐसे धन की निगरानी करे। इसके माध्यम से धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग), आतंकवाद के वित्तपोषण तथा अवैध गतिविधियों पर भी अंकुश लगाया जा सकता है।
हालांकि, इस कानून को लेकर कुछ आलोचनाएँ भी सामने आती रही हैं। अनेक सामाजिक संगठनों का मानना है कि अत्यधिक कठोर नियमों के कारण उनके विकास कार्य प्रभावित होते हैं। छोटे एनजीओ, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में कार्य करते हैं, उनके लिए विदेशी सहायता प्राप्त करना कठिन हो जाता है। कुछ विशेषज्ञों का यह भी मत है कि नियमन आवश्यक है, लेकिन यह इतना जटिल नहीं होना चाहिए कि समाजसेवी संस्थाओं का कार्य बाधित हो जाए।
सरकार का पक्ष है कि कानून का उद्देश्य किसी संस्था के कार्यों को रोकना नहीं, बल्कि वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। यदि कोई संगठन नियमों का पालन करते हुए विदेशी सहायता प्राप्त करता है और उसका उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के लिए करता है, तो उसे किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होनी चाहिए। इस प्रकार यह कानून वैध सामाजिक कार्यों और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जब आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़ी हुई हैं, तब विदेशी धन के स्रोत और उसके उपयोग की निगरानी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में यह आवश्यक है कि विदेशी सहायता का उपयोग राष्ट्र निर्माण, सामाजिक विकास और जनकल्याण के लिए हो, न कि किसी प्रकार की अवैध या राष्ट्रविरोधी गतिविधि के लिए।
