संविधान बनाने में महिलाओं का योगदान

प्रज्ञा संस्थानआज संविधान दिवस है.आज़ाद भारत का संविधान कैसा होगा और भारत के नागरिकों के अधिकार और कर्तव्य क्या होंगे , इसके लिए एक संविधान बनना था. इसे बनाने के लिए संविधान सभा बनी. संविधान सभा में 299 सदस्य थे. इनमें15 महिलाएँ भी थीं. ये देश के अलग-अलग हिस्सों से आई थीं. इन महिलाओं ने सामाजिक रीति-रिवाजों को चुनौती दी. आज़ादी के आंदोलन में हिस्सा लिया. इन सबका समाज और राजनीति में सराहनीय योगदान था.इन महिलाओं ने आज़ाद देश को बनाने में योगदान दिया.

दक्षयानी वेलायुधन संविधान सभा की इकलौती महिला दलित सदस्य थीं. उनका जन्म केरल और उस वक़्त के कोचीन राज्य में हुआ था. वे दलित पुलय समुदाय की थीं. वह वक़्त ज़बरदस्त भेदभाव और ग़ैर बराबरी वाला था. इसकी वजह से पुलय समुदाय की महिलाओं को कमर से ऊपर बदन ढँकने की इजाज़त नहीं थी. दक्षयानी के परिवार ने इस रिवाज को चुनौती दी. ऐसा माना जाता है कि वे न सिर्फ़ अपने समुदाय की, बल्कि दलितों में भी पहली महिला थीं, जिन्होंने कॉलेज की पढ़ाई की. वे महात्मा गांधी से बेहद प्रभावित थीं. कस्तूरबा और महात्मा गांधी की मौजूदगी में छह सितंबर 1940 को उन्होंने समाज सुधारक आर वेलायुधन से शादी की. वे मद्रास प्रेसिडेंसी से कांग्रेस के टिकट पर संविधान सभा के लिए चुनी गई थीं. दक्षयानी संविधान सभा की सबसे युवा सदस्य थीं.

साल 1963 में भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने वाली सुचेता कृपलानी गांधीवादी थीं और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भूमिगत गतिविधियों में उनका ख़ासा योगदान रहा.कांग्रेस की सदस्य रहते हुए उन्हें संविधान सभा के लिए नामंकित किया गया था.वे यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की पक्षधर थीं. इसमें हर धार्मिक समुदायों के लिए शादी, विरासत, तलाक़ और बच्चा गोद लेने के मुद्दों पर एक क़ानून की बात कही गई थी.

सरोजिनी नायडू बुलबुले हिंद या भारत कोकिला के तौर पर मशहूर हैं. उनका जन्म हैदराबाद में हुआ था. सरोजिनी नायडू के कई रूप थे- कवि, स्त्री अधिकार कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी. वे कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष थीं. वे गांधी जी की बेहद क़रीबी थीं और उन्होंने उनके साथ ताउम्र काम किया. दोनों के बीच के संबंध बेहद दोस्ताना थे. वो चाहती थीं कि महिलाओं को वोट देने का हक़ मिलेवेसंविधान सभा में बिहार से चुनी गई थीं.

नेहरू परिवार में जन्मीं विजय लक्ष्मी पंडित को पहले लोग स्वरूप कुमारी के नाम से जानते थे. वे राजनीतिक एक्टिविस्ट और समाज सुधारक गोपाल कृष्ण गोखले की प्रशंसक थीं.साल 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरूआत हुई  थी. विजय लक्ष्मी पंडित को इलाहाबाद में कांग्रेस कमेटी की बैठक के दौरान गिरफ़्तार भी किया गया था. यहीं से उनके राजनीतिक करियर ने शक्ल लेनी शुरू कर दी थी. अपने भाई जवाहरलाल नेहरू की मौत के बाद उन्होंने फूलपुर सीट से उपचुनाव लड़ा और जीत भी हासिल की.

बेगम क़ुदसिया एज़ाज़ रसूल संयुक्त प्रांत विधानसभा का चुनाव लड़ रही थीं. मौलानाओं ने उनके ख़िलाफ़ फ़तवा दिया. फ़तवा था- जो स्त्री पर्दा नहीं करती है, उन्हें वोट देना ग़ैर इस्लामी है. यह स्त्री कोई और नहीं बेगम क़ुदसिया एज़ाज़ रसूल थीं. उन्होंने पर्दा त्याग दिया था. वे लंबे समय तक मुस्लिम लीग से जुड़ी थीं. बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गईं. आज़ादी और बँटवारे के बाद उन्होंने भारत में रहना तय किया. वे महिला शिक्षा की पैरोकार थीं. यही नहीं, उनका मानना था कि बच्चे-बच्चियों को सिक्षा उनकी मातृभाषा में देना चाहिए.वे मूल अधिकार और स्त्री-पुरुष समानता की हिमायती थीं.

गुजरात में जन्मीं हंसा मेहता एक महिलावादी, समाज सुधारक और समानता की पैरोकार थीं.इसका उदाहरण मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के आयोग में उनकी भूमिका से मिलता है.हंसा ने भारतीय प्रतिनिधि रहते हुए आयोग के ढाँचे को लैंगिक रूप से समान बनाने पर ज़ोर दिया. लंदन पढ़ाई करने गईं हंसा मेहता की मुलाक़ात वहाँ सरोजिनी नायडू से हुई और वो उनकी मार्गदर्शक बनीं. उन्होंने शराबबंदी और असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया.

अपनी कहानियों और कविताओं में कमला चौधरी ने पितृसत्तात्मक सोच, नारीवाद और लैंगिक समानता जैसे मुद्दों को उठाया. उत्तर प्रदेश से आने वाली कमला चौधरी की शादी 15 साल की उम्र में हो गई थी. उनके पति ब्रितानी सरकार में काम करते थे. लेकिन आज़ादी के आंदोलन के लिए उन्होंने अपने पति को भी प्रोत्साहित किया. सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान वे कांग्रेस में शामिल हो गईं. वे महिला चरखा संघ की सचिव बनीं और कई बार जेल भी गईं. संविधान सभा की सदस्य बनने पर उन्होंने बहस के दौरान हिंदू कोड बिल का समर्थन किया था.

आज़ादी के आंदोलन की सक्रिय भागीदार, अरुणा आसफ़ अली की बहन पूर्णिमा बनर्जी जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी की बेहद क़रीबी थीं. पूर्णिमा का जन्म पूर्वी बंगाल यानी आज के बांग्लादेश के बारिसाल में हुआ था. आज़ादी के आंदोलन के दौरान वे जेल गईं. जेल की वजह से उनकी सेहत पर भी असर पड़ा. पूर्णिमा बनर्जी को समाजवादी ख़्यालों का माना जाता था. उनका मानना था कि सरकार की मदद से चलने वाले किसी भी शैक्षणिक संस्थान में अल्पसंख्यक समुदायों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए.

मालती चौधरी संविधान सभा के लिए उड़ीसा से चुन कर आई थीं.वे महात्मा गांधी और रबींद्रनाथ टैगोर से प्रभावित थीं.वे शांति निकेतन में सबसे पहले पढ़ने वाली लड़कियों में से एक थीं. वे कांग्रेस के आंदोलन में सक्रिय भागीदार थीं. उनकी वजह से आज़ादी के आंदोलन में उड़ीसा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी. उनके नेतृत्व में ढेनकनाल में किसानों का बड़ा आंदोलन हुआ. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे जेल गईं.

लीला रॉय क्रांतिकारी समूह श्री संघ की कार्यकारिणी और उसका संचालन करने वाली पहली महिला थीं. वे मूल रूप से सिलहट (अभी बांग्लादेश में है) से थीं. कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उन्होंने असहयोग आंदोलन के बारे में जाना था. उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ़ ढाका में पढ़ाई की. वे महिलाओं को मतदान का अधिकार देने वाले आंदोलन से जुड़ीं.उन्होंने 12 दोस्तों के साथ महिला एसोसिएशन, दीपाली संघ बनाया. इसका काम लड़कियों को शिक्षित करना था.

आंध्र प्रदेश के काकीनाड़ा में जन्मीं दुर्गा के माता-पिता समाज सेवक थे.दुर्गा पर उनके काम की गहरी छाप थी. उन्होंने देवदासी और मुसलमान महिलाओं के पर्दा करने की प्रथा के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ महात्मा गांधी तक पहुँचाई.गांधी ने देवदासी प्रथा को ख़त्म करने और मुसलमान महिलाओं के लिए सुधार की बात कही. दुर्गा की असरदार हिंदी को देखते हुए गांधी ने आयोजकों से आंध्र प्रदेश और मद्रास में उन्हें ही अनुवादक रखने को कहा.

पबना (अभी बांग्लादेश में) में जन्मीं रेणुका की मुलाक़ात गांधी जी से कोलकाता में एक रिश्तेदार के घर पर हुई. इस मुलाक़ात ने रेणुका के जीवन की दिशा ही बदल दी. वे असहयोग आंदोलन के सिलसिले में वहाँ थे.वे अपनी सहेली के साथ कॉलेज छोड़ स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गईं और गांधी ने उन्हें घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा करने को कहा.रेणुका ने गांधीजी की कई बैठकों का आयोजन किया, जिनमें महिलाएँ भी शामिल हुईं.

शाही परिवार में जन्मीं अमृत कौर ने अपने जीवनकाल के तीन दशक में महात्मा गांधी के सहयोगी के तौर पर काम किया. अमृत के घर पर कांग्रेसी नेताओं का आना-जाना लगा रहता था. कांग्रेस नेता गोपाल कृष्ण गोखले उनके पिता हरनाम सिंह के गहरे दोस्त थे.उन पर गांधीवादी विचारधारा की इतनी गहरी छाप पड़ी कि वे साबरमती आश्रम भी गईं. वे ऑल इंडिया वर्किंग कॉन्फ्रेंस के संस्थापक सदस्यों में से एक थीं.वे नमक सत्याग्रह को लेकर जेल गईं और भारत छोड़ो आंदोलन में भी भाग लिया. वे संविधान सभा की सदस्य बनीं, जहाँ उन्होंने यूसीसी लाने की बात कही. अमृत कौर नेहरू कैबिनेट में स्वास्थ्य मंत्री बनीं. स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए उन्होंने मलेरिया और कुष्ठ रोग जैसी अन्य बीमारियों को लेकर पायलट कार्यक्रम चलाए. देश में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(एम्स) को स्थापित करने का बिल अमृत कौर ही लाईं थीं.

एनी मैसकेरीन त्रावणकोर और कोचिन रियासत से संविधान सभा की सदस्य बनी थीं.उन्होंने इतिहास और अर्थशास्त्र में दो एमए की डिग्री हासिल की. वे आज़ादी के आंदोलन की भागीदार बनीं और जेल भी गईं.उन्होंने संविधान सभा की बहस में कहा कि लोगों के पास बिना किसी नियंत्रण, निर्देश और निगरानी के अपने जन प्रतिनिधि चुनने का हक़ होना चाहिए. वे हिंदू कोड बिल के लिए बनी समिति की सदस्य भी थीं. साल 1951 में वह केरल के तिरुअनंतपुरम से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में सांसद चुनी गईं थीं.

अम्मू स्वामीनाथन का जन्म केरल के पालघाट में हुआ था. बचपन में अम्मू की पढ़ाई घर पर ही मलयालम में हुई थी. उनकी एक बेटी लक्ष्मी, नेताजी के आज़ाद हिंद फ़ौज की कैप्टन लक्ष्मी सहगल के रूप में मशहूर हुईं. वे वीमेंस इंडियन एसोसिएशन और ऑल इंडियन वीमेंस कॉन्फ़्रेंस से जुड़ी थीं. अम्मू साल 1946 में मद्रास से संविधान सभा के लिए चुनी गईं. संविधान सभा में अपने भाषण में उन्होंने कहा था, “यह संविधान 40 करोड़ लोगों के सपनों का पूरा होना है. मैं जानती हूँ कि संविधान हमें मौलिक अधिकार, समान दर्ज़ा, वयस्क मताधिकार देता है. छूआछूत और इस तरह की दूसरी चीज़ों को हटाने की बात करता है. इन सबके ख़िलाफ़ हम सालों से लड़ रहे थे. हालाँकि, अगर हमें इस देश को ख़ुशहाल और समृद्ध बनाना है, तो कागज़ पर दिखने वाली ये सारी चीज़ें काफ़ी नहीं हैं. हमें यह देखना होगा कि संविधान में कागज़ पर लिखे ये विचार और आदर्श इस देश के लोगों द्वारा लागू किए जाएँ.

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