भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। देश की उद्योग व्यवस्था, परिवहन प्रणाली, कृषि, बिजली उत्पादन और दैनिक जीवन का बड़ा हिस्सा पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भर करता है। लेकिन भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है। ऐसी स्थिति में यदि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की आपूर्ति बाधित हो जाए या कीमतों में अचानक भारी वृद्धि हो जाए, तो देश की अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसी चुनौती से निपटने के लिए भारत ने 2004 में“रणनीतिक तेल भंडार” यानी एसपीआर व्यवस्था विकसित की है। यह भंडार किसी आपातकालीन स्थिति में देश के लिए सुरक्षा कवच का कार्य करता है।तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 2004 में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार प्रणाली स्थापित करने की मंजूरी दी थी।इससे पहले के सरकारों ने इसके बारे में सोचा भी नहीं था।
रणनीतिक तेल भंडार वह विशेष संग्रह होता है जिसमें सरकार बड़ी मात्रा में कच्चे तेल को सुरक्षित रखती है। इसे सामान्य व्यापारिक उपयोग के लिए नहीं रखा जाता, बल्कि युद्ध, प्राकृतिक आपदा, वैश्विक संकट, आपूर्ति बाधा या अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक तनाव जैसी परिस्थितियों में उपयोग किया जाता है। जब तेल की आपूर्ति रुक जाती है या कीमतें अत्यधिक बढ़ जाती हैं, तब यह भंडार देश की आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करता है।भारत में यह भंडार भूमिगत चट्टानी गुफाओं में बनाया गया है ताकि तेल को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके। यह व्यवस्था अत्यंत आधुनिक और सुरक्षित तकनीक पर आधारित है।
भारत जैसे विशाल और विकासशील देश के लिए रणनीतिक तेल भंडार कई कारणों से अत्यंत आवश्यक है।भारत अपनी तेल आवश्यकता का अधिकांश हिस्सा विदेशों से आयात करता है। यदि मध्य-पूर्व जैसे क्षेत्रों में युद्ध या तनाव उत्पन्न हो
जाए, तो तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। ऐसे समय में रणनीतिक भंडार देश को कुछ समय तक स्थिरता प्रदान करता है।
ऊर्जा किसी भी राष्ट्र की आर्थिक प्रगति का आधार होती है। यदि ईंधन की कमी हो जाए, तो परिवहन, उद्योग और बिजली उत्पादन ठप पड़ सकते हैं। रणनीतिक तेल भंडार ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करता है और देश को संकट के समय आत्मनिर्भर बनाता है।
कच्चे तेल की कीमतें वैश्विक घटनाओं से प्रभावित होती हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान ,इजराइल और अमेरिका युद्ध या ओपेक देशों के निर्णय या वैश्विक आर्थिक संकट के कारण तेल महंगा हो सकता है। रणनीतिक भंडार सरकार को सही समय पर तेल उपयोग करने की सुविधा देता है, जिससे कीमतों के प्रभाव को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
युद्ध या अंतरराष्ट्रीय संघर्ष की स्थिति में तेल की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। सेना, वायुसेना और नौसेना के संचालन के लिए ईंधन आवश्यक है। रणनीतिक तेल भंडार राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भारत ने अपने पहले चरण में तीन प्रमुख स्थानों पर रणनीतिक तेल भंडार बनाए हैं:विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश) मंगलुरु (कर्नाटक) और पाडुर (कर्नाटक)इन भंडारों की कुल क्षमता लगभग 5.33 मिलियन मीट्रिक टन है। यह भारत की लगभग 9–10 दिनों की तेल आवश्यकता को पूरा कर सकता है। इसके अलावा तेल कंपनियों के पास भी व्यावसायिक भंडार उपलब्ध रहता है।सरकार दूसरे चरण में चंडीखोल (ओडिशा) और पाडुर विस्तार परियोजना पर भी काम कर रही है। इससे भारत की भंडारण क्षमता और बढ़ेगी।
कोविड-19 महामारी के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतें बहुत कम हो गई थीं। भारत सरकार ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए सस्ते दामों पर बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदकर अपने रणनीतिक भंडार को भर लिया। इससे भविष्य के लिए ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हुई और आर्थिक लाभ भी मिला।यह उदाहरण दर्शाता है कि रणनीतिक तेल भंडार केवल संकट में उपयोगी नहीं होता, बल्कि आर्थिक रणनीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अमेरिका, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के पास विशाल रणनीतिक तेल भंडार हैं। अमेरिका के पास दुनिया का सबसे बड़ा रणनीतिक पेट्रोलियम रिज़र्व है। भारत अभी इस क्षेत्र में विकास की प्रक्रिया में है, लेकिन तेजी से अपनी क्षमता बढ़ा रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को कम से कम 60 से 90 दिनों की तेल आवश्यकता के बराबर भंडार तैयार करना चाहिए ताकि किसी बड़े वैश्विक संकट का सामना किया जा सके।
