अयोध्या मिथिला का संबंध जीवन की दो धाराओं का संबंध है – आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण

आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण

शास्त्रों का एक सिद्धांत है कि प्रयत्न से फल नहीं मिलते, पुण्य से फल मिलते हैं। प्रयास से ही फल मिलतो तो दुनिया में श्रमिक ही सबसे महान हो जाएँ। पर ऐसा होता नहीं, आप ये न समझें कि श्रम का महत्त्व कम है पर श्रम करने पर भी फल उन्हें मिलता है जिनका पुण्य बल होता है। क्योंकि कर्म और परिणाम के बीच में देवता अनुशासन करने के लिये खड़े होते हैं और वे धर्म के आधार पर ही परिणाम देते हैं, पुण्य बल के आधार पर परिणाम देते हैं।  

दुनिया भर में यह सूचना है कि दिल्ली बहुत प्रदूषित है, तो दिल्ली के प्रदूषण को मुक्त करने के लिए ये अयोध्या पर्व का प्यूरीफायर लगा रखे हैं, दिल्ली में एक अयोध्या बसा दी है। आप सब बड़े भाग्यशाली हैं कि दिल्ली में होकर भी आप अयोध्या में हैं। और जब आप ये अनुभव करें की भारत के किसी कोने पर आप खड़े होकर अयोध्या में हैतो भारत अपनी वास्तविक गरिमा को प्राप्त कर लेगा। 

मैं देश भर में जहां भी जाता हूँ सब से ये पूछता हूँ, ‘आप अयोध्या गये हैं कि नहीं?’ और जब कोई कहता है अभी तक नहीं गया हूँ, तो मुझे मायूसी होती है, आप कितने भी विकसित हो जाएँ,  अपने पुरखों की जमीन तक आपको जाना चाहिए, और जो भी ज्यादा संस्कारशील लोग हैं वे अपने विकसित हो जाने पर भी महानगरों में सेटल्ड हो जाने पर भी अपने गाँव, अपने पुरखों के घर तक जाना चाहते हैं। अयोध्या समस्त भारतीयों के पूर्वजों का घर है। क्योंकि –‘ हम मनुष्य कहलाते ही इसलिए हैं क्योंकि हम मनु की संतान हैं, और मनु ने ही पहली राजधानी अयोध्या बनायी है। हम कहीं भी गए हैं पर हम अयोध्या के हैं, हम कहीं भी जन्मे हैं, कितनी भी पीढ़ियों से पर हम अयोध्या के हैं। हर भारतीय के मन में यह विचार होना ही चाहिये, और आपको यह अवसर सुलभ हो रहा है इसके लिए आप सबको बधाई, यह कार्यक्रम, यह संकल्प और बड़ा हो करके राष्ट्रीय पहचान पर राष्ट्रीय फलक पर अपनी पूरी ताकत के साथ उपस्थित हो इस बात कि शुभकामना के साथ थोड़ी बातें मैं करूँगा। 

मैं आपको कुछ बहुत व्यावहारिक और सामान्य सी बातें बताऊँगा। आज जो विषय है अयोध्या और मिथिला का सम्बन्ध, थोड़े से धरातल में उतर करके, किताबों के बाहर आकर, आप देखने का प्रयास करें भारत की पहचान क्या हैभारत का दो रूपों में पहचाना जाता है भारत ऋषि प्रधान देश है और भारत कृषि प्रधान देश है। आप इससे सहमत होंगे, हमारी सारी संस्कृति हमारे सारे मूल्य ऋषियों से आये हैं और हमारे सारे जीवन के सारे संसाधन कृषि से आये हैं। जब आप अयोध्या और मिथिला के सम्बन्ध देखने चलते हैं तो आपको इस बात से रोमांच होना चाहिए की अयोध्या में उत्पन्न श्री राम को ऋषि ने उत्पन्न किया है, और मिथिला में उत्पन्न जानकी को कृषि ने उत्पन्न किया। इससे बढ़िया योग नहीं हो सकता है अयोध्यामिथिला सम्बन्ध का, और इसके लिए कोई प्रमाण नहीं देना मुझे, आप सब परिचित हैं इससे। आप सब चिंतन करने चलेंगे कि क्या वजह है श्रीराम सूर्यवंशी होकर आये हैं, और क्या वजह है कि जानकी धरती की पुत्री हो कर आई हैं, तो आपको पता चलेगा पिता अनुशाशन देने के लिए होता है माँ जीवन देने के लिए होती हैं। सूर्य तपे और धरती की नमी समाप्त हो जाए, तो सब नष्ट हो जायेंगे। सीता इसलिए धरती की पुत्री हो करके आती हैं कि राम का ताप मनुष्यता का कल्याण नहीं कर सकता, सीता की नमी मनुष्यता का कल्याण कर सकती हैं। 

ये आकारण नहीं है कि सीता का नाम सीता रखा गया और कुछ रखा जाता। आप लोग परिचित होंगे सीता किसे कहते हैं?  हल के फाल को सीता कहते हैं, हल को लान्गुल कहते हैं और हल का जो फाल होता है उसमें लोहे को ठोक कर के जमीन को जोतते हैं, उसे सीता कहते हैं। तो सीता से उत्पन्न का नाम सीता ही रखना अपेक्षित नहीं था, क्यूँ रखा गया? क्योंकि भारत की जो मनुष्यता है, भारत की जो भारतीयता है वो उसी धरती से उत्पन्न होती है। भारत का मनुष्य  जिसको आप किसान कहते हैं , जिसको आप भूमिपुत्र कहते हैं, जानकी ने सन्देश दिया आसमान से उतरा हुआ मनुष्यता का कल्याण नहीं कर सकता, धरती से उठा हुआ मनुष्यता का कल्याण कर सकता है। और इसके प्रमाण आपको आगे चलकर दिखाई पड़ेंगे। 

सम्बन्ध की बात है तो उन सन्दर्भों में जाएँ तो वेदों से आरम्भ करना चाहिए, वेदों की पहचान क्या है? श्री राम का जन्म कैसे हुआ? अथर्ववेद परिचय देता है –‘ आठ चक्र और नौ दरवाजों वाली पुरी जिसका नाम अयोध्या है। अब मैं इसके दार्शनिक विस्तार में भी नहीं जाऊँगा क्योंकि फिर पता नहीं कितना समय लग जाये? अब ये नव द्वार क्या हैं? अयोध्या में नौ दरवाजें हैं।  ये जब आप समझने चलेंगे तब आपको रोमांच होगा कि गीता, उपनिषद में सर्वत्र हमारे यहाँ कहा गया है कि यह शरीर अयोध्या है। इसमें भी नौ दरवाजे हैं।  नौ दरवाजों वाला शरीर है जिसमें आत्मा निवास करता है, नौ दरवाजों वाली अयोध्या है जिसमें परमात्मा निवास करता है। ये देवताओं की पुरी है, और इसको अयोध्या कहते हैं। युद्ध के द्वारा इसे पाया नहीं जा सकता है। युद्ध के द्वारा इसको जीता नहीं जा सकता हैं, जो योध्य नहीं हो, जिसे पाया नहीं जा सके वो अयोध्या है। 

दूसरी ओर मिथिला है, उसकी पहचान क्या है? जनक जी के युद्ध-करने का कोई प्रसंग आप लोगों को याद है? याद होना चाहिए,  और मैं आपसे अपील करूँगा वाल्मीकि-रामायण आप लोगों को जरूर देखनी चाहिए। इसलिए नहीं की रामचरित मानस कम है, रामचरित मानस परिपूर्ण है, बल्कि इसलिए देखनी चाहिए क्योंकि रामचरित मानस भक्ति काव्य है, वाल्मीकि-रामायण इतिहास है। आप भक्ति काव्य से अपनी आस्था प्रकट कर सकते हैं, अपनी दावेदारी प्रकट करने के लिए आपको इतिहास चाहिए। आप आस्था लेकर के सब जगह जीत नहीं सकते। वाल्मीकि-रामायण इतिहास है, और वो इतिहास आपको बताता है कि जब जनक जी ने इस बात की घोषणा कर दी, मैं अपनी पुत्री का विवाह उससे करूँगा, जो मेरे यहाँ रखे हुए शिव धनुष को उठाकर उसकी प्रतंचा चढ़ा देगा। आप ध्यान रखें धनुष तोड़ने कि प्रतिज्ञा नहीं है, ये नाटकों और काव्यों से आई है, धनुष टूटना एक क्षत्रिय के लिए अमंगल है, और शिव धनुष जनक का पूज्य है, तोड़ने का संकल्प नही है। 

जिस धनुष को कन्या ने हाथ से उठा लिया है, जो इसकी प्रतंचा चढ़ा दे, वो योद्धा और इस बात से आप परिचित होंगे। प्राचीनकाल में जब धनुष से युद्ध होता था तो धनुष एक बड़ा साधन थामाप भी धनुष से होती थी, मीटर और गज ये चीजें बाद में आई हैं। चकबंदी माप बाद में आई है। पौराणिक काल में दूरी मापने का साधन भी धनुष होता था, आप स्कन्द पुराण उठा करके देखें अयोध्या तीर्थ के बारे में विघ्नेश्वर से राम जन्म स्थान कितनी दूर है? कनक भवन से मणिपर्वत कितनी दूर है? आप खुद देखेंगे धनुष की माप मिलेगी उसमें। एक धनुष का मतलब होता है लगभग छः फीट, योद्धा के सिर के बराबर जो धनुष है वो महारथी का है, और उसके सिर से भी एक हाथ ऊपर जो धनुष है वो अतिरथी का है। धनुष युद्ध के बाद डोरी उतारकर रख दिए जाते थे जिससे कि कमान झुके नहीं। 

युद्ध काल में उनको चढ़ाया जाता था। और अपने से बड़े योद्धा की डोरी चढ़ाना किसी के बस की बात नहीं थी, आप अगर बारीकी से खोजेंगे तो आपको इतिहास में वो सन्दर्भ मिलेंगे जिसमें बड़े धनुष चढ़ाते हुए योद्धाओं की गर्दन उखड़ गयी है। जमीन पर रखकर के पूरी कमान को नीचे झुका करके डोरी लगायी गयी, और डोरी छूट गयी और धनुष की कोटि से यहाँ टकराहट के कारण प्राण चले गये।  

राम-सीता का चरित्र क्या है, दोनों का  संस्कार क्या है? जनक ने घोषणा की है कि जो आ करके इस धनुष की डोरी चढ़ा देगा उसके साथ अपनी बेटी विवाह करूँगा। अनेक राजा आएं हैं, धनुष उठाने का प्रयास किया है। धनुष उठा ही नहीं है डोरी चढ़ी ही नहीं है। धनुष का कितना वजन है इसकी कल्पना आप कर सकते हैं, श्रीमद्भागवत में इसका वर्णन करते हुए व्यास कहते हैं तीन सौ महारथी योद्धाओं के द्वारा लोहे की गाड़ा पर ढकेल करके लाया गया है उसे सभा के मध्य में, उठाकर नहीं ला सके। श्री राम आये हैं विश्वामित्र के साथ, उसके पहले जब राजा धनुष उठाने में असमर्थ हुए हैं, तो ये मान करके कि जनक ने धनुष उठाने के बहाने हम योद्धाओं को तिरस्कृत किया है, अपनी पुत्री का व्याह करने के नाम पर बल की परीक्षा करके हमें अपमानित किया है। इन्होंने इकट्ठा हो करके मिथिला पर आक्रमण किया है। और वर्ष पर्यन्त सारे राजा एक साथ जनक के ऊपर आक्रमण करके उनके नगर को ध्वंस करने में लगे रहेऔर परास्त हो कर लौट रहे हैं। तो अयोध्या ही अयोध्या नहीं है, अपने बल और पराक्रम में मिथिला भी अयोध्या है। उसके बाद जब श्री राम वहा आए, देखिए क्या एकता है दोनों में, तो विश्वामित्र से बातचीत हुई और विश्वामित्र ने कहा कि एक क्षत्रिय राजकुमार दशरथनंदन मेरे साथ आये हैं, ये आपका वो दिव्य धनुष देखना चाहते हैं। 

विश्वमित्र श्रीराम को साथ लेकर गये और अनुमति लेकर के श्री राम ने कहा मैं ये धनुष उठा सकता हूँ। जनक जी मन में तो संकोच करते हैं, बड़े-बड़े आये और चले गये, ये बच्चा कह रहा है मैं इसे उठाना चाहता हूँ, पर मना करने की कोई बात नहीं थी। उन्होंने कहा ठीक है उठाओ। खेल-खेल में श्री राम ने वो धनुष उठा लिया है, वाल्मीकि-रामायण में कोई सभा नही लगी है, कोई भीड़ नहीं है, वहां  कोई उपस्थित नहीं है, वही दो-तीन लोग हैं। और राम ने धनुष उठा करके बड़ी आसानी से डोरी खीच करके लगानी चाही है, तो वो ज्यादा खिंच गया और बीच से टूट गया। श्री राम संकुचित हो गये हैं, ये तो मैं नहीं करना चाहता था, धनुष टूटना अच्छी बात नहीं है, पर जनक बड़े आनंदित हो गये हैं बोले, श्री राम ये केवल धनुष ही नहीं टूटा है, मेरा वर्षों का संचित दुख भंग हुआ है।  मुझे तो लगता था कि कन्या का विवाह नहीं हो सकेगा। जल का बर्तन हाथ में लेकर  जयमाला अपनी कन्या के हाथ में देकर जनक ने प्रस्तुत किया है। 

रामराज्य की बात, राज्यों को तो दूर जाने दें अभी, एक व्यक्ति के रूप में, एक युवक के रूप में जो राम का चरित्र है वो इस देश के युवाओं के सामने आना चाहिए। राम केवल वो नहीं है जिनके मंदिर के लिए मुकदमा चल रहा है, उसके अलावा भी हैं। तो ये देखना चाहिए कि रामत्व कहां से निर्मित होता है? वो कन्या जिसको पाने के लिए राजा वर्ष भर अपनी सेनायें लेकर जनकपुर की सीमाओं पर टिके हुए थे, वह कन्या जो हल जोतने से धरती से उत्पन्न हुई है,   किसी माँ के गर्भ से नहीं हुई है, वह कन्या जिसका पिता त्रैलोक्य में अपनी उदारता, अपने ब्रह्मज्ञान के लिए प्रसिद्ध है और बड़े-बड़े महात्मा जिस जनक के यहाँ विद्यार्जन करने के लिए आते हैं। उस कन्या ने जब एक युवक को योग्यता प्रमाणित करने पर माला पहनानी चाही है तो श्री राम कहते हैं नहीं मैं ये नहीं कर कर सकता। 

वाल्मीकि-रामायण में है कि राम कहते हैं कि मैं माला नहीं पहन सकता क्योंकि मैं पिता की अनुमति से गुरु की सेवा करने आया हूँ ब्याह करने नहीं आया हूँ। अगर आप मुझे माला पह्नाना चाहती हैं तो मेरे वृध पिता दशरथ को सूचित करिए, उनकी अनुमती से ही मैं वरमाला पहनूंगा, ये रामत्व है। 

और सीता का चरित्र क्या है? जानकी क्या हैं? वे जानकी जो छह वर्ष में विवाह के बाद राम के साथ अयोध्या आयीं हैं बारह वर्षों तक विवाह के बाद आकर अयोध्या में रहीं हैं, अपनी आयु के 19वें वर्ष में जानकी वनवास की यात्रा करती हैं, और उस वनयात्रा में भी साढ़े ग्यारह वर्ष चित्रकूट में रह करके  बारह वर्ष के बाद रावण के द्वारा उनका हरण हुआ है, लंका में अशोक वाटिका में बैठी हैं, और जब लंका जल रही है और हनुमान के जल जाने की उनको चिंता होती है तो कहती हैं मन से, कर्म से, वचन से अगर श्री राम के अतरिक्त अन्य पुरुष का मैंने चिंतन नहीं किया हो तो मेरे सतीत्व हनुमान शीतल हो जाएँ। सोने की लंका जिस आग में पिघल रही है, उस आग में वानर शरीरधारी हनुमान अश्चर्यचकित होकर सोचते हैं कि मैं जलने से बच कैसे गया? मैं क्यूँ जल नहीं रहा हूँ

दोनों में एकता की मैं यहाँ से शुरु करूँगा कि मनुवंश में, इक्ष्वाकु वंश में राम जी उत्पन्न हुए हैं। जानकी जी भी इक्ष्वाकु वंश में ही उत्पन्न हुई हैं। इक्ष्वाकु के पुत्र निमी हैं, जिनके द्वारा चन्द्रवंश की परंपरा अलग चली है और वो निमी कौन है? सब यज्ञ से उत्पन्न होने वाले ये लोग हैं। अब ये बात ध्यान रखने की है, इसलिए भी रामचरित्र समाज में जाना चाहिए। 

स्त्री-पुरुष के संयोग से जो उत्पन्न होते हैं, वो बच्चे होते हैं महापुरुष नहीं होते हैं। महापुरुष यज्ञ से उत्पन्न होते हैं, इतिहास उठाकर देखें आप कोई ऐसा महान व्यक्ति नहीं है जिसके इतिहास में उसके माता-पिता का चरित्र आपको न मिले। निमी अपने आचार्य वशिष्ठ के पास गये हैं कि मैं यज्ञ करना चाहता हूँ आप मेरा आचार्य बनिए।  उन्होंने कहा मैंने किसी और को समय दे दिया है, उस यज्ञ के बाद तुम्हारे यज्ञ का संपादन कर सकता हूँ। निमी ने कहा मेरे मन में यह बात उत्पन्न हुई है कि ज़ीवन नश्वर है इसलिए किसी काम को विलम्भित नहीं करना चाहिए। आपके ठीक होने तक पता नहीं मेरा जीवन रहेमैं अभी यज्ञ करना चाहता हूँ। वशिष्ठ को छोड़कर निमी ने किसी और को अपना आचार्य बना लिया।  वशिष्ठ ने जब ये देखा तो वो रूष्ट हो गये और उन्होंने श्राप दे दिया, तुमने अपने गुरु की अवज्ञा की है तुम्हारा शरीर नष्ट हो जाएगा। निमी का शरीर नष्ट हो गया, किन्तु राजा को मारने से ब्रह्महत्या लगती है। शास्त्र कहते हैं, क्योंकि प्रजा में अराजकता फैल जाती है। निमी के द्वारा उत्तराधिकारी उत्पन्न करने के लिए निमी के शरीर का मंथन करके जिस रुष्ट को उत्पन्न किया उसका नाम मिथि हुआ। उस मिथी नाम के राजा ने जो राजधानी बनायी उसका नाम मिथिला है। मिथि के बेटे हुए जनक जिसके बाद उस परंपरा के लोगों को जनक कहा जाने लगा और देह को छोड़ करके जब देवता प्रसन्न हुए, निमी को स्वर्ग आदि जाने की बात पूछी थी तो निमी ने कहा नहीं मेरी ये अभिलाषा नहीं है। देवताओं ने कहा तुम क्या चाहते हो? कहा, मुझे यह अभिलाषा है कि मेरे वंश में त्रिलोक्य की अधीश्वरी   परम ब्रह्मभूता कन्या का जन्म होना है, शरीर छूट जाने से अब मैं उसे देखने में समर्थ नहीं रहूँगा, तो मैं चाहता हूँ मैं प्राणियों के पलकों पर निवास करूँ और जब भी वो उत्पन्न हो तो मैं उसे देखूँ। निमी को मनुष्यों की पलकों पर निवास मिल गया। तो हमारी जो पलकें झपकती है वो निमी के भार से झपकती हैं और इसीलिए पलकें झपकने के समय को निमिष कहा जाता है। निमिष जो इकाई है समय की वो निमी के कारण है।   

पुष्प वाटिका जब जानकीजी श्रीराम को पहली बार देख रहीं  हैं,  तो पलकें झपकना बंद हो गयी, कहा ये बड़ी अस्वाभाविक बात है, कितना भी सुन्दर दृश्य क्यों न हो पलकें तो झपकती ही हैं,  क्यों नहीं झपक रही हैं? तो कहा इसलिए नहीं झपक रही है कि निह्कुल कन्या जानकी अपने पति को अनुराग कि दृष्टि से देख रही हैं, निमी उस कुल के हैं, उनका वहां उपस्थित रहना अच्छा नहीं है तो वो हट गये पलकों से, ओर वो हट गये पलकों से तो पलकें झपकना बंद हो गयीं। 

अयोध्या में मिथिला और मिथिला में अयोध्या कायम है। राम और जानकी का, अयोध्या और मिथिला का, केवल दो देशों, दो प्रान्तों, दो संस्कृतियों का संबंध नहीं है, जीवन की दो धाराओं का संबंध है। एक धारा  ताप की है, एकधारा आह्लाद और वात्सल्य की है। जीवन किसी एक चीज से विकसित नहीं हो सकता। केवल ताप से भी अंकुर नहीं निकलता, और केवल पानी से भी अंकुर नहीं निकलता। जीवन सदैव नमी और ताप के संतुलन में होती है। जीवन के लिए अपेक्षा है, मिथिला और अयोध्या की जो अवधारणा है उसका ऐक्य जो हमारे यहाँ पहले से उपस्थित है, वो जन-जन तक पहुँचे, जो परिवार टूट रहे हैं, जो समाज टूट रहे हैं, जो व्यक्तिवाद की आंधी में सब अकेले होते जा रहे हैं, ये बदले।  

 

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