सर्वहारा या जातिवादी रईस ! आरक्षण की दरकार किसे है ?

के .विक्रम रावराहुल गांधी तब (मार्च 1971) मात्र नौ माह के शिशु थे। उनकी दादी इंदिरा गांधी पांचवीं लोकसभा का आम चुनाव लड़ रही थीं। यह देश में प्रथम मध्यवर्ती निर्वाचन था। इंदिरा-कांग्रेस का चुनावी नारा था : “न जात पर, न पात पर, इंदिराजी की बात पर। मुहर लगेगी हाथ पर।” इस सूत्र पर ही इंदिरा-कांग्रेस को 545 सीटों वाली लोकसभा में 352 सीटें मिल गई। कांग्रेस का प्रभावी ऐलान था : “गरीबी हटाओ”। स्वयं प्रधानमंत्री की पुकार थी : “मैं कहती हूं गरीबी हटाओ, ये विरोधी कहते हैं इंदिरा हटाओ। जनता तय करे किसे हटाया जाए ?” अब 53 साल के अधेड़ राहुल गांधी कहते हैं : “जितनी आबादी, उतना हक।” वे जातिगत आधार पर मतदान हेतु अभियान चला रहे हैं। कितना अंतर है दादी और पोते के सिद्धांतों में ? अर्थात गरीबी उन्मूलन नहीं, बल्कि वर्ण व्यवस्था के पक्ष में वोट मांगेंगे।
 राहुल से एकदम विपरीत मंतव्य रहा उनके मशहूर निजी वकील, अभिषेक मनु सिंघवी का। इन्हींने सुप्रीम कोर्ट में बहस द्वारा राहुल को बर्खास्त सांसदी वापस दिलाई थी। सिंघवी ने जाति-आधारित जनगणना का विरोध किया। पर पार्टी के दबाव में पैंतरा बदल डाला। राहुल की लाइन पर चल निकले। दिल से नहीं। बिहार पर राहुल ने कह दिया : “वहां जातिगत सर्वेक्षण से पता चला है कि OBC, SC, ST 84 फीसदी हैं।” राहुल गांधी अब लगातार ओबीसी और जाति जनगणना पर जोर दे रहे हैं।
आबादी के हिसाब से भागीदारी की मांग पर राहुल ने अपने परनाना (जवाहरलाल नेहरू) की चुनावी रणनीति को भी भंग कर दिया। नेहरू ने प्रथम तीन लोकसभा चुनावों से वोटरों का त्रिभुज रचा था : “ब्राह्मण, दलित और मुसलमान।” इसी आधार पर इंदिरा गांधी भी अगला लोकसभा (1967) चुनाव लड़ी थीं। फिर 1971 और 1980 में पुरानी लाइन पर लौट आई थीं। अर्थात सभी वर्गों का साथ लिया था। इसी परिवेश में राहुल के लिए एक दुरूह सियासी पेचीदगी भी आ सकती है। वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। यूं इस दौड़ में नीतीश कुमार अव्वल हैं, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, शरद पवार, एमके स्टालिन आदि भी। ठीक मई 1996 वाली राजनीतिक स्थिति उभर रही है। तब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया था। ज्योति बसु को उनकी मार्क्सवादी पार्टी (महासचिव प्रकाश करात) ने रुकवा दिया था। मुलायम सिंह यादव का नाम रात को तय हो गया था पर उनके स्वजातीय लालू यादव ने लंगडी लगा दी। धोबी पाटा मारा। धुप्पल में कन्नडभाषी हरदनहल्ली दौड्डेगौड़ा देवगौड़ा पीएम बन गए।
 इस परिवेश में नरेंद्र मोदी के बयानों पर राष्ट्र को गंभीरता से विचार करना होगा। बजाय ईमानदार, जनवादी, आर्थिक आधार के, छिछले-स्वार्थपरत जातिवादी सिद्धांत पर शीर्ष पद का फैसला हो जाए ! तो बेहतरीन चयन लालू यादव का ही होगा। अभी तक बिहार में चारा घोटाला था, अब वह राष्ट्रीय पैमाने पर होगा। भ्रष्टाचार देशव्यापी हो जाएगा। तब राहुल का नंबर लगेगा नहीं। वे किस जाति में फिट होंगे ? ननिहाल से वे रोमन ईसाई है। दादा की तरफ से पारसी हैं। वर्ण से यूरेशियन हैं। चुनावी पैमाने से केरल (वायनाड) के हैं क्योंकि अमेठी से यूपीवाले उन्हें खारिज कर चुके हैं। मगर अगले संसदीय चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी जिसे राहुल ने 2019 में हराया था इस बार वायनाड सीट जीत सकती है।
अब नरेंद्र मोदी द्वारा उल्लिखित कुछ महत्वपूर्ण राष्ट्रीय बिंदुओं पर गौर कर लें। क्या जाति के सामने भारत के गरीब, सर्वहारा, बेसहारा वोटरों की कोई वकत नहीं है ? अंतिम छोर पर खड़ा असली भारतीय कब न्याय पाएगा ? मोदी की मांग है कि गरीब को अवसर मिले।
     
सोनिया-कांग्रेस पर मोदी का आरोप है कि वे राष्ट्र में हिंदुओं और गरीबों को विभाजित कर रहीं हैं। अर्थात अधिकार देने का पैमाना केवल जाति ही हो। तो बिहार में कुर्मी से कहीं ज्यादा यादव हैं। अतः नीतीश को मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहिए। फिर अल्पसंख्यक मुसलमानों का क्या ? सरदार मनमोहन सिंह ने तो साफ कह दिया था कि भारत की समस्त संसाधनों पर मुसलमानों का हक पहला है। अतः इस जातिगत सियासत के सामने मुसलमान कहीं ठहर पाएंगे ?
 तो कुल मिलाकर जातिगत समीकरण में तो नरेंद्र मोदी अत्यंत माफिक और माकुल बैठेंगे क्योंकि वे स्वयं अति पिछड़ा जाति के हैं। अतः यह न्यायसंगत होगा कि मोदी को ही फिर मौका मिले। मगर सभी राजनीतिक दलों का लक्ष्य होना चाहिए कि जाति तोड़ो, जो डॉ. लोहिया का सूत्र था। न कि जाति बढ़ाओ जो लालू-नीतीश एंड कंपनी का है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे हर्बर्ट एस्क्विथ की उक्ति याद आती है। प्रथम विश्व युद्ध उन्हीं के नेतृत्व में ब्रिटेन का जर्मनी से हुआ था। उनका इकलौता पुत्र मारा गया था। तब ब्रिटेन में हर परिवार से एक पुरुष को सेना में अनिवार्यतः भर्ती होना पड़ता था। पुत्र की वीरगति पर प्रधानमंत्री ने संसद में कहा : “मेरा बेटा ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय का उत्कृष्ट छात्र था। वक्ता था। विचारक भी। वह देश का प्रधानमंत्री हो सकता था।”
फिर लार्ड एस्क्विथ ने कहा : “उस सुदूर उपनिवेश भारत से हमें सीखना चाहिए। वहां क्षत्रिय सेना संभालते हैं। वणिक अर्थनीति देखते हैं। ब्राह्मण बौद्धिक संपदा संवारते हैं।” यदि मेरा बेटा भारत में जन्मता तो विप्रकुल में होता। देश की विद्वान परिपाटी संजोता। हमें भारत से यह पाना होगा।” वर्ण व्यवस्था की इससे बेहतर पैरोकारी कहां हो सकती है ? गमनीय प्रसंग है भारत के वर्तमान प्रसंग में।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Name *