बैरिस्टर नरेन्द्र जीत सिंह को भला कौन नहीं जानता! वे और संघ एक-दूसरे के पर्याय थे। उन्होंने और उनके परिवार ने संगठन कीअनन्य सेवा की।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में ऐसे अनेक तपोनिष्ठ कार्यकर्ता हैं, जो कई पीढ़ियों से संगठन व समाज की सेवा में अहर्निश लगे हुए हैं। एक विचार-परंपरा से कई-कई पीढ़ियों को जोड़े रखना संघ कार्यपद्धति की अद्भुत विशेषता है। बैरिस्टर नरेन्द्र जीत सिंह उन्हीं तपोनिष्ठ कार्यकर्ताओं में से एक थे। उनका जन्म 18 मई 1911 को कानपुर के प्रख्यात समाजसेवी रायबहादुर विक्रमाजीत सिंह के घर में हुआ था। शिक्षा प्रेमी होने के कारण इस परिवार की ओर से कानपुर में कई शिक्षण संस्थाएं स्थापित की गईं। नरेन्द्र जीत सिंह की शिक्षा स्वदेश के साथ-साथ विदेश में भी हुई। लंदन से कानून की परीक्षा उत्तीर्ण कर वे बैरिस्टर बने। वे न्यायालय में हिन्दी में बहस करते थे। उन्होंने प्रसिद्ध लेखकों के उपन्यास पढ़कर अपनी हिन्दी सुधारी। कम्पनी लॉ के वे विशेषज्ञ थे। उनकी बहस सुनने दूर-दूर से वकील आते थे।
1935 में उनका विवाह जम्मू-कश्मीर राज्य के दीवान बद्रीनाथ की पुत्री सुशीला जी से हुआ। 1944 में वे पहली बार एक सायं शाखा के मकर संक्रांति उत्सव में मुख्य अतिथि बनकर आए। 1945 में वे विभाग संघचालक बनाए गए। 1947 में
गुरुजी ने उन्हें प्रांत संघचालक घोषित किया था। उनका परिवार अत्यधिक सम्पन्न था, पर शिविर आदि में वे सामान्य स्वयंसेवक की तरह सारे कार्य स्वयं करते थे। उन्होंने अपने बच्चों को संघ से जोड़ा और एक पुत्र को तीन वर्षों के लिए प्रचारक भी बनाया। वर्ष 1948 में संघ पर प्रतिबंध के समय उन्हें कानपुर जेल में बंद किया गया। कांग्रेस समर्थित अराजक तत्वों ने उनके घर पर हमला किया। शासन चाहता था कि वे झुक जाएं, लेकिन उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि संघ का काम राष्ट्रीय कार्य है। वह उसे नहीं छोड़ेंगे। उनके बड़े भाई ने संदेश भेजा कि अब पिता जी नहीं हैं। अत: परिवार का प्रमुख होने के नाते मैं आदेश देता हूं कि तुम जेल मत जाओ, पर बैरिस्टर साहब ने कहा कि अन्याय के विरोध में परिवार को भी समर्पित करना पड़े, तो वह कम है। वे जेल में सबके साथ सामान्य भोजन करते और भूमि पर ही सोते थे।
1975 में आपातकाल में भी वे जेल में रहे। जेल में मिलने आते समय उनके परिजन फल व मिष्ठान आदि लाते थे। वे उसे सबके साथ बांटकर ही खाते थे। बैरिस्टर साहब के पूर्वज पंजाब के मूल निवासी थे। वे वहां से ही सनातन धर्म सभा से जुड़े थे। 1921 में उनके पिता विक्रमाजीत सिंह ने कानपुर में ‘सनातन धर्म वाणिज्य महाविद्यालय’ की स्थापना की। इसके बाद तो इस परिवार ने सनातन धर्म विद्यालयों की शृंखला ही खड़ी कर दी। बैरिस्टर साहब एवं उनकी पत्नी (बूजी) का पंडित दीनदयाल उपाध्याय से बहुत प्रेम था। उनकी हत्या के बाद कानपुर में हुई श्रद्धांजलि सभा में बूजी ने उनकी स्मृति में एक विद्यालय खोलने की घोषणा की। उनके परिवार द्वारा चलाए जा रहे सभी विद्यालयों की पूरे प्रदेश में धाक है। विद्यालयों से उन्हें इतना प्रेम था कि उनके निर्माण में धन कम पड़ने पर वे अपने पुश्तैनी गहने तक बेच देते थे। मेधावी छात्रों से वे बहुत प्रेम करते थे। जब भी कोई निर्धन छात्र अपनी समस्या लेकर उनके पास आता था, तो वे उसका निदान अवश्य करते थे। वे बहुत सिद्धांत प्रिय थे। एक बार उनके घर पर चीनी (शक्कर) समाप्त हो गई। बाजार में भी चीनी उपलब्ध नहीं थी। उन्होंने अपने विद्यालय के छात्रावास से कुछ चीनी मंगाई, लेकिन साथ ही उसका मूल्य भी भेज दिया।
उनका मत था कि राजनीति में चमक-दमक तो बहुत है, पर उसके माध्यम से जितनी समाजसेवा हो सकती है, उससे अधिक बाहर रहकर की जा सकती है। बैरिस्टर साहब देश और प्रदेश की अनेक धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारी थे। जब तक वे स्वस्थ रहे, तब तक प्रत्येक काम में सहयोग देते रहे। 31 अक्टूबर 1993 को उनका शरीरांत हुआ। संघ के विशाल वटवृक्ष के आकार में उनका योगदान अद्भुत है। शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए कार्य मानवता की धरोहर हैं। उन्होंने अपने व्यवहार से प्रमाणित कर दिखाया कि परिवार के मुखिया को कैसा होना चाहिए। उनका पूरा जीवन संघ के नए कार्यकर्ताओं के लिए आदर्श है। उनके व्यक्तित्व का प्रभाव सुदर्शन जी ने अपने संस्मरणों में कई जगह उल्लिखित किया है। उनके व्यक्तित्व-कृतित्व को दृष्टिगत रखते हुए यह संकल्प बनता है कि उनके द्वारा स्थापित मानदंडों को लक्ष्य बनाकर चलना चाहिए।
(साभार युगवार्ता )
