संघ पर प्रतिबंध

रामबहादुर राय

आखिरकार इंदिरा गांधी की सरकार ने 4 जुलाई, 1975 को राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा ही दिया। इस तारीख को अपनी डायरी में बिशन टंडन ने दर्ज किया है कि ‘सरकार यह अर्से से करना चाहती थी, पर कर नहीं पा रही थी। अब आपातकाल में यह सहज ही संभव हो गया।’ प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव रहते हुए बिशन टंडन ने अपनी दो खंडों की डायरी में समय-समय पर लिखा है कि इंदिरा गांधी का इरादा तो संघ पर प्रतिबंध लगाने का बहुत पहले से ही था। वे अवसरों की तलाश करती रहती थीं। पहली बार जनवरी में उन्होंने एक बहाना पाया। ललित नारायण मिश्र की हत्या के समय इंदिरा गांधी ने सोचा कि क्यों नहीं इस अवसर पर विरोधियों को लपेट लिया जाए।

इंदिरा गांधी की कथनी और करनी में जो भेद था, वह जमीन-आसमान का था। इसे बिशन टंडन ने अपनी डायरी में इस तरह लिखा है-‘आज सुबह समाचारपत्रों में प्रधानमंत्री के दो वक्तव्य पढ़े। एक में कहा गया है कि प्रजातंत्र में उनकी पूरी आस्था है और दूसरे में कि समाचारपत्रों की सेंसर इसलिए आवश्‍यक हो गई कि एक वर्ष से वे प्रधानमंत्री की काफी, कड़ी ऊलजलूल आलोचना कर रहे थे। वैसे समाचारपत्रों की स्वतंत्रता में भी उनकी पूरी आस्था है। इन वक्तव्यों पर किसी टिप्पणी की आवश्‍यकता नहीं है। प्रधानमंत्री के क्या विचार हैं, आजकल वे क्या और क्यों कर रही हैं, यह कौन नहीं जानता? उन्होंने तो केवल देश की एकता और विकास के लिए ही इतना साहसी कदम उठाया है। अपने पद की उन्हें कब चिंता हुई है। बचपन से देशवासियों की सेवा करती आ रही हैं और जब तक जीवित हैं, करती रहेंगी- यही तो उन्होंने आपातकाल की घोषणा करते हुए पिछले माह की 26 तारीख को कहा था। हां, देशवासियों को इतना अधिकार तो प्रधानमंत्री को देना ही होगा कि उनकी सेवा वे किस रूप में और किस माध्यम से करें।’

उस दौरान जब एक तरफ इंदिरा गांधी बड़े-बड़े दावे करके लोगों के दिल और दिमाग में अपनी लोकतांत्रिक छवि को निखारने में लगी हुई थीं, तभी उन्हें एक ऐसा पत्र मिला जिसकी वे कल्पना भी नहीं कर सकती थीं। उनके बड़े बेटे राजीव  गांधी उन दिनों पायलट थे। उनके एक मित्र अनूप सिंह ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र भेजा। वह पत्र बिशन टंडन को एच.वाई. शारदा प्रसाद ने दिखाया। वे उन दिनों प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मीडिया सलाहकार थे। अनूप सिंह का पत्र अंग्रेजी में था। उसका सारांश यह है-‘मैंने आपको यह पत्र अपने परम मित्र राजीव की मां के रूप में लिख रहा हूं। बहुत समय से मुझमें आपके लिए असीम श्रद्धा है। पर आपातकाल की घोषणा ने मुझे पूरी तरह झकझोर दिया है। मैं स्तंभित रह गया हूं। मुझे ऐसा लग रहा है कि आप देश को एक ऐसे पथ पर ले जा रही हैं जिससे भविष्‍य बिल्कुल अनिश्चित हो गया है। जिस पथ को आप देश की जनता के हित में समझती हैं, उसमें एक बहुत बड़ी कमी है-‘लिबर्टी’ की। दुर्भाग्य यह है कि संविधान का ही सहारा लेकर आपने संविधान की सबसे अमूल्य देन को नष्‍ट कर दिया। ‘लिबर्टी’ की परिभाषा करना कठिन होगा लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पृथक मत रखना, उसको खुले आम व्यक्त कर सकना आदि अधिकारों को निर्ममता से छीन लेना कहां तक उचित है। हम सबको सदा यह गर्व रहा है कि भारत संसार का सबसे बड़ा जनतंत्र है। यद्यपि इस राजनीतिक प्रणाली से उतना लाभ नहीं हुआ, जितनी आशा थी। पर यह तो आपने भी बार-बार कहा है कि प्रगति के साथ-साथ प्रगति के माध्यम का भी उतना ही महत्व है।’

इलाहाबाद हाईकोर्ट के 12 जून,1975 के फैसले का विश्‍लेषण करने के बाद अनूप सिंह ने अपने पत्र में लिखा-‘आपके सामने दो ही रास्ते थे। एक तो यह कि जब तक सुप्रीम कोर्ट से आपके मुकदमे में अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, आप पद त्याग दें। यदि निर्णय आपके पक्ष में हो तो आप फिर (यदि संभव हो) अपने पद पर वापस आ जाएं। यदि निर्णय आपके पक्ष में न हो तो आप सदा के लिए पद त्याग दें या मुख्य निर्वाचन आयुक्त से अपने पक्ष में निर्णय ले लें। दूसरा रास्ता था कि आप प्रजातंत्र की मर्यादा को ताक पर रखकर सब शक्ति अपने हाथ में ले लें और इसका उपयोग इस तरह करें कि कोई व्यक्ति न आपके विरुद्ध कुछ कह सके, न कर सके। दूसरा रास्ता अपनाकर आपने यह स्पष्ट कर दिया है कि आपने जो कुछ किया है वह केवल अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए, और केवल इसी कारण आपने राष्ट्र का मुख एक अनजानी राह पर मोड़ दिया। आपके इस काम से मुझे बहुत पीड़ा पहुंची है। कभी यदि आपकी इच्छा हो तो अपना दृश्टिकोण मुझे समझाने का कष्ट कीजिएगा।’

बिशन टंडन की डायरी में यह भी लिखा हुआ है कि ‘अवश्य ही प्रधानमंत्री को पत्र पसंद नहीं आया। जिस झल्लाहट के साथ अपने उत्तर का पहला पैरा लिखा है, उससे कल्पना की जा सकती है कि अनूप सिंह का पत्र पढ़कर प्रधानमंत्री तिलमिला उठी होंगीं।’ उन्होंने उत्तर में लिखा-‘आपके पत्र से स्पष्‍ट है कि आप एक ऐसे व्यक्ति की कल्पना तक नहीं कर सकते, जिसके निर्णय व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं किए जाते।’ इस अंश के बाद बिशन टंडन ने टिप्पणी की है कि यह वाक्य ही प्रधानमंत्री के अहंकार और कथनी-करनी के अंतर को उजागर करता है। बिशन टंडन की डायरी से यह तथ्य सामने आता है कि उन दिनों इंदिरा गांधी को ऐसे अनेक पत्र मिले। उनमें ही एक पत्र बेंगलुरू के कोदंड राव का था। वे उस समय के जाने-माने व्यक्ति थे। उन्होंने भी अपने पत्र में आपातकाल की घोषणा की आलोचना की और मांग की कि प्रधानमंत्री को त्यागपत्र दे देना चाहिए था। उन्होंने यह भी लिखा कि जब तक सुप्रीम कोर्ट में अंतिम निर्णय नहीं हो जाता जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बना देना चाहिए था। पर यह सब न करके प्रधानमंत्री ने अपने विरुद्ध एक कटुता का वातावरण बना दिया है। बिशन टंडन ने अपनी डायरी में लिखा कि इसका उत्तर भी प्रधानमंत्री ने उतना ही खोखला दिया है जितना अनूप सिंह के पत्र का था। वे भ्रष्‍टाचार की बात टाल गई हैं, बाकी सब बातों के लिए प्रतिपक्ष को दोषी ठहराया है।

बिशन टंडन की डायरी में एक बड़ा खुलासा है। 18 फरवरी, 1975 की तारीख है। इमरजेंसी से पहले संसद का बजट अधिवेशन उसी दिन शुरू हुआ था। पहले ही दिन मधु लिमए ने लोकसभा में काम रोको प्रस्ताव रखा। उस पर बहस हुई। वह समस्तीपुर की उस घटना से संबंधित था जिसमें ललित नारायण मिश्र एक विस्फोट में मारे गए थे। स्वाभाविक था कि मधु लिमए के काम रोको प्रस्ताव पर सरकार अपनी ओर से विशेष सर्तकता बरतती। सरकार ने वाद-विवाद को बढ़ाया नहीं। उसे साधारण वाद-विवाद बनाए रखा। लेकिन मधु लिमए ने अपने भाषण में एक ऐसी बात कह दी जो सीधे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को निशाने पर लेती थी। उन्होंने एक रहस्य उजागर कर दिया। वह यह कि उस दुर्घटना को इंदिरा गांधी ने राजनीतिक रंग दिया। बिशन टंडन ने अपनी डायरी में लिखा है कि ‘आज पहली बार श्‍यामनंदन मिश्र ने अच्छा भाषण किया। गृहमंत्री का उत्तर सूक्ष्म और ऊंचे स्तर का था। आवश्‍यकता से अधिक उन्होंने कुछ नहीं कहा। दोपहर में प्रधानमंत्री ने मुझे बुलाकर पूछा था कि गृहमंत्री के भाषण का प्रारूप मैंने देखा है या नहीं। मैंने उन्हें बताया कि वे तैयार वक्तव्य नहीं देंगे, उसी समय भाषण करेंगे। गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने उन्हें ब्रीफ किया है। फिर भी प्रधानमंत्री ने मुझसे कहा कि मैं भी उन्हें ब्रीफ कर दूं और कहूं कि ज्यादा वाद-विवाद में वे न पड़ें।’

मधु लिमए ने इंदिरा गांधी की रणनीति जो थी उसे उजागर करते हुए आरोप लगाया कि वे राजनीतिक लाभ लेना चाहती थीं लेकिन उसमें जब विफल रहीं तब ललित नारायण मिश्र की हत्या की जांच के लिए एक आयोग बनाया। बिशन टंडन ने उस रणनीति के बारे में इस तरह से लिखा है- ‘दुर्घटना के तुरंत बाद कांग्रेस ने यह प्रचार आरंभ किया कि ललित नारायण मिश्र की हत्या में विपक्षी दलों का हाथ है।’लेकिन उस प्रचार का कोई प्रभाव जब नहीं पड़ा तो कांग्रेस ने अपनी रणनीति बदली। बिशन टंडन ने अपनी डायरी में लिखा है कि ‘यदि जनता इस पर विश्‍वास कर लेती तो राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित अन्य दलों पर रोक लगती, दमन-नीति चालू की जाती।’ बिशन टंडन की अपनी डायरी में यह लाइन पूरी कहानी को बताती है, ‘मधु लिमए को अंदरूनी बात मालूम हो गई थी।’ उनकी डायरी के इस अंश से अंदरुनी कहानी का खुलासा होता है, ‘पूरे जनवरी महीने में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी यही जांच कराती रहीं कि राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मदरलैंड के विरुद्ध कितनी कड़ी कार्यवाही की जाए। बाद में यह विचार उन्हें उस समय छोड़ना पड़ा।’

लेकिन इंमरजेंसी ने इंदिरा गांधी को अवसर दिया। वे जो सोचतीं थीं वह कर सकी। राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया। बिशन टंडन ने लिखा है कि ‘सारा प्रतिपक्ष जेल में है व प्रेस पूरी तरह सरकार की जकड़ में है। अवश्‍य ही प्रधानमंत्री बुरी तरह डरी हुई हैं और वे डर के ही कारण बहुत कुछ करती हैं।’ राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इंदिरा गांधी के इरादे का अंदाज था। तभी तो 16 जून, 1975 के रोहतक संघ शिक्षा वर्ग में बाला साहब देवरस ने स्वयंसेवकों से कहा कि ‘1949 की जुलाई में कांग्रेसी सरकार ने तब संघ पर प्रतिबंध हटाया। लेकिन उसका इरादा यह कायम रहा कि कानून के पहरे में संघ को सदा के लिए समाप्त करना है। वही इरादा इंदिरा गांधी के मन में बना हुआ है। शुरू में हमने इस पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन जनवरी माह से समय-समय पर मैं अपना विचार प्रकट करता रहा हूं। संघ पर प्रतिबंध का खतरा है। लेकिन हजार-दो हजार स्वयंसेवक अगर बंदी बना लिए जाते हैं तो भी संघ का कार्य नहीं रूकेगा। संघ प्रतिबंध से नहीं डरता। प्रतिबंध की परवाह न करते हुए हम अपना कार्य निर्भय होकर करेंगे।’

इमरजेंसी की घोषणा के दिन बाला साहब देवरस संघ शिक्षा वर्गों के प्रवास पर थे। वे नागपुर लौट रहे थे। उन्हें सटीक जानकारी थी कि वे नागपुर रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिए जाएंगे। इसलिए नागपुर के कुछ प्रमुख संघ कार्यकर्ता बाला साहब देवरस से कुछ स्टेशन पहले ही जाकर ट्रेन में मिले। उन्होंने उन लोगों से कहा कि ‘चिंता की कोई बात नहीं है। इमरजेंसी में भूमिगत आंदोलन चलाने की योजना बनी हुई है। मेरी गिरफ्तारी से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। सरकार्यवाह माधव राव मूले के निर्देश पर देशभर में सैकड़ों प्रचारक और हजारों कार्यकर्ता भूमिगत रहकर कार्य करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि मुझे यह पता है कि ट्रेन से स्टेशन पर उतरते ही गिरफ्तार किया जाएगा।’ ऐसा ही हुआ भी। यह 30 जून, 1975 की बात है। बाला साहब देवरस नागपुर रेलवे स्टेशन पर जैसे ही उतरे कि पुलिस ने उनको अपने घेरे में ले लिया। वे मीसा में बंदी बनाए गए। उन्हें पूणे के यरवदा जेल में रखा गया।

बाला साहब देवरस ने जो कहा वैसा ही भूमिगत आंदोलन सफलता पूर्वक चलाया गया। बिशन टंडन ने 21 नंवबर, 1975 की अपनी डायरी में लिखा है कि ‘इस महीने की 14 तारीख को छोटा-मोटा आंदोलन तो हुआ है। अब तक 4140 सत्याग्रही जेल जा चुके हैं। यह समाचार भी पत्रों में नहीं छप रहा है। 18 तारीख को 39,552 लोग जेल में थे। आपातकाल शुरू होने से अब तक 87,022 व्यक्ति गिरफ्तार किए गए हैं, जिनमें से 47,470 लोगों को छोड़ दिया गया है। इधर जनसंघ और राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी में तेजी आई है।’

इमरजेंसी के दौरान नागरिकों को यातना दी जा रही थी। इसे सब जानते हैं। लेकिन इंदिरा गांधी के कोपभाजन के शिकार वे लोग भी हो रहे थे जो जज थे और बेदाग थे। ऐसा ही एक रोचक वर्णन बिशन टंडन की डायरी में दर्ज है। 20 फरवरी, 1976 की तारीख है। उन्होंने लिखा है कि ‘आज राजेंद्रनाथ अग्रवाल के केस की पत्रावली देखी। मन को क्लेश हुआ। हम सब कितने गिरते जा रहे हैं। चरित्र के पतन का इससे बड़ा उदाहरण कम मिलेगा।’ उन्होंने अपनी डायरी में लिखा कि ‘पूरे तथ्य इस प्रकार हैं। राजेंद्रनाथ अग्रवाल दिल्ली हाई कोर्ट के सबसे वरिष्‍ठ अतिरिक्त जज हैं। वह दिल्ली के जिला जज भी रह चुके हैं। 1972 में अतिरिक्त जज हुए। पिछले अगस्त में एक स्थाई जज का स्थान रिक्त हुआ। दिल्ली के मुख्य न्यायाधीश ने विधि मंत्री को 22 सितंबर को सिफारिश भेजी कि अग्रवाल को स्थाई जज बना दिया जाए। न्याय विभाग ने 27 सितंबर को पत्रावली भारत के मुख्य न्यायाधीश को भेजी। उन्होंने भी इस सिफारिश का समर्थन किया। उनके पास से पत्रावली 27 अक्टूबर को वापस आई।’

बिशन टंडन की डायरी में विस्तार से वर्णन है कि राजेंद्रनाथ अग्रवाल को जज न बनाने का निर्देश इंदिरा गांधी ने कानून मंत्री को दिया। इसलिए खुफिया ब्यूरो के निदेशक से एक रिपोर्ट मंगाई गई कि राजेंद्रनाथ अग्रवाल का 1950 और 1960 के दशक में राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंध था। वे दिल्ली के नया बाजार शाखा में जाते थे। जबकि सच्चाई दूसरी थी। राजेंद्रनाथ अग्रवाल भारत विभाजन के समय लाहौर से भारत आए। वे शिमला हाईकोर्ट में वकालत करने लगे। 1963 तक वे उसी हाईकोर्ट में वकालत करते रहे। उसी साल जुडीशियल सर्विस में प्रवेश किया। पहले गुरदासपुर व अमृतसर में रहे और बाद में कुछ समय के लिए दिल्ली आए। पर 1966 में पंजाब के विभाजन पर वह हिमाचल प्रदेश चले गए और तीन जिलों में जज रहे। बाद में 1971 में फिर दिल्ली आए, जिला जज व हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार के पद पर काम किया। इससे स्पष्‍ट है कि वे 1950-1960 वाले दशक के आरंभ में वे दिल्ली में रहे ही नहीं। फिर नया बाजार की शाखा में कैसे जाते थे? पूरे तथ्य राजेंद्रनाथ अग्रवाल केस की पत्रावली में पढ़ने के बाद बिशन टंडन ने अपनी डायरी में लिखा कि ‘प्रधानमंत्री ने जो कहा वही पत्रावली में लिख दिया।’ फिर उन्होंने व्यंग्‍य में लिखा, जय हो इन कायरों की!

 

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