ब्रिक्स यानी ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का समूह विश्व की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक शक्तिशाली मंच बन चुका है।विश्व की 49प्रतिशत आबादी और 40 प्रतिशत अर्थव्यवस्था इसके अंदर है। स्थापना के बाद से यह संगठन वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में पश्चिमी देशों के प्रभुत्व को संतुलित करने का प्रयास करता रहा है। भारत की मेज़बानी में आयोजित होने वाला ब्रिक्स समिट इस दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है, जो भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका को रेखांकित करता है।
पिछले कुछ वर्षों में ब्रिक्स का दायरा काफी बढ़ा है। मूल पांच सदस्य देशों के अलावा अब ईरान, मिस्र, इथियोपिया, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी इस समूह का हिस्सा बन चुके हैं, जिससे इसे “ब्रिक्स प्लस” कहा
जाने लगा है। इस विस्तार ने संगठन को वैश्विक जीडीपी और जनसंख्या के लिहाज़ से और अधिक प्रभावशाली बना दिया है। आज ब्रिक्स देश विश्व की लगभग आधी जनसंख्या और एक बड़े हिस्से की आर्थिक गतिविधियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
भारत के लिए ब्रिक्स समिट की मेज़बानी करना केवल एक कूटनीतिक आयोजन नहीं, बल्कि अपनी वैश्विक नेतृत्व क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर है। भारत लंबे समय से “वसुधैव कुटुम्बकम्” यानी पूरी दुनिया एक परिवार है, के सिद्धांत पर आधारित विदेश नीति अपनाता रहा है। जी-20 की सफल मेज़बानी के बाद अब ब्रिक्स समिट के माध्यम से भारत वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) की आवाज़ को और मज़बूती से अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखने का प्रयास कर रहा है।
भारत का प्रयास रहा है कि यह मंच केवल पश्चिम-विरोधी गुटबंदी का साधन न बने, बल्कि विकासशील देशों के हितों, जलवायु परिवर्तन, तकनीकी सहयोग, और वित्तीय समावेशन जैसे मुद्दों पर ठोस समाधान प्रस्तुत करे।भारत में आयोजित होने वाले इस समिट में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है,ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने और डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन को प्रोत्साहित करने पर विचार-विमर्श होता है।
डिजिटल इंडिया की सफलता को देखते हुए भारत यूपीआई जैसी तकनीकों को अन्य सदस्य देशों के साथ साझा करने पर ज़ोर दे सकता है।विकासशील देशों की ज़रूरतों के अनुरूप जलवायु वित्त पोषण और टिकाऊ विकास के मॉडल पर चर्चा एक महत्वपूर्ण एजेंडा रहता है।
भारत हमेशा से आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक एकजुटता की वकालत करता रहा है और इस मंच का उपयोग इस दिशा में भी सहयोग बढ़ाने के लिए करता है।ब्रिक्स के सामने कई चुनौतियाँ भी हैं। सदस्य देशों के बीच भू-राजनीतिक मतभेद, विशेष रूप से भारत-चीन संबंधों में तनाव, संगठन की एकजुटता को प्रभावित करता है। इसके अलावा विभिन्न सदस्य देशों की अलग-अलग प्राथमिकताओं के कारण आम सहमति बनाना भी एक कठिन कार्य रहता है।
भारत में आयोजित ब्रिक्स समिट, वैश्विक व्यवस्था में बदलाव की एक झलक प्रस्तुत करता है, जहाँ उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपनी आवाज़ बुलंद कर रही हैं। भारत की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में एक सेतु की तरह है — जो पश्चिमी देशों और वैश्विक दक्षिण के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करता है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत इस मंच का उपयोग अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक नेतृत्व की आकांक्षाओं को साकार करने में किस प्रकार करता है।
