आप अपने देश के उस हिस्से में जाएं जहां रेल के चरण अभी नहीं पहुंचे हैं, वहां छ: महीने फिरें और फिर दिल में देश का दर्द पैदा करें और स्वराज्य की बात करें

…रोम और यूनान आज अवनति के गढ्ढों में गिरे हुए हैं। फिर भी यूरोप के लोग उन्हीं की पुस्तकों से ज्ञान लेते हैं। वे सोचते हैं रोम यूनान ने जो गलतियां की उससे हम बच जाएंगे। जब उनकी ऐसी हीन दशा है, हिन्दुस्तान अपनी जगह अचल है। यही उसका गौरव है। हिन्दुस्तान पर यह दोष लगाया जा सकता है यहां के लोग इतने अज्ञानी और आलसी है कि उनसे कोई फेरफार कराया नहीं जा सकता है। पर यह आरोप हमारा गुण है, दोष नहीं। अनुभव की कसौटी पर जिस बात को हमने ठीक पाया उसमें फेरफार क्यों करें?

हमें अकल देने वाले तो बहुतेरे आया-जाया करते हैं, पर हिन्दुस्तान अडिग रहता है, यही उसकी खूबी है, यही उसका लंगर है। सभ्यता तो आचार – व्यवहार की वह रीति है  जिससे मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन करे। कर्तव्य – पालन और नीति-पालन, एक ही चीज है। नीत-पालन का अर्थ है, अपने मन और अपनी इंद्रियों को बस में करना। यह करते हुए अपने आप को पहचानते हैं। यही सुधार यानि सभ्यता है, जो कुछ इसके खिलाफ है वह कुधार यानि असभ्यता है।

सभ्यता की इस व्याख्या के अनुसार तो हिन्दुस्तान को किसी से कुछ सीखना नही रहता। वास्तव में है भी यही बात। हम देख चुके हैं कि मनुष्य की वृत्तियां चंचल हैं, उसका मन यहां से वहां भटकता रहता है। शरीर का यह हाल है कि उसे जितना दो उतना ही मांगता है। अधिक पाकर भी सुखी नही होता। भोग भोगने से भोग की इच्छे बढ जाती  है। इसी से हमारे पुरखों ने उसकी हद बांध दी। बहुत सोच विचार के बाद वह इस नतीजे पर पहुंचे कि सुख दुख का कारण हमारा मन है। अमीर न अमीर होने के कारण सुखी होता है, और गरीब गरीब होने की वजह से दुखी होता है। अक्सर अमीर दुखी और गरीब सुखी दिखाई देते हैं। फिर करोड़ों आदमियों को तो गरीब ही रहना चाहिए। यही देखकर हमारे बुजुर्गों ने हमें भोग की वासना से मुक्त करने की कोशिस की ।

हजारों साल पहले जिस हल से हमने काम किया उसी से आजतक हम काम चलाते रहे। हजारों बरस पहले जैसे झोपड़ों में हमने गुजर किया वैसे ही झोपडे अब तक बनाते रहे। पढ़ाई-लिखाई का भी वही हजारों बरस पहले का ढर्रा चलता रहा। सत्यानाशी प्रतियोगिता को हमने पास फटकने नही दिया, सब अपना-अपना धंधा करते और बंधे हिसाब से पैसा लेते रहे। नए-नए कलपुर्जे बनाना न आता हो सो बात नही थी पर हमारे पुरखों ने देखा कि मनुष्य यंत्रों के जाल में फंसा तो उसका गुलाम ही बन जाएगा, और नीति से हाथ धो बैठेगा। इसलिए उन्होने सोच विचार कर कहाकि तुम्हारे हांथ पांव से जितना हो सके उतना ही करो। हाथ पैर से काम लेने में ही सच्चा सुख और स्वाथ्य है।

उन्होंने यह भी सोचा कि बड़े बड़े शहर बसना बेकार का झंझट है। उनमें रहकर लोग सुखी न होंगे। वहां तो चोर डाकुओं के दल जुड़ेगे। पैसे वाले गरीबों को चूसेंगे, सफेद गलियां आबाद होंगी। अत: उन्होने छोटे छोटे गांवों से ही संतोष किया। उन्होंने देखा कि राजाओं और उनकी तलवारों से नीति धर्म का बल अधिक बलवान है, इसलिए उन्होंने नीतिवान पुरूषों, ऋषि,मुनियों और साधु संतों से राजा का दर्जा छोटा माना। जिस राष्ट्र का विधान ऐसे हो वह दूसरों को सिखाने का अधिकारी है, सीखने का नहीं।

हमारे यहां अदालतें थी, वकील थे, वैद् हकीम थे! पर सबको बंधे नियमों के अंदर रहना पड़ता था। सभी जानते हैं कि ये धंधे कुछ दूसरे धंधों से ऊंचे नहीं है। फिर वकील, वैद् आदि लोगों को लूटते नहीं थे, ये लोग तो जन समाज पर आश्रित थे, उसके मालिक बनकर नहीं रहते थे। न्याय प्राय: सच्चा ही होता था। अदालत न जाना ही सच्चा नियम था। उन्हें बहकाने के लिए दलाल भी नहीं थे। इन बुराइयों के दर्शन तो राजदरबारों और राजधानियों में ही होते थे। आम लोग तो दूसरे ढंग से रहते और अपनी खेती-किसानी करते थे। उनके लिए तो सच्चा स्वराज्य था।

यह चांडाल सभ्यता जहां नहीं पहुंची है वहां आज भी वही हिन्दुस्तान है। वहां आप अपने ढोंग-ढकोसलों की बात करें तो लोग आपकी हंसी उड़ाएंगे। उन पर न अंग्रेज राज्य करते हैं न आप कभी कर सकेंगे। जिन लोगों के नाम पर हम बातें करते हैं उन्हें हम नहीं पहचानते और वे हमें नही पहचानते। आप या जिनके दिल में देश का दर्द है उन्हें मै यह सलाह दूंगा कि पहले आप अपने देश के उस हिस्से में जाएं जहां रेल के चरण अभी नहीं पहुंचे हैं, वहां छ: महीने फिरें और फिर दिल में देश का दर्द पैदा करें और स्वराज्य की बात करें।

…हिन्द स्वराज्य से..

 

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