स्वराज के लिए त्याग

प्रज्ञा संस्थानमुझसे जब मुजफ्फरपुर में विद्यार्थियों की एक सभा में भाषण देने को कहा गया तो मैं किसी भी प्रलोभन के बिना राजी हो गया; क्योंकि मुझे याद है कि जब मैं अपना चंपारण का कार्य शुरू करने आया था तो पहले दिन मुजफ्फरपुर के विद्यार्थियों के समक्ष भाषण देने का सुअवसर, मैंने तत्काल यह सोचकर स्वीकार कर लिया कि इस समय, जब मुझे भारत के विद्यार्थी समुदाय के बहुत ज्यादा मदद की जरूरत है, यहां के विद्यार्थी शायद मुझे मदद पहुंचाएंगे। आप मुझे 1920 की याद दिला देते हैं। निश्चय ही वे बड़े शानदार दिन थे, निश्चय ही उन दिनों देश में, राष्ट्रीय चेतना का जो प्रखर उभार दिखाई देता था, वह अब दब गया है, लेकिन उस आंदोलन का असर अब भी बाकी है। यदि आप उस जोश के उभार को बनाए नहीं रख सके हैं, तो केवल आप ही उसके लिए दोषी नहीं हैं। स्वाभाविक ही है कि मैं देश की बदली हुई परिस्थितियों में आप लोगों से वही काम करने को नहीं कहूंगा; पर मैंने तब स्वतंत्रता संघर्ष का जो रास्ता सुझाया था, वही अब भी भारतीयों द्वारा अपनाने योग्य सर्वोत्तम रास्ता है। यदि आप उस रास्ते पर बहुत लंबे समय तक नहीं चल सके, तो उसके लिए शर्मिन्दा होने की जरूरत नहीं है।

मुझे इस बात पर आश्चर्य नहीं है कि आप आगे कूच करते हुए रूक क्यों गए, बल्कि देश की हालत देखते हुए मुझे इस बात पर आश्चर्य होता है कि उन दिनों आप इतना आगे बढ़ ही कैसे सके थे। जो कार्यक्रम मैंने बताया था, यदि वह असल में लाया जा सकता तो सफलता मिलने में संदेह ही नहीं था, लेकिन अब मैं तब तक उस कार्यक्रम के अनुसार काम करने के लिए आपसे नहीं कहूंगा, जब तक कि उसके लिए उपयुक्त अवसर नहीं आ जाता। लेकिन इस बीच मुझे आपसे एक काम करने को कहना है और वह है खद्दर का काम। बड़े-छोटे, अमीर-गरीब, विद्वान-मूर्ख, विद्यार्थी या सरकारी कर्मचारी सभी लोग आसानी से इस काम में जुटकर इस सफल बना सकते हैं। विद्यार्थी समुदाय इस काम के लिए विशेष रूप से उपयुक्त हैं।

पंडित मालवीय ने हिन्दू विश्वविद्यालय में दृष्टांत प्रस्तुत करके आपका मार्ग दर्शन कर दिया है। कल ही हिन्दू विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने मुझे एक हजार रूपए की थैली भेंट की है। आपने जो थैली भेंट की है वह मुजफ्फरपुर के विद्यार्थियों की संख्या को देखते हुए, उससे बहुत कम है। मैं विद्यार्थियों से आशा रखता हूं कि वे अपनी सारी आर्थिक और शारीरिक शक्ति से आंदोलन की सहायता करेंगे। मुझे आशा है कि मुजफ्फरपुर के विद्यार्थी देश के अन्य भागों के विद्यार्थियों से पीछे नहीं रहेंगे। आप न सिर्फ आज के दिन ही धन से सहायता करेंगे अपितु मुझे आशा है कि आप अपने जेब-खर्च से कुछ बचाते ही रहेंगे और नियमित रूप से आंदोलन की सहायता करते रहेंगे। आप लोग प्रांतीय खादी संगठन के मुख्यालय में रह रहे हैं; इसलिए आपको खद्दर के काम के सभी पहलुओं को सीख लेना चाहिए और अपने अवकाश का समय भी इस काम में लगाना चाहिए। मैं तो आप से कहूंगा कि आप प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा सूत भी कातें। आप अपने लिए, पैसा कमाने के लिए, नहीं बल्कि गरीब और बेकार ग्रामीणों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए सूत कातें। परंतु यह सब कुछ आप तभी करे जब आपकी खादी में श्रद्धा हो। वैसी श्रद्धा प्राप्त करने के लिए आप मुझसे या अन्य किसी व्यक्ति से खादी का अर्थशास्त्र समझ लें।

यदि आप मानव हैं तो आप में अपने आसपास के मनुष्यों के प्रति सहानुभूति अवश्य होनी चाहिए। यदि आप में भाई चारे की इतनी भी भावना नहीं है, तो आप स्वराज पाने की आशा कैसे कर सकते हैं? भारत के सच्चे सपूत होने के नाते, आपका यह कर्त्तव्य है कि आप उन सब वस्तुओं को अस्वीकार कर दें, जो प्रत्येक भारतीयों को उपभोग के लिए सुलभ नहीं हो पाती। पर मैं आपको ऐसा करने के लिए नहीं कह रहा हूं। मैं तो यह चाहता हूं कि आप खादी खरीदे और इस तरह हजारों बेकार देशवासियों और महिलाओं को काम और भोजन दें। विद्यार्थियों पर खादी पहनने का प्रतिबंध नहीं है।

जब राजगोपालाचारी को मद्रास के एक सरकारी कालेज में खद्दर पर बोलने के लिए आमंत्रित किया गया तब वे किस तरह प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों की सहायता से उस कालेज में खादी संघ चलाने में सफल हुए। आशा प्रकट है कि मुजफ्फरपुर में भी उस कालेज के दृष्टांत का अनुसरण किया जाएगा। खद्दर की अर्थव्यवस्था के सिद्धांत को समझने के लिए पुरस्कृत निबंध का पढ़ना आपके लिए लाभदायक होगा। मुझे आशा है कि पुस्तक को पढ़ चुकने के उपरांत खादी में आपकी आस्था हो जाएगी।

खद्दर पहनने के विरोध में केवल एक आपत्ति रह जाती है और वह है फैशन और आराम के प्रति मोह। मैं आपसे पूछता हूं कि यदि आप देश के लिए इतना छोटा सा त्याग भी नहीं कर सकते, तो स्वराज पाने की आशा कैसे कर सकते हैं? आप सभी विद्यार्थियों से इसी स्थान पर निष्ठापूर्वक यह प्रतिज्ञा करने का आग्रह करता हूं कि आप सभी आज के बाद कभी सिवाय खादी के और कुछ इस्तेमाल नहीं करेंगे और यदि संभव हुआ तो अपने विदेशी कपड़ों को जला डालेंगे।

चूंकि यह विद्यार्थियों की सभा है, मैं एक और विषय के प्रति संकेत किए बिना इस भाषण को समाप्त नहीं कर सकता। वह विषय है ब्रहा्रचर्य। मेरा विद्यार्थियों के साथ काफी संपर्क एवं संबंध रहा है। और मुझे इस बात का पता चला है कि विद्यार्थी समाज को चारित्रिक अधः पतन ने घेर रखा है। मैं इस संबंध में अपने विचार ‘यंग इंडिया’, ‘नवजीवन’ और ‘आत्मकथा’ में प्रकट करता रहता हूं। परंतु मैं, आपका आगे और पतन न हो, इसलिए चेतावनी दे रहा हूं। आप लोगों के चरित्र में विकार का आ जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। सारे देश का वातावरण भ्रष्ट विचारों से इतना भर गया है कि आप लोगों के लिए इसके प्रभाव से बचे रहना लगभग असंभव है। पाठ्य-पुस्तकें, सिनेमा, रंगमंच सब अनैतिकता के प्रभाव को फैला रहे हैं। यदि विद्यार्थियों को समय रहते चेतावनी न दी जाए, और आवश्यक सावधानी न बरती जाए, तो सारा देश नष्ट हो जाएगा। विद्यार्थियों को बचाने के लिए वीर स्वामी श्रद्धानंद ने आधुनिक शहरी जीवन के आकर्षणों से बहुत दूर हिमालय की तलहटी में गुरूकुल की स्थापना की थी। संभव है उनके द्वारा स्थापित संस्थाओं में दोष रहे हों, परंतु आदर्श ठीक है और इस आदर्श को नष्ट नहीं होने देना चाहिए।

कुछ एक बमों और कारतूसों की मदद से स्वराज प्राप्ति का प्रयत्न केवल पागलपन से भरा एक विचार है। इन साधनों से जो स्वराज प्राप्त किया जाएगा, वह देश के गरीब लोगों के लिए नहीं होगा। गरीबों के लिए स्वराज लेने का प्रभावपूर्ण साधन केवल खादी है। इसीलिए मैं आप से इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए कहता आ रहा हूं। आपको ब्रहा्रचर्य का दृढ़ता से पालन करना चाहिए, जो सारी शक्ति का स्रोत है। केवल इस तरह, आप अपने आपको इस महान संघर्ष के लिए तैयार करने की आशा कर सकते हैं। भारत कर्मभूमि, धर्मभूमि और त्यागभूमि है। हिमालय इस तथ्य के साक्षी के रूप में खड़ा के है। परंतु सब कुछ ब्रहा्रचर्य के दृढ़ पालन पर निर्भर करता है। यदि आप एक बार फिर भारत में धर्म-राज्य की स्थापना करना चाहते हैं तो आपको सच्चाई, न्यायपरायणता और ब्रम्हचर्य की राह पर चलना होगा। ईश्वर के सिवाय अन्य किसी से डरना नहीं होगा और उसे अपना मित्र और पथ-प्रदर्शक समझकर बढ़ना होगा।

अंग्रेजी से सर्चलाइट, 30.1.1927

(25 जनवरी, 1927 को मुजफ्फरपुर के विद्यार्थियों की सभा में प्रस्तुत भाषण)

 

 

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