शंकर दयाल सिंह: इमरजेंसी का बाइस्कोप

रामबहादुर राय

साहित्य और राजनीति के अमर नामों में एक शंकर दयाल सिंह है। वे इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के साक्षी रहे। 1975 की इमरजेंसी में वे कांग्रेस के लोकप्रिय नेताओं में से थे। कांग्रेस पार्लियामेंट्री बोर्ड के सदस्य थे। लोकसभा के सदस्य तो थे ही। वे एक मात्र कांग्रेसी नेता रहे, जिन्होंने इमरजेंसी को जैसे देखा, अनुभव किया और कुछ पक्के विचार बनाए, उसे लिख डाला। ‘इमरजेंसी, क्या सच? क्या झूठ?’ इस पुस्तक को लोग आज भूल से गये हैं। जो लोग इमरजेंसी में बेतरह सताए गए वे जो लोग इमरजेंसी को तानाशाही के दौर की तरह देख रहे थे वे उसे लोकतंत्र की पुनस्र्थापना मानते हैं। उस समय इमरजेंसी पर बहुत किताबें छपी। उनमें शंकर दयाल सिंह की किताब सबसे अलग और अत्यंत प्रामाणिक है। उन्हें यह विशेष सुविधा प्राप्त थी कि कांग्रेस के वरिष्ठ  नेताओं से अंतरंग वार्ता कर सकते थे।

शंकर दयाल सिंह की यह पुस्तक ‘इमरजेंसी, क्या सच? क्या झूठ?’ इस समय बार-बार पढ़ी जानी चाहिए। क्यों? इसलिए कि यह वर्ष  इमरजेंसी के 50 साल का है। इसलिए भी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश वासियों को निशान लगाकर बताया है कि 25 जून, 1975 को संविधान की हत्या की गई। इसलिए हर साल 25 जून को भारत भर में ‘संविधान हत्या दिवस’ मनाया जाएगा। ऐसे समय में यह किताब अपने ढंग की अनोखी इसलिए है क्योंकि इमरजेंसी का ऐसा तथ्यपरक राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण  दूसरी किसी किताब में खोजना असंभव सा है। किताबों इमरजेंसी पर की कमी नहीं है। लेकिन शंकर दयाल सिंह अपनी किताब में जो बाइस्कोप दिखाते हैं। वह दूसरी किसी किताब में खोजने पर भी नहीं दिखता हो तब तो दिखा।

यह इतिहास का काला अध्याय है।’ इस छोटे वाक्य में इमरजेंसी का अंधेरा समाया हुआ है। शंकर दयाल सिंह ने अपने संस्मरण में यह भी लिखा है कि ‘12 जून 1975 को जब इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया तो संभव है कि इंदिरा जी ने त्याग पत्र देने की बात सोची हो। हालांकि एक भी जगह किसी बयान में या अखबार में या आकाशवाणी से यह बात पढ़ने सुनने को न मिली कि प्रधानमंत्री त्यागपत्र देने जा रही हैं। बार-बार यही ब्राॅडकास्ट होता रहा कि इंदिरा गांधी अब भी प्रधानमंत्री बनी हुई हैं।’ … ‘अब सोचता हूं तो हंसी आती है- भला त्यागपत्र दे कौन रहा था?’

उनका मत है कि ‘इंदिरा जी में यदि थोड़ी भी सूझ-बूझ, पद की गरिमा और त्याग की भावना होती तो 25 जून, 1975 को 10 बजकर 20 मिनट पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया था और वे 10 बजकर 30 मिनट परराष्ट्रपति के सामने अपना त्यागपत्र प्रेषित कर देती तो इतिहास में वे सदा के लिए अमर हो जाती। विदेशों की बात हम छोड़ दे, हमारे देश  में ही कई मौकों पर यह त्यागवृत्ति दिखलाई गई है। लालबहादुर शास्त्री   ने एक रेल दुर्घटना के बाद इस्तीफा दे दिया था। डाॅ. सम्पूर्णानन्द ने संस्था के चुनावों में हार जाने पर मुख्यमंत्री का पद छोड दिया था। जान मथाई ने बजट की गोपनीयता भंग होने पर वित्तमंत्री पद पर बने रहना अनैतिक समझा था। नीलम संजीव रेड्डी बसो के मामले में आंध्र प्रदेश  हाई कोर्ट के फैसले के बाद तुरन्त हट गये थे। स्वयं इंदिरा गांधी ने अपने मंत्रिमंडल के एक सदस्य डाॅ. चेन्ना रेड्डी की चुनाव याचिका खारिज होने पर उन्हें अविलम्ब कार्यमुक्त कर दिया था। एक हवाई दुर्घटना के कारण डाॅ. कर्ण सिंह ने भी अपना त्यागपत्र प्रेर्षित  किया था। तब फिर इंदिरा गांधी को स्वयं किस नैतिकता ने पद पर बने रहने को बाध्य किया? रह-रह कर यह प्रश्न  मेरे मन में किसी ज्वार-भाटे के समान उठता रहता है।’

मरहूम राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद का नाम मैं घसीटना नहीं चाहता। लेकिन यह जरूर कहना चाहता हूं कि संवैधानिक अधिकार होते हुए भी क्या उनके हाथो में यह ताकत थी कि वे आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर कर देते? संविधान कहता है कि राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सिफारिश के अनुसार कार्य करेगा। ‘आपातस्थिति की घोषणा  की जाये’- क्या प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने मंत्रिमंडल में इस संबंध में कोई राय ली थी? क्या यही एक जुर्म किसी भी लोकतंत्रीय देश के प्रधानमंत्री के लिए काफी नहीं है कि वह इतना बड़ा निर्णय मंत्रिमण्डल की उपेक्षा करके लें?’

‘क्या ये सारे कदम श्रीमती इन्दिरा गाधी ने देश के हित में उठाये थे या अपने हित में? कहा जाता है कि देश में अराजकता की स्थिति आ जाती। क्या वह अराजकता आपातस्थिति से बढ़कर होती? … ‘जब इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आया तो वह दिन और दिनों की अपेक्षा कुछ और ही था। दोपहर को मैं जगजीवनरामजी से मिलने गया था। मुझे जहां तक याद है मेरे साथ कृष्णकांत थे या सुमित्रा कुलकर्णी भी थी। हम लोगों ने जगजीवन बाबू से हर दृष्टिकोण पर विस्तार से बातें की थी। अब आगे क्या करना चाहिये, क्या हो रहा है तथा यह भी कि ऐसे गाढ़े समय में आपको आगे बढ़कर मार्ग-दर्शन करना चाहिये। मुझे अच्छी तरह याद है जगजीवन बाबू ने जो बातें कही थीं उसका सार यह था कि वे बड़ी गंभीरता से सारी स्थिति का अवलोकन कर रहे हैं और अगर इंदिरा गाधी प्रधानमंत्री पद से हटती है तो उसके बाद प्रधानमंत्री बनने के एक मात्र हकदार ये ही थे।’

उनकी यह भी राय थी कि इंदिरा गांधी यदि त्यागपत्र दें तो कांग्रेस संसदीय दल को अपने नेता चुनने का अधिकार होना चाहिये। उनके अंदर एक ध्वनि यह भी थी कि कई खेमों में यह आवाज आनी चाहिये कि जगजीवन बाबू ही प्रधानमंत्री बने, लेकिन अफसोस की बात यह थी कि स्वयं वे आगे बढ़कर मोर्चा लेने के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें अपने वर्तमान का खतरा नजर आता था, साहस की कमी थी और वह भी भावना रही होगी कि कहीं दूसरा व्यक्ति न हो जाये, इससे ज्यादा अच्छा है कि इंदिरा गाधी ही प्रधानमंत्री बनी रहें। हालांकि बार-बार वेे यह भी कहते थे कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री पद पर बने रहना बिल्कुल अनैतिक है, लेकिन शाम को 5, राजेन्द्रप्रसाद मार्ग पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के कार्यालय में कांग्रेस ससदीय दल की जब बैठक हुई तो इंदिराजी के प्रधानमंत्री बने रहने का प्रस्ताव जगजीवन बाबू ने ही पेश किया।

12 जून की रात में लगभग 9ः00 बजे जब मैं तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकान्त बरुआ के घर पर पहुंचा, वहां काफी रौनक और भीड़ थी। कांग्रेस दल के महत्वपूर्ण व्यक्ति आ-जा रहे थे और बरुआजी अपने मनमौजू स्वभाव के अनुसार एक से अनेक कथा-कहानी के साथ हंस-बोल रहे थे। एकान्त पाकर मैंने उनसे धीरे से पूछा- अब आगे क्या होना चाहिये? पार्टी में यह प्रस्ताव आ जाये कि इंदिराजी यदि प्रधानमंत्री नहीं रहती है तो अपने उत्तराधिकारी को वे स्वयं चुन दें- बहुत धीमी और सधी आवाज में बरुआजी ने मुझ से कहा। वे जानते थे कि मैं दल के उन सदस्यों में से हूं जो जागरूकतापूर्वक उन घटनाओं पर नजर रख रहा है।’

उन दिनों यह भी चर्चा सामान्य रूप से चल रही थी कि इंदिराजी यदि प्रधानमंत्री पद से हटती है तो अपने उत्तराधिकारी के रूप में सिद्धार्थ शंकर राय, देवकान्त बरुआ, अथवा सरदार स्वर्ण सिंह को वे प्रधानमंत्री बनायेंगी। जगजीवन बाबू का नाम किसी प्रकार भी प्रधानमंत्री अथवा कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा न आ रहा था। यह भी सच्चाई है कि चव्हाण और जगजीवन बाबू के ऊपर पैनी दृष्टि रखी जा रही थी और इसकी निगरानी जो लोग कर रहे थे उनमें निश्चित रूप से संजय गांधी, आर.के. धवन, ओम मेहता और बंसीलाल प्रमुख थे। ये चारों नाम ऐसे हैं जो प्रायः 1 नंबर सफदरजंग रोड और 1 नंबर अकबर रोड के इर्द-गिर्द हर समय देखे जा सकते थे- सुबह हो या शाम, रात हो या दिन। बाद में विद्याचरण शुक्ल भी इसी खेमें में तत्परतापूर्वक लग गये।’

शंकर दयाल सिंह की सोच है कि व्यक्ति चाहे कितना ही महान क्यों न हो, बड़े से बड़े पद पर वह क्यों न बैठा हो, लेकिन देश उससे बड़ा होता है। जहां कही भी इस बात की कोशिश की गई कि व्यक्ति राष्ट्र से बड़ा है वहां उस व्यक्ति को मुंह की खानी पड़ी। मेरी समझ में उन दिनों अथवा आपातकाल की घोषणा के बाद जिस तरह से प्रचार के सभी माध्यमों को एक व्यक्ति के साथ केन्द्रित कर दिया गया और टीवी,रेडियो, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सेंसरशिप के बाद अखबार एक या दो व्यक्तियों के ही जय घोष में सिमट गये। उन प्रचारों में यह दिखलाने की चेष्टा की गई कि इंदिरा गांधी देश से या कांग्रेस संस्था से भी बढ़कर है। राष्ट्र की चेतना को इससे धक्का लगा, संस्था का गौरवमय इतिहास इससे कलंकित हुआ और जितना ही दुरुपयोग इन साधनों का व्यक्तिगत लाभ के लिए किया गया, बुद्धिजीवियों के मन-मस्तिष्क पर इसका प्रभाव उल्टा पड़ा।’…‘संसद का अधिवेशन जब चलता रहता था तब भी उसकी कार्यवाहियों का बहुत कम जिक्र समाचार-पत्रों में रहता था। फिरोज गांधी ने वहां की कार्यवाहियों के प्रकाशन संबंधी जो व्यवस्थाएं कायम करवाई थी, उसे समाप्त कर दिया गया था।’

यह भी कितना बड़ा इतिहास का उपहासमय अध्याय कहा जायेगा कि जिस संसदीय कार्यवाहियों के प्रकाशन की स्वतन्त्रता का अधिष्ठापन फिरोज गांधी ने संसद द्वारा कराया था उन्हें उन्हीं की पत्नी श्रीमती इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री के रूप में समाप्त करने का गौरवपूर्ण तिलक अपने मस्तक पर लगाया। और अन्य थे हम सब, संसद सदस्य के रूप में अपने गलों में फांसी का फंदा खुद बांध रहे थे। संसद सदस्य को सब से बडा अधिकार या तो यही कि वह अपनी बात सदन के अन्दर रख सकता था, बाहर उसका प्रकाशन हो सकता था और जनता के हित में कही गई बातें जनता तक पहुंच सकती थी, उसका भी गला घोंट दिया गया।’

‘मैं यहां यह कहे बिना नहीं रह सकता कि हमारे जैसे राजनीतिक या संसद सदस्य जो पहली बार ही संसद का मुंह देख रहे थे और इंदिरा जी की आंधी में 1971 में चुनकर आये थे- वे कुछ सहम रहे थे, कुछ नासमझी में पड़े हुए थे, कुछ एम.पी. गिरी के लोभ में जकड़े हुए थे, कुछ खुशामद की चादर ओढ़े हुए थे, भूतकाल का उन्हें ज्ञान न था और भविष्य में क्या होने वाला है, इसकी पहचान भी नहीं थी। अतः हमारी अक्ल को पाला मार गया था, लेकिन वे सब क्यों चुप थे जो 20-25-30 साल से लगातार संसद सदस्य रहते आये थे, वर्षों से जो मंत्रिमंडल के माननीय सदस्य थे, जिनकी बुद्धि प्रखर थी, जिन्होंने गांधीजी की प्रेरणा से राजनीति को वरण किया था। सरदार पटेल, पं. जवाहर लाल नेहरू, डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद, मौलाना आजाद, सुभाषचन्द्र बोस और लाल बहादुर शास्त्री के साथ-साथ आजादी की लड़ाई या देश-निर्माण में जिन्होंने काम किया था, जिनमें से आज कई मुखर बने हुए है- वे क्यों चुप थे? क्या इतिहास कभी भी ऐस लोगों को क्षमा कर सकेगा जिन्होंने पद के मोह में अपनी नैतिकता और प्रतिष्ठा को ताक पर रख दिया था।’

कांग्रेस  संसदीय दल की कार्यकारिणी में लोकसभा का कार्यकाल 5 साल से 9 साल बढ़ाने का प्रस्ताव आया। पहले से ही प्रचारित किया गया कि प्रधानमंत्री यही चाहती हैं। रघुरमैया एवं ओम मेहता सरीखे दल के व्यवस्थापकों ने भूमिका-भाग में बताया कि देश की गरीब जनता के ऊपर हर 5 साल के बाद चुनाव के खर्च का बोझ लादना अन्याय है अतः कार्यकाल बढ़ाना चाहिए, कम से कम 7 साल।’ … ‘उसके बाद एक-एक कर चार-पांच सदस्यों ने कार्यकाल बढ़ाने के प्रस्ताव का समर्थन किया। चार-पांच सदस्यों के बाद मैं पहला सदस्य था, जिसने यह कहा कि 5 साल से अधिक कार्यकाल बढ़ाना सरासर अन्याय होगा। दुनिय के शायद ही किसी जनतंत्रीय देश में  5 साल से अधिक कार्यकाल हो। मैंने अमेरिका, इंगलैण्ड, फ्रांस और स्वीटजरलेण्ड का उदाहरण दिया। इसके साथ ही मैंने यह भी कहा- चुनाव की यदि चिंता न हो तो कोई भी प्रतिनिधि शायद ही अपने क्षेत्र में जाये या जन सेवा करे। दूसरी बात यह है कि इस बन्द कमरे में हम जो भी फैसला ले लें, बाहर जनता हमें हिकारत की नजर से देख रही है कि ये एम.पी. पेंशन तय कर रहे हैं, अपना कार्य-काल बढ़ा रहे हैं और अपनी ही सुख-सुविधा में लगे हैं।’

कांग्रेस दल में तेज-तर्राट एवं साफगोई से बोलने वाले सदस्यों की कमी नहीं रही है। मैंने जब कार्यकाल बढ़ाने का विरोध किया तो मुझे ख़ुशी है कि मूलचन्द डागा, दिनेश गोस्वामी आदि सदस्यों ने मेरा साथ दिया। दूसरी ओर ऐसे सदस्य जो बिल्कुल लकीर के फकीर थे, इंदिरा का मुंह देखते रहे कि वह क्या बोलती हैं।

कार्यकारिणी में जब निश्चित तौर पर कार्यकाल बढ़ाने और न बढ़ाने के संबंध में दो मत हो गये और लगभग दोनों ओर बराबर-बराबर सदस्य हो गये तब इंदिराजी ने बीच का रास्ता अपनाने पर जोर दिया- क्यों नहीं छः साल कर दिया जाये, न पांच साल न सात साल बीच का रास्ता तो यही हो सकता है।’ … ‘अधिकांश सदस्य उनकी इस बात पर ‘हां में हां’ कर उठे। लेकिन मुझे संतोश  नहीं हुआ, मेरा दृढ़ मत था कि लोकसभा का कार्यकाल नहीं बढ़ना चाहिए। अतः बैठक के बाद जब प्रधानमंत्री अपने कार्यालय में जाने लगी तब मैं उनके साथ हो गया और मैंने कहा- आप ने छः साल कह दिया, इसलिए छः साल ही सभी कह उठे। मेरा ख्याल है कि 5 साल से किसी प्रकार कार्यकाल का बढ़ना ठीक नहीं होगा, लोग क्या सोचेंगे तथा विरोधी दल और समाचार-पत्र तो इसकी आलोचना कर ही रहे हैं।’

मैं इसमें कहां पड़ती हूं। जो सदस्यगण चाहे, करें उन्होंने अपने कमरे में प्रवेश करते-करते कुछ झल्लाते हुए ये बातें कही।’ मैें विस्तार से इस संबंध में बातें करना चाहता था लेकिन दरवाजे पर खड़े व्यक्ति ने फौरन उनका दरवाजा बन्द कर दिया और वह अन्दर हो गई और मैं बाहर रह गया। अक्सर मैंने ये बातें देखी है कि सदस्यों के साथ इन दिनों यही होता रहा है।’

विशेष तौर से 12 जून, 1975 एवं 26 जून, 1975 के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गाधी से मिलना और खुलकर बातें करना कठिन और कभी-कभी बड़ा अपमानजनक-सा हो गया था। प्रधानमंत्री की कोठी पर जिन लोगों को इन्टरव्यू के लिए बुलाया जाता था वे चाहे कितने भी बड़े आदमी हो, पूर्व मंत्री हों, संसद सदस्य हों, विदेशी राजनयिक हों अथवा समाज के अन्य वरिष्ठ तबके के व्यक्ति हों-सब पर भयानक कड़ी नजर रखी जाती थी और जिस तरह से उन्हें गलियारे से होकर कई पुलिस चेक पोस्टों के मार्ग से गुजरना पड़ता था यह अपमानजनक था किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए मिलने से ज्यादा अच्छा था, नहीं मिलना। और मैं इस बात का साक्षी हूं कि बहुत से कांग्रेस के स्वाभिमानी और पुराने सदस्य इस संकोच और अपमान के कारण प्रधानमंत्री से नहीं मिलते थे। सेन्ट्रल हाल में बैठकर संसद सदस्य प्रायः यह चर्चा किया करते थे कि प्रधानमंत्री की कोठी पर उन्हें किस प्रकार जलील होना पड़ा।’

इमरजेंसी में जो लोग निर्णय लेते थे, वे कौन थे? यह जानने की जरूरत है। शंकर  दयाल सिंह ने लिखा है, ‘हम उन्हें ‘किचेन कैबिनेट’ का सदस्य कहें या ‘काकस’ कहें, ‘फैमिली कैबिनेट’ कहें, लेकिन यह भी सही है कि कैबिनेट कहीं नहीं दिखती थी।’ ‘जो कुछ भी हुआ, वह ‘सुपर कैबिनेट’ या ‘सुपर प्राइम मिनिस्टर’ की मर्जी से हुआ।

 

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