भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी

प्रज्ञा संस्थानभारत और रूस के संबंध विश्व राजनीति में एक लंबे समय से चली आ रही और महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारी का उदाहरण हैं। दोनों देशों के बीच संबंध केवल कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष, परमाणु सहयोग, व्यापार, विज्ञान-प्रौद्योगिकी और शिक्षा जैसे अनेक क्षेत्रों तक विस्तृत हैं। बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भी भारत और रूस ने अपने पारंपरिक संबंधों को बनाए रखने का प्रयास किया है।

भारत-रूस संबंधों की मजबूत नींव शीतयुद्ध के दौर में पड़ी। वर्ष 1971 की भारत-सोवियत मैत्री संधि ने दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा दी। सोवियत संघ ने कठिन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में भारत के साथ सहयोग किया। सोवियत संघ के विघटन के बाद भी भारत और रूस ने अपने संबंधों को कमजोर नहीं होने दिया। वर्ष 2000 में दोनों देशों के बीच “रणनीतिक साझेदारी” की घोषणा हुई, जिसने द्विपक्षीय संबंधों को संस्थागत आधार प्रदान किया।

भारत-रूस साझेदारी का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। भारत लंबे समय से रूस से विभिन्न प्रकार के रक्षा उपकरण और सैन्य तकनीक प्राप्त करता रहा है। रूस ने भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।  ब्रह्मोस मिसाइल परियोजना दोनों देशों के सफल संयुक्त रक्षा सहयोग का प्रमुख उदाहरण है। इसके अलावा, दोनों देश सैन्य अभ्यास और रक्षा उत्पादन में भी सहयोग करते हैं। हाल के वर्षों में रक्षा क्षेत्र में संयुक्त उत्पादन और तकनीकी सहयोग पर अधिक जोर दिया जा रहा है।

में भी दोनों देशों के संबंध महत्वपूर्ण हैं। रूस भारत के लिए कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा संसाधनों का एक प्रमुख स्रोत बन गया है। ऊर्जा सहयोग ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में सहायता की है। इसके साथ ही परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में रूस की सहायता से तमिलनाडु के कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र का विकास हुआ, जो दोनों देशों के दीर्घकालिक सहयोग का उदाहरण है।

भारत और रूस के बीच सहयोग का लंबा इतिहास है। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के शुरुआती दौर में सोवियत संघ ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया था। आज दोनों देश अंतरिक्ष विज्ञान, उपग्रह तकनीक और उच्च प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं को आगे बढ़ा रहे हैं।

हालाँकि भारत-रूस संबंधों के सामने कुछ चुनौतियाँ भी हैं। रूस और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ते तनाव तथा यूक्रेन संघर्ष ने भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन की चुनौती पैदा की है। भारत ने किसी भी पक्ष के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय संवाद और कूटनीति पर जोर दिया है। साथ ही भारत अमेरिका, यूरोप, जापान और अन्य देशों के साथ भी अपने रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है। ऐसे में भारत की विदेश नीति का उद्देश्य रूस के साथ पुराने संबंधों को बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है।

दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाना, निवेश को प्रोत्साहित करना, भुगतान व्यवस्था को आसान बनाना, रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाना और नई तकनीकों में संयुक्त शोध महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसके अलावा, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, आतंकवाद से मुकाबला, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक शांति जैसे मुद्दों पर दोनों देशों का सहयोग उपयोगी हो सकता है।

भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी केवल ऐतिहासिक मित्रता पर आधारित संबंध नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के व्यावहारिक और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों से जुड़ी हुई है। बदलती विश्व व्यवस्था में भारत के लिए रूस के साथ संतुलित, स्वतंत्र और बहुआयामी संबंध बनाए रखना महत्वपूर्ण है। यदि दोनों देश नई परिस्थितियों के अनुरूप अपने सहयोग का विस्तार करते हैं, तो यह साझेदारी आने वाले समय में भी क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक बहुध्रुवीय व्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

 

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