संजय काल

रामबहादुर राय

कांग्रेस के ऊंचे नेता शंकर दयाल सिंह की पुस्तक ‘इमरजेंसी क्या सच? क्या झूठ’ में एक अध्याय है, ‘सूर्योदय और सूर्यास्त’। किसका सूर्यादय और किसका सूर्यास्त? यह प्रश्न पाठक के मन में कौंधता है। इसका ही उत्तर यह अध्याय भी देता है। वह प्रामाणिक है। प्रामाणिकता के कम से कम दो आधार स्पष्ट हैं। पहला कि देश-विदेश के अखबारों ने जो लिखा, उसका प्रासंगिक उद्धरण देकर शंकर दयाल सिंह शुरुआत करते हैं। यह उद्धरण पूरी कहानी कहता है। यह 10 नवंबर, 1976 को वाशिंगटन पोस्ट में छपे लेख का एक अंश है- ‘भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जून, 1975 में आपातकालीन स्थिति की घोषणा की थी। तभी से उनका छोटा बेटा संजय एक राजनीतिक के रुप में राकेट की तेजी से उपर चढ़ता गया। अब वह न केवल एक मंत्री जितना वास्तविक अधिकार रखता है, बल्कि उनका उतराधिकारी  भी है। राजनयिक सूत्रों का कहना है कि इसके साथ ही उसने विचित्र विशेषाधिकारों से युक्त व्यापारी के रुप में भी अपनी कारगुजारियां तेज कर दी है।’ व्यापारी से आशय मारुति कारखाने के धंधे से है।

शंकर दयाल सिंह तब लोकसभा सदस्य थे। कांग्रेस संसदीय बोर्ड के सदस्य भी थे। इससे उन्हें अंदर-बाहर की सूचनाएं सहज ही मिल जाती थी। वे लिखते हैं, ‘26 जून, 1975 से लेकर 18 जनवरी, 1977 तक के काल को इतिहास के वर्णक्रम के अनुसार हम ‘संजय काल’ कह सकते हैं। इस बीच भारत की राजनीति में जो कुछ हुआ, देश में जो भी घटनाएं घटी, जिन सूत्रों की भी व्याख्या की गई, कहीं आपातकालीन आफत ढाए गए, सरकार के जो भी बड़े से बड़े निर्णय हुए-यह मानकर चलना चाहिए कि उनमें संजय गांधी का प्रमुख हाथ रहा। कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना है, वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष को हटाना है, मंत्रियों को अपदस्थ करना है, नए मंत्रियों की बहाली करनी है, विभागों का उलटफेर करना है, सचिवों की भी अदला-बदली करनी है, दिल्ली का प्रशासन चलाना है, बिहार या यू.पी. या राजस्थान के मुख्यमंत्रियों के रहने या जाने का फैसला है, बजट में आर्थिक नीतियों के मोड़ की बात है, विदेष भ्रमण पर प्रधानमंत्री के जाने, न जाने का निर्णय है-सभी ऐसी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष बातों का फैसला संजय गांधी की भृकुटी पर निर्भर करता था।’

‘संजय नाम इतिहास का एक गौरवशाली नाम है। महाभारत काल में संजय को दिव्यदृष्टि प्राप्त थी कि वह युद्धभूमि में जहां कहीं भी, जो कुछ भी हो रहा हो, उसकी रिपोर्ट अंधे धृतराष्ट्र के सामने रख दे। संजय ने ऐसा किया भी और एक प्रकार से हम यह भी कह सकते हैं कि महाभारतकालीन संजय धृतराष्ट्र की सुर-आंखों के लिए दृष्टि था। और यहां? यहां संजय ने दिव्यदृष्टि रखने वाली अपनी मां की आंखों पर ऐसी पट्टी चढ़ाई कि उनकी आंखों की ज्योति भी मलिन हो गई। आखिर द्वापर और कलयुग में कुछ न कुछ तो फर्क होना ही चाहिए।’‘और बाद में संजय के नाम के साथ ही जुड़ गया-मारुति। मारुति-पवन या पवन पुत्र हनुमान। हनुमान, जो एक ही छलांग में समुद्र लांघ जाने की क्षमता रखते थे, लेकिन उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी। समुद्र के किनारे बैठे श्री राम के दूत वानर और ऋछ समझ ही नहीं पा रहे थे कि कैसे लंका पहुंचा जाए, कौन ऐसा वीर है जो समुद्र पार कर सकेगा, उस पार जा सकेगा, जाकर लौट आएगा, वहां की खबर ला देगा और यदि जरुरत पड़ी तो वहां अक्ल भी सिखला देगा। कोई तैयार ही नहीं हो रहा था, भला इतने बड़े समुद्र को कैसे लांघा जाएगा और कोई-कोई बड़े वीर ने यह भी उद्गार प्रकट किया कि यदि उस पार किसी भांति चले भी जाएं, तो वापस आना मुश्किल है कि तभी किसी ने पवन-पुत्र हनुमान की ओर देखा, जो निश्चिन्त -से बैठे थे, कहीं कोई अनुराग-विराग नहीं था। उन्हें यह पता भी न था कि वे इसे लांघ सकते हैं या वापस आ सकते हैं, कि तभी किसी सयाने योद्धा ने उन्हें उनकी वीरता की याद दिलाई और उनका शरीर फूलता गया और उसमें अतुलनीय बल भरता गया और उन्होंने हुंकार ली-क्या करना है, जल्द बताओं। एक क्या, ऐसे-ऐसे कितने समुद्रों को मैं एक ही छलांग में लांघ सकता हूं ।’

शंकर दयाल ने लिखा है, ‘पता नहीं किस ने संजय गांधी को उनकी शक्ति की याद दिलाई और उन्हें मारुति बनाने की प्रेरणा दी? हालांकि यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि उन्होंने जब मारुति नाम को अपनाया होगा, तो उनके अंदर एक महत्वाकांक्षा ने जन्म लिया होगा, नेता के हनुमान के समान ही एक छलांग में समुद्र लांघ जाने की और उन्नति के शिखर पर पलक मारते पहुंच जाने की। लेकिन कलयुग में नेता का यह मारुत थम गया था और नतीजा यह हुआ कि वहां तो हनुमान अपना काम पूरा कर समुद्र के उस पार जाकर वापस भी आ गए थे, लेकिन यहां संजय गांधी समुद्र लांघने की महत्वाकांक्षा में इस प्रकार बीच में ही धराशायी हो गए थे कि न आसमान के रहे और न जमीन के। और खुद गए सो तो गए, साथ में ले गए प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा, कांग्रेस पार्टी का इतिहास और सदा-सदा के लिए भारतीय जनतंत्र पर एक काली रेखा दे गए।’

वे लिखते हैं, ‘जो भी बातें अब तक हमारे सामने आ चुकी है, उनसे यह स्पष्ट है कि संजय गांधी नाम के व्यक्ति ने डेढ़-दो वर्षों की ही अल्पावधि में भारत का सबसे बड़ा ओहदा प्राप्त कर लिया था, हालांकि उसकी कुछ न तो घोषणा थी और न किसी को यही पता था कि इन्हें कौन-सा पद प्राप्त है-सरकार में या संस्था में। लेकिन ‘संजय जी यह चाहते हैं’, ‘संजय जी का यह कहना है’, आदि वाक्य आपातकाल के दौरान कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एक मुहावरा बन गया था। इमरजेंसी के दौरान दुनिया का शायद ही कोई अखबार ऐसा हो, जिसने संजय गांधी की महत्वाकांक्षा और उनके उभरते व्यक्तित्व की चर्चा अपने कालमों में न की हो और यह भी सही है कि कहीं-कहीं संजय गांधी को जो गौरव और स्थान दिया जा रहा था, वह लगता था कि महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी से भी बढ़कर है।’

जाहिर है, संजय गांधी संविधान से उपर एक असंवैधानिक अर्थात तानाशाह के आसन पर बैठ गए थे। कैसे? यही शंकर दयाल सिंह यहां बता रहे हैं, ‘भारतीय संविधान के अनुसार राष्ट्रपति देश का सर्वोच्च पद है और कार्यकारी शक्तियां प्रधानमंत्री में निहित है। लेकिन संजय का व्यक्तित्व आपातकाल के दौरान जिस भांति उभरा या उभारा गया, उससे यही लगता था मानो दोनों की शक्तियां एक में सिमट गई हैं और 26 जून, 1975 से लेकर 2 फरवरी, 1977 तक संजय ही इस देश के बेताज बादशाह बने रहे। हर जगह उन्हें ‘वी.आई.पी.’ का दर्जा और स्वागत दिया गया, जहां कही भी गए मुख्यमंत्री अपने पूरे कैबिनेट के साथ अगवानी में खड़े रहे, बाजे-गाजे, तोरणद्वार भेंट-मुलाकात सबों का आलम वही था। सुरक्षा व्यवस्था में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी मात हो गए। संजय जी शायद ही कहीं अकेले गए, हर जगह अपनी सहघर्मिणी मेनका गांधी के साथ गए और चलते समय हर जगह से ‘बहू’ को विदाई भी भारतीय परंपरा के अनुसार मिलना आवश्यक ही था।’

एक अंचभा ऐसा भी हुआ। ‘इस संबंध में बिहार में आम जनता और बुद्धिजीवियों की जबान पर एक आम चर्चा यह है कि संजय जी और मेनका जी जब एक बार बिहार के दौरे पर आए तो तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र के निवास पर उन्हें रात्रि-भोज में आमंत्रित किया गया। वहां मेनका जी ने श्रीमती मिश्र के गले में हीरों का एक बहुत खूबसूरत हार देखा और वह खाना भूलकर हार पर ही मुग्ध हो गई और उसकी ही तारीफ करती रही। खाने के बाद डा. मिश्र ने अपनी पत्नी से यह अनुनय-विनय की कि यह हार जब मेनका जी को इतना पसंद आ गया है, तो इसे दे देना चाहिए। पत्नी ने इस आग्रह को स्वीकार नहीं किया, औरतों को आभूषण कभी-कभी जान से भी बढ़कर प्यारा होता है। लेकिन डा. मिश्र हार मानने वाले नहीं थे, उन्होंने मुख्यमंत्रित्व की पूरी शक्ति लगा दी और रात भर में उत्कृष्ट सोनारों की मदद से ठीक उसी के समान हीरों का एक हार हजारों रुपयों की लागत से तैयार करवाया और सबेेरे नाश्ते के बाद उसे मेनिका जी को भेंट किया गया। उसी दिन मुख्यमंत्री निवास पर ही संजय जी ने पत्रकारों से बातचीत में एलान किया कि बिहार का प्रशासन देश का सबसे अच्छा प्रशासन है और डा. मिश्र अगले 10 वर्षों तक राज्य के मुख्यमंत्री बने रहेंगे।’

शंकर दयाल सिंह ने अपनी पुस्तक में जो टिप्पणी की है वह लोकसभा चुनाव में इंदिरा-संजय और कांग्रेस की पराजय पर आधारित है। ‘हालांकि इतिहास चक्र भी विचित्र होता है। दस साल का सर्टिफिकेट देने वाले और लेने वाले दोनों दस महीनों के अंदर ही कहा गए, पता नहीं है, लेकिन उस समय तो उस सर्टिफिकेट का भारी महत्व था।’

 इमरजेंसी में जो बात हर जागरुक नागरिक देख रहा था, उसे शंकर दयाल सिंह ने इन शब्दों प्रमाणित किया है, ‘आपातकाल की अवधि में भारत का शासन-सूत्र संजय गांधी की भृकुटी का दास था, चाहे वह केंद्र का शासन हो या राज्यों के प्रशासन हों। नहर से लेकर भवन तक का उद्घाटन संजय गांधी द्वारा संपन्न हो रहा था और सरकारी या संस्थागत समारोहों की शोभा संजय गांधी ही बढ़ा रह थे। नसबंदी हो या वृक्षारोपण, मील का शिलान्यास हो या विश्वविद्यालय के भवन का, सांस्कृतिक आयोजन हो या रंगारंग कार्यक्रम-सब जगह संजय गांधी। और भारत के मुख्यमंत्रियों में तो इस बात के लिए होड़ मची हुई थी कि कौन अधिक से अधिक स्वागत-द्वार बनवाकर, दुल्हन की तरह शहर सजवाकर, ट्रकों-बसों-रेलों द्वारा लाखों को जुटवाकर संजय गांधी का शाही स्वागत कर सकता है। बाहा्र स्वागत के साथ-साथ आंतरिक स्वागत की भी व्यवस्था करनी पड़ती थी-मारुति का शेयर बिकवाना, मारुति के लिए डीलर्स ठीक करवाना और उनसे अग्रिम दिलवाना, बसों की बाडियों का आदेश दिलवाना, रॉलरों का आदेश दिलवाना, युवक-कांग्रेस के नाम पर चंदे जमा करवाना आदि सब कुछ शामिल था।’

उन्होंने लिखा कि ‘लोकसभा चुनावों में अप्रत्यशित हार के बाद दिल्ली में कांग्रेस-कार्यकारिणी की तीन दिनों तक बैठक हुई, उसमें बंगाल के एवं हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्रियों ने बहुत मार्के की कुछ बातें कहीं। सिद्धार्थशंकर राय ने कहा कि मैं अपने को कानून का एक अच्छा जानकार मानता हूं और मैंने कई कठिन मुकदमे अपने जीवन में जीते हैं। मुझे इस बात की भलीभांति जानकारी रही है कि दोषी किसे कहते हैं। लेकिन मैं यहां एक ऐसा मुकदमा स्वयं हार गया हूं, जिसके बारे में ढूढ़ने पर भी मुझे यह नहीं पता चल सका कि मेरा जुर्म क्या था? उन्होंने आगे अपने जुर्म का विवरण देते हुए कहा कि मैं एक प्रांत का मुख्यमंत्री हूं और मेरा जुर्म यही है कि एक ऐसे आदमी की अगवानी के लिए मैं हवाई अड्डे पर हाजिर नहीं रह सका या सलाह-मशविरा नहीं किया जो न तो सरकार में किसी पद पर है और न संस्था में।’

इसी प्रकार हरियाणा के मुख्यमंत्री बनारसीदास गुप्त ने कहा कि जब-जब संजय गांधी की हरियाणा यात्रा होती थी, तब-तब कांग्रेस के कम से कम दस हजार वोट खराब होते थे और दिल्ली नजदीक होने के कारण हरियाणा में उनका सबसे अधिक दौरा हुआ, नतीजा यह हुआ कि हम वोटों में पूरे हिन्दुस्तान में सबसे नीचे 15 प्रतिशत पर चले गए। उन्होंने इसकी व्याख्या करते हुए कहा कि संजय गांधी का दिल्ली से ही कार्यक्रम बन जाता था और उसके बाद यही के एक बड़े नेता (बंसीलाल) का फोन पहुंचता था कि अमुक कार्यक्रम में एक लाख से कम की भीड़ न हो और हमारा पूरा प्रशासन, मंत्रिमंडल से लेकर कलेक्टर-कमीश्नर-थानेदार सभी भीड़ जुटाने में लग जाते थे। ट्रकें-बसें-ट्रैक्टर सभी पकड़ी जाती थीं, लोगों को काम छुड़वाकर जबरदस्ती बुलाना पड़ता था, नतीजा यह होता था कि हर बार के कार्यक्रम में 10 हजार लोग हमारे विरुद्ध हो रहे थे।’ इन कथनों के आधार पर शंकर दयाल सिंह ने निष्कर्ष स्वरुप लिखा कि ‘मैं समझता हूं कि यही हाल अन्य जगहों का भी था, जहां-जहां संजय गांधी का दौरा होता था।’

कांग्रेस में जो संजयवादी थे, उनके बारे में यह वर्णन है, ‘खैर, लोगों की श्रेणी में ऐसे लोग भी थे, जिनके अनुसार भारत में एक नया सूर्योदय हुआ था और उस सूर्य का ही नाम था-संजय गांधी। सूरज की सवारी जब निकलती है, तो उसमें सात घोड़े होते हैं, संजय के रथ में भी चुने हुए सात घोड़े थे-नर और मादा दोनों बंसीलाल, विद्याचरण शुक्ल, ओम मेहता, नारायण दत्त तिवारी, डा. जगन्नाथ मिश्र और अम्बिका सोनी तथा रुखसाना सुल्ताना। रथ के आस-पास हाली-मुहाली की भी कमी नहीं थी, जिनमें हरदेव जोशी, ज्ञानी जैल सिंह, अनंत प्रसाद शर्मा, सीताराम केशरी, अमरनाथ चावला, प्रणव कुमार मुखर्जी, जानकी वल्लभ पट्टनायक, मोहम्मद यूनुस, महेंद्र सिंह गिल आदि मुख्य थे।’

सहज और बनावटी सूर्योदय का अंतर पढ़ें, ‘सूर्योदय जब होता है, तब आकाश में चारों ओर लाली छा जाती है, प्रभामंडल सूर्य के चारों ओर अपना घेरा बना देता है, मंद-मंद पवन सूर्य किरणों का संदेशा कहने लगते हैं, पक्षियों का मधुर कलरव दिशाओं को गुजारित करने लगता है और रात की अगड़ाई मिटने लगती है, भोर थपकियां देने लगता है। संजय गांधी का भारत की राजनीति में जो पदार्पण हुआ, कुछ इसी तरह का। उसके लिए वातावरण की सृष्टि की गई और प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी तक ने यही समझा कि उनका बेटा जवाहरलाल के बाद देश का सबसे बड़ा और जनता को आकृष्ट करने वाला नेता पैदा हुआ है और इसीलिए उन्होंने स्वयं संजय गांधी की रचना और भविष्य-निर्माण में भरपूर योगदान देना शुरू किया।’

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नाक के नीचे जो हो रहा था, क्या वे नहीं जानती थीं? वे पूरी तरह जानती ही नहीं, बल्कि उसे बढ़ा भी रही थी। पुस्तक के इस अंष से यह समझना सरल है- ‘लेकिन बाहर इसकी क्या प्रतिक्रिया हो रही थी, शायद इंदिरा गांधी इसे नहीं देख रही थी या देखकर भी पुत्र-प्रेम उन्हें देखने नहीं दे रहा था। इस संबंध में देश में तो किसी को चर्चा का कोई हक ही नहीं था, लेकिन विदेषों में इसकी भयानक प्रतिक्रिया हो रही थी। 10 नवंबर, 1976 के ‘वाशिंगटन पोस्ट’ में ‘संजय की अनगिनत भूमिकाएं’ शीर्षक से जान सार का एक लेख निकला, जिसमें कहा गया-‘इंदिरा गांधी ने स्वयं को सार्वजनिक तानाशाह बना लिया है, इस पर कड़वा वाद-विवाद हो ही रहा है, इसके साथ ही उनके पुत्र की दोहरी भूमिका पर भी लोगों को भारी गुस्सा है। उनके आलोचक आक्रोश में हैं, लेकिन साथ ही सहमे हुए भी हैं। इन आलोचकों का कहना है कि बेटे ने स्वार्थों के संघर्ष को असहनीय स्तर तक पहंुचा दिया है और मां उसकी इन हरकतों को शह दे रही हैं। कुछ का कहना है कि यदि यही हाल रहा, तो नेहरू खानदान का पतन निश्चित है।’

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